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कब और कैसे करें नवग्रह मंत्रों का जाप, जानें क्या हो सकते है लाभ?


ज्योतिष में नौ ग्रह बताएं गए हैं जिनकी चाल का सीधा असर व्यक्ति के जीवन पर पड़ता है। किसी व्यक्ति की कुंडली को देखकर ग्रहों की स्थिति का विचार किया जाता है। कुंडली में ग्रह कमजोर होते हैं तो व्यक्ति को बुरे परिणाम प्राप्त होते हैं।

कब और कैसे करें नवग्रह मंत्रों का जाप, जानें क्या हो सकते हैं लाभ?

ज्योतिष विज्ञान में नौ ग्रह बताएं गए हैं, जिनकी चाल का सीधा असर व्यक्ति के जीवन पर पड़ता है। किसी व्यक्ति की कुंडली को देखकर ग्रहों की स्थिति का विचार किया जाता है।  जन्मपत्री (कुंडली) में जब ग्रह कमजोर होते हैं तो व्यक्ति को उससे संबंधित बुरे परिणाम प्राप्त होते हैं। वहीं जब ग्रह मजबूत होते हैं तो जातकों को उसका प्रत्यक्ष लाभ भी मिलता है। हालांकि ग्रहों को मजबूत बनाने के लिए उपाय भी बताए गए हैं और इनमें सबसे ज्यादा कारगर उपाय हैं ग्रहों से जुड़े मंत्रों का जाप।

1. सूर्य ग्रह

ज्योतिष शास्त्र में सूर्य ग्रह को ग्रहों का राजा माना जाता है। जीवन में मान-सम्मान, नौकरी और समृद्धिशाली जीवन जीने के लिए सूर्य देव की कृपा जरूरी होती है और उनका आशीर्वाद पाने के लिए सूर्य ग्रह के बीज मंत्र का जप करना चाहिए।

सूर्य बीज मंत्र - ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः।

विधि - मंत्र को रविवार के प्रात: काल के समय स्नान ध्यान के बाद 108 बार जपें।

2. चंद्र ग्रह

कुंडली में चंद्र दोष होने से कलह, मानसिक विकार, माता-पिता की बीमारी, दुर्बलता, धन की कमी जैसी समस्याएं सामने आती हैं। चंद्रमा मन का कारक ग्रह होता है। कुंडली में चंद्र को मजबूत बनाने के लिए चंद्र ग्रह के बीज मंत्र का जप करना चाहिए।

चंद्र बीज मंत्र - ॐ  चंद्र बीज मंत्र - ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चंद्रमसे नमः।

विधि - मंत्र को सोमवार के दिन सायं काल में शुद्ध होकर 108 बार जपें।

3. मंगल ग्रह

मंगल साहस और पराक्रम का कारक ग्रह है। कुंडली में मंगल के कमजोर होने पर उसके साहस और ऊर्जा में निरंतर कमी रहती है। मंगल को मजबूत करने के लिए मंगल ग्रह के बीज मंत्र का जप करना चाहिए।

मंगल बीज मंत्र - ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः।

विधि - इस मंत्र को मंगलवार के दिन प्रातः स्नान ध्यान के बाद 108 बार जपें।

4. बुध ग्रह

जीवन में तरक्की और प्रसिद्धि पाने के लिए कुंडली में बुध का मजबूत होना आवश्यक है। बौद्धिक नजरिए से सबसे प्रबल ग्रह होता है। कुंडली में बुध ग्रह को मजबूत करने के लिए बुध ग्रह के बीज मंत्र का जप करना चाहिए।

बुध बीज मंत्र - ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं सः बुधाय नमः।

विधि - मंत्र का 108 बार जाप करें।

5. बृहस्पति ग्रह

वैवाहिक जीवन से जुड़ी समस्याओं के लिए इस मंत्र का जप करना चाहिए। कुंडली में बृहस्पति के शुभ प्रभाव से धन लाभ, सुख-सुविधा, सौभाग्य, लंबी आयु आदि मिलता है। कुंडली में देवगुरु बृहस्पति की मजबूती के लिए जातकों को गुरु बीज मंत्र का जप करना चाहिए।

गुरु बीज मंत्र - ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरुवे नमः।

विधि - नित्य संध्याकाल में 108 बार जपें।

6. शुक्र ग्रह

कुंडली में शुक्र ग्रह के मजबूत होने पर सभी तरह के ऐशो-आराम की सुविधा मिलती है और इसे मजबूत करने के लिए जातकों को शुक्र बीज मंत्र का जाप करना चाहिए।

शुक्र बीज मंत्र - ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः।

विधि - शुक्रवार के दिन प्रातः काल के समय स्नान ध्यान करने के बाद मंत्र को 108 बार जपें।

