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किराने की दुकान किन्हें खोलनी चाहिए ?


किराने की दुकान मतलब राशन पानी का सब समान आसानी से मिल जाता है किराना दुकान एक ऐसी दुकान है जिसपर बिकने वाले समान की मांग हर किसी की है इसी कारण इस काम की बहुत अहमियत है अब किराना दुकान रोज की बिक्री करने वाला काम है तो रोज की बिक्री का काम और किराना दुकान 7वे भाव और 7वे भाव स्वामी है साथ ही दूसरा भाव रुपये पैसे का का खाने पीने की चीजों का और राशन का है तो 11वा भाव किराना दुकान से होनेवाले फायदे/धनलाभ आदि का है तो बुध दुकानदारी बिजनेस का कारक ग्रह है।इस कारण इन सबकी अपनी अहमियत है अब कुंडली मे 7वे भाव स्वामी का 7वे भाव(बिजनेस/दुकानदारी भाव) का सम्बंध दूसरे भाव/दूसरे भाव स्वामी(धन व किराने दुकान पर बिकने वाले राशन के भाव) से है साथ ही ग्यारहवे भाव/ग्यारहवे भाव(धन लाभ और आय) स्वामी से भी संबन्ध बन रहा है और बिजनेस ग्रह बुध बहुत बलवान और शुभ स्थिति में है कुंडली मे तब किराना दुकान खोल सकते बहुत अच्छी किराना दुकान चलेगी और दुकान से अच्छा लाभ रहेगा।अब कुछ उदाहरणों से समझते है कौन लोग कर सकते है किराना दुकान किनके भाग्य में लिखा है किराना दुकान???       

#उदाहरणअनुसारवृषलग्न1:-वृष लग्न में 7वे भाव(दुकानदारी भाव)स्वामी मंगल बलवान होकर अगर दूसरे भाव या दूसरे भाव स्वामी बुध सहित ग्यारहवे भावमें बैठे है या। ग्यारहवे भाव स्वामी गुरु से संबंध बना रहे है तब किराना दुकान कर सकते है इसके अलावा मंगल गुरु से सम्बन्ध बनाकर दूसरे भाव मे बैठे है या दूसरे भाव को देखरहे है बुध बलवान है तब किराना दुकान करे आप बहुत अच्छी चलेगी और अच्छा धनलाभ होता रहेगा।। 

#उदाहरणअनुसारकुंभलग्न2:-कुम्भ लग्न कुंडली में सप्तमेश सूर्य बलवान होकर दूसरे+ग्यारहवें भाव स्वामी ग्रह से सम्बन्ध बनाकर बैठें है या गुरु 7वे भाव को देख रहे है 7वे भाव स्वामी बुध के साथ सम्बन्ध में है तब किराना दुकान बहुत अच्छी चलेगी, किराना दुकान कर सकते है।।                                           

 #उदाहरणअनुसारधनुलग्न3:-धनु लग्न में सप्तमेश बुध बलवान होकर शुक्र के साथ संबध बनाकर दूसरे भाव मे बैठा है या दूसरे भाव स्वामी शनि से संबध किया है कुंडली मे तब किराना दुकान कर सकते है या फिर इसके अलावा 7वे भाव स्वामी बुध बलवान होकर शनि सहित 11वे भाव मे बैठे है या बुध शुक्र शनि सम्बन्ध बनाकर साथ बैठे है तब बिजनेस किराने की दुकान का कर सकते है।।                                                                                     

बाकी अगर किराना दुकान करने के ग्रहयोग नही है कुंडली मे तब किराना दुकान नही करे अगर कर लेंगे तब नुकसान हो जाएगा।।

जन्म कुंडली के कुछ विशिष्ट योग एवं इनका फल


द्विभार्या योग👉  राहू लग्न में पुरुष राशि (सिंह के अलावा) में हो अथवा 7वें भाव में सूर्य, शनि, मंगल, केतु या राहू में से कोर्इ भी दो ग्रह (युति दृष्टि द्वारा) जुड़ जाएं तो द्विभार्या योग बनता है। (ऐसे में सप्तमेष व द्वादशेश की स्थिति भी विचारनी चाहिए)। अष्टमेश सप्तमस्थ हो तो द्विभार्या योग होता है।


राजयोग👉 नवमेश तथा दशमेश एकसाथ हो तो राजयोग बनता है। दशमेश गुरू यदि त्रिकोण में हो तो राजयोग होता है। एकादशेश, नवमेश व चन्द्र एकसाथ हो (एकादश स्थान में) तथा लग्नेश की उन पर पूर्ण दृष्ट हो तो राजयोग बनता है। ( राजयोग में धन, यश, वैभव, अधिकार बढ़ते है)


विपरीत राजयोग👉  6ठें भाव से 8वें भाव का सम्बन्ध हो जाएं। अथवा दशम भाव में 4 से अधिक ग्रह एक हो जाएं। या फिर सारे पापग्रह प्राय: एक ही भाव में आ जाए तो विपरित योग बनता है। इस राजयोग के भांति यदा तरक्की नही होती जाती। किन्तु बिना प्रयास के ही आकस्मिक रूप से सफलता, तरक्की धन या अधिकार की प्राप्ति हो जाती है।


आडम्बरी राजयोग👉  कुंडली में समस्त ग्रह अकेले बैठें हो तो भी जातक को राजयोग के समान ही फल मिलता है। किन्तु यह आडम्बरी होता है।


विधुत योग👉 लाभेश परमोच्च होकर शुक्र के साथ हो या लग्नेश केन्द्र में हो तो विधुत योग होता है। इसमें जातक का भाग्योदय विधुतगति से अर्थात अति द्रुतगामी होता है।


नागयोग👉 पंचमेश नवमस्थ हो तथा एकादशेश चन्द्र के साथ धनभाव में हो तो नागयोग होता है। यह योग जातक को धनवान तथा भाग्यवान बनाता है।


नदी योग👉  पंचम तथा एकादश भाव पापग्रह युक्त हों किन्तु द्वितीय व अष्टम भाव पापग्रह से मुक्त हों तो नदी योग बनता है, जो जातक का उच्च पदाधिकारी बनाता है।


विश्वविख्यात योग👉 लग्न, पंचम, सप्तम, नवम, दशम भाव शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो तो जातक विश्व में विख्यात होता है। इसे विश्वविख्याति योग कहते है।


अधेन्द्र योग👉 लग्नकुंडली में सभी ग्रह यदि पांच से ग्यारह भाव के बीच ही हों तो अधेन्द्र योग होता है। ऐसी जातक सर्वप्रिय, सुन्दर देहवाला व समाज में प्रधान होता है।


दरिद्र योग👉  केन्द्र के चारों भाव खाली हों अथवा सूर्य द्वितीय भाव में तथा द्वितियेश शनि वक्री हों और 2, 8, 6, 12 या 3 भाव में हों तो लाख प्रयास करने पर भी जातक दरिद्र ही रहता है।


बालारिष्ट योग👉 चन्द्रमा 5, 7, 8, 12 भाव में हो तथा लग्न पापग्रहों से युत हो तो बालारिष्ट योग बनता है। अथवा चन्द्रमा 12वें भाव में क्षीण हो तथा लग्न व अष्टम में पापग्रह हों, केन्द्र में भी कोर्इ शुभ ग्रह न हो तो भी बालारिष्ट योग बनता है। बालारिष्ट योग में जातक की मृत्यु बाल्यकाल