7. शनि ग्रह

ज्योतिष में शनि देव को कर्मफलदाता के नाम से जाना जाता है। यदि कुंडली में शनि ग्रह भारी होता है तो जिंदगी में परेशानियां बनी रहती हैं। इन परेशानियों को दूर करने के लिए शनि बीज मंत्र का जाप करना चाहिए

शनि बीज मंत्र - ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः।

विधि - शनिवार के दिन संध्याकाल में मंत्र को 108 बार जपें।

8. राहु ग्रह

राहु एक छाया ग्रह है। तनाव को कम करने के लिए राहु मंत्र का जप करना चाहिए। कुंडली में यदि राहु अशुभ स्थिति में है तो व्यक्ति को आसानी से सफलता नहीं मिलती है। राहु को मजबूत करने के लिए राहु बीज मंत्र का जप करना चाहिए।

राहु बीज मंत्र - ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं सः राहवे नमः।

विधि - इस मंत्र का नित्य रात्रि के समय 108 बार जाप करें।

9. केतु ग्रह

केतु एक छाया ग्रह ग्रह है, जिसका अपना कोई वास्तविक रूप नहीं है। यदि कुंडली में केतु की स्थिति कमजोर होती है तो यह जिंदगी को बदतर बना देता है। जीवन में कलह बना रहता है। ऐसे में कलह से बचने के लिए इस केतु बीज मंत्र का जाप करना चाहिए।

🔥केतु बीज मंत्र - ॐ स्रां स्रीं स्रौं सः केतवे नमः।

विधि - मंत्र का रात्रि के समय 108 बार जाप करें।

रोगों से मुक्ति के लिए विभिन्न गायत्री मंत्र


☆प्रार्थना☆

"किसी भी काल मे जाने अनजाने हमसे या हमारे पूर्वजों से कोई गलती हुई हो उसे क्षमा करे हमारी आर्थिक स्थिति सही करे पूरे परिवार को स्वस्थ करे हमे श्राप मुक्त करे और ऋण मुक्त करे"

रात को सोते समय बिस्तर पर और सो कर उठते समय बिस्तर पर ही पहले उपरोक्त प्रार्थना तीन बार पढ़े फिर तत्व के अनुसार प्रत्येक गायत्री मंत्र,संजीवनी महामृत्युंजय,विष्णु गायत्री तीन बार पढ़े! 

पंचतत्व नवग्रह गायत्री मंत्र:

1. वायु तत्व:

                    !!राहु गायत्री !!
"ऊँ शिरोरूपाय विद्महे अमृतेशाय धीमहि; तन्नः राहुः प्रचोदयात् !!

बीमारियाँ: पिशाच बाधा; कुष्ठरोग; एलर्जी; गैस; नासूर; कृमि ; सन्निपात; कालरा,बृण, इस गायत्री के पढ़ने से सारे रोग दूर होते हैं !

                    !! केतु गायत्री!!
ऊँ गदाहस्ताय विद्ममहे अमृतेशाय धीमहि, तन्नः केतुः प्रचोदयात् !!

बीमारियाँ:  त्वचा की बीमारी, कोढ़, भगंदर, विषवाधा, चेचक, गुर्दे की बीमारी. ल्यूकोडर्मा, इस गायत्री के पढ़ने से ये बीमारियाँ दूर होती हैं!

                   !!  शनि गायत्री!!
ऊँ सूर्यपुत्राय विद्महे मृत्युरुपाय धीमहि, तन्नः सौरिः प्रचोदयात् !!

बीमारियाँ:  घुटने पैरो मे पीड़ा , वेवक्त बुढापा ,हड्डी की टीवी , पायरिया, इस गायत्री के पढ़ने से ये सभी रोग दूर होते हैं !
             
2. जल तत्व:

                    !!चन्द्र गायत्री!!
ऊँ क्षीरपुत्राय विद्महे अमृततत्वाय धीमहि, तन्नश्चन्द्रः प्रचोदयात् !!

बीमारियाँ: खाँसी , कफ, ट्यूमर , दमा, शराब की लत, आँखो की बीमारी , लकवा , चक्कर , हाईड्रोशील , मन्दबुद्यि, सर्दी ,जुकाम , भारीपन , शीतज्वर, इस गायत्री के पढ़ने से ये सभी रोग दूर होते हैं !

                   !!शुक्र गायत्री !!
ऊँ भृगुसुताय विद्महे दिव्यदेहाय धीमहि, तन्नः शुक्रः प्रचोदयात् !!

बीमारियाँ: कमर के रोग , वातरोग , अण्डकोश में सूजन , पीड़ा,  मूत्रावरोग , वीर्य सम्बन्धी रोग ,!!
इस गायत्री के पढ़ने से ये सभी रोग दूर होते हैं !!

3. अग्नि तत्व: 

                   !!भौम गायत्री !!
ऊँ अंगारकाय विद्ममहे शक्तिहस्ताय धीमहि, तन्नो भौमः प्रचोदयात् !!

बीमारियाँ: पेशाब, गुर्दा सम्बन्धी रोग, पोलियो, अल्सर , हार्निया, बवासीर, इस गायत्री के पढ़ने से ये रोग दूर होते हैं!

                    !!सूर्य गायत्री!!
ऊँ भास्कराय विद्ममहे महातेजाय धीमहि, तन्नः सूर्यः प्रचोदयात् !!

बीमारियाँ:  दिल की बीमारीं, रीड़ की हड्डी, गर्मी की बीमारीं, नेत्र रोग, शरीर मे जलन, सिर पीड़ा, पित्त सम्बन्धी बीमारीं, ब्लडप्रेशर, इस गायत्री के पढ़ने से ये रोग दूर होते हैं !!

4. पृथ्वी तत्व: 

                   !!बुध गायत्री!!
ऊँ सौम्यरुपाय विद्ममहे बाणेशाय धीमहि, तन्नो बुधः प्रचोदयात्,!!

बीमारियाँ: मानसिक दुर्बलता, नींद न आना, उत्तेजना, चिंता,स्मरण शक्ति की कमी, इस गायत्री के पढ़ने से ये रोग दूर होते हैं!!

 5. आकाश तत्व:

                      !!गुरू गायत्री!!
ऊँ आंडि्गरसाय विद्ममहे दण्डायुधाय धीमहि, तन्नो जीवः प्रचोदयात्!!

बीमारियाँ:  मांसपेशियो मे अकड़न, हाँथो मे कम्पन, दाहिनी ओर के अंग सुन्न हो जाना, स्नायु पीड़ा, सूजन, पीलिया, लीवर, कैंसर, फेफड़े की सूजन, चिलकन जैसा दर्द, जलोदर, लिखते-२ हॉंथ अकड़ जाना, पथरी,
इस गायत्री के पढ़ने से ये रोग दूर होते हैं!!

        !!संजीवनी महामृत्युंजय!!
ऊँ तत्सवितुर्वरेण्यं त्रयंम्बकंयजामहे भर्गोदेवस्य धीमहि सुगन्धिम्पुष्टिवर्धनम् धियो यो नः प्रचोदयात् ऊर्वारूकमिव बंधनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् !! !!

इस गायत्री के पढ़ने से सभी लोग र्दीर्घ आयु होते हैं!! !!
       
            !! विष्णु गायत्री!!
ऊँ नारायणाय विद्ममहे वासुदेवाय धीमहि, तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्!! !!

नवग्रहों के मंत्रों की शक्ति और उनका प्रयोग


मंत्रों की शक्ति तथा इनका महत्व ज्योतिष में वर्णित सभी रत्नों एवम उपायों से अधिक है। मंत्रों के माध्यम से ऐसे बहुत से दोष बहुत हद तक नियंत्रित किए जा सकते हैं जो रत्नों तथा अन्य उपायों के द्वारा ठीक नहीं किए जा सकते। 

ज्योतिष में रत्नों का प्रयोग किसी कुंडली में केवल शुभ असर देने वाले ग्रहों को बल प्रदान करने के लिए किया जा सकता है तथा अशुभ असर देने वाले ग्रहों के रत्न धारण करना वर्जित माना जाता है क्योंकि किसी ग्रह विशेष का रत्न धारण करने से केवल उस ग्रह की ताकत बढ़ती है, उसका स्वभाव नहीं बदलता। 

इसलिए जहां एक ओर अच्छे असर देने वाले ग्रहों की ताकत बढ़ने से उनसे होने वाले लाभ भी बढ़ जाते हैं, वहीं दूसरी ओर बुरा असर देने वाले ग्रहों की ताकत बढ़ने से उनके द्वारा की जाने वाली हानि की मात्रा भी बढ़ जाती है। इसलिए किसी कुंडली में बुरा असर देने वाले ग्रहों के लिए रत्न धारण नहीं करने चाहिएं।

वहीं दूसरी ओर किसी ग्रह विशेष का मंत्र उस ग्रह की ताकत बढ़ाने के साथ-साथ उसका किसी कुंडली में बुरा स्वभाव बदलने में भी पूरी तरह से सक्षम होता है। इसलिए मंत्रों का प्रयोग किसी कुंडली में अच्छा तथा बुरा असर देने वाले दोनो ही तरह के ग्रहों के लिए किया जा सकता है। 

साधारण हालात में नवग्रहों के मूल मंत्र तथा विशेष हालात में एवम विशेष लाभ प्राप्त करने के लिए नवग्रहों के बीज मंत्रों तथा वेद मंत्रों का उच्चारण करना चाहिए। नवग्रहों के मंत्र निम्नलिखित हैं :

नवग्रहों के मूल मंत्र

सूर्य :      ॐ सूर्याय नम:

चन्द्र :     ॐ चन्द्राय नम:

गुरू :       ॐ गुरवे नम:

शुक्र :      ॐ शुक्राय नम:

मंगल :    ॐ भौमाय नम:

बुध :      ॐ बुधाय नम:

शनि :     ॐ शनये नम:  अथवा  ॐ शनिचराय नम:

राहु :      ॐ राहवे नम:

केतु :     ॐ केतवे नम:

नवग्रहों के बीज मंत्र:

सूर्य :       ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं स: सूर्याय नम:

चन्द्र :      ॐ श्रां श्रीं श्रौं स: चन्द्राय नम:

गुरू :       ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं स: गुरवे नम:

शुक्र :       ॐ द्रां द्रीं द्रौं स: शुक्राय नम:

मंगल :    ॐ क्रां क्रीं क्रौं स: भौमाय नम:

बुध :       ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं स: बुधाय नम:

शनि :     ॐ प्रां प्रीं प्रौं स: शनये नम:

राहु :       ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं स: राहवे नम:

केतु :      ॐ स्त्रां स्त्रीं स्त्रौं स: केतवे नम:


नवग्रहों के वेद मंत्र:

सूर्य :     ॐ आकृष्णेन रजसा वर्त्तमानो निवेशयन्नमृतं मतर्य च

            हिरण्येन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन॥

           इदं सूर्याय न मम॥

चन्द्र :    ॐ इमं देवाSसपत् न ग्वं सुवध्वम् महते क्षत्राय महते ज्येष्ठयाय

            महते जानराज्यायेन्द्रस्येन्द्रियाय इमममुष्य पुत्रमुष्यै पुत्रमस्यै विश एष    

            वोSमी राजा सोमोSस्माकं ब्राह्मणानां ग्वं राजा॥ इदं चन्द्रमसे न मम॥

गुरू :     ॐ बृहस्पते अति यदर्यो अहार्द् द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु।

            यददीदयच्छवस ॠतप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम॥

            इदं बृहस्पतये, इदं न मम॥

शुक्र :     ॐ अन्नात् परिस्रुतो रसं ब्रह्मणा व्यपिबत् क्षत्रं पय:।

             सोमं प्रजापति: ॠतेन सत्यमिन्द्रियं पिवानं ग्वं

            शुक्रमन्धसSइन्द्रस्येन्द्रियमिदं पयोSमृतं मधु॥ इदं शुक्राय, न मम।

मंगल :   ॐ अग्निमूर्द्धा दिव: ककुपति: पृथिव्या अयम्।

            अपा ग्वं रेता ग्वं सि जिन्वति। इदं भौमाय, इदं न मम॥

बुध :     ॐ उदबुध्यस्वाग्ने प्रति जागृहित्वमिष्टापूर्ते स ग्वं सृजेथामयं च।

            अस्मिन्त्सधस्थे अध्युत्तरस्मिन् विश्वेदेवा यजमानश्च सीदत॥

            इदं बुधाय, इदं न मम॥

शनि :    ॐ शन्नो देविरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये।

             शंय्योरभिस्त्रवन्तु न:। इदं शनैश्चराय, इदं न मम॥

राहु :     ॐ कयानश्चित्र आ भुवद्वती सदा वृध: सखा।

            कया शचिंष्ठया वृता॥ इदं राहवे, इदं न मम॥

केतु :    ॐ केतुं कृण्वन्न केतवे पेशो मर्या अपेशसे।

            समुषदभिरजा यथा:। इदं केतवे, इदं न मम॥


मंत्र जाप के द्वारा सर्वोत्तम फल प्राप्ति के लिए मंत्रों का जाप नियमित रूप से तथा अनुशासनपूर्वक करना चाहिए। वेद मंत्रों का जाप केवल उन्हीं लोगों को करना चाहिए जो पूर्ण शुद्धता एवम स्वच्छता का पालन कर सकते हैं। 

किसी भी मंत्र का जाप प्रतिदिन कम से कम 108 बार जरूर करना चाहिए। सबसे पहले आप को यह जान लेना चाहिए कि आपकी कुंडली के अनुसार आपको कौन से ग्रह के मंत्र का जाप करने से सबसे अधिक लाभ हो सकता है तथा उसी ग्रह के मंत्र से आपको जाप शुरू करना चाहिए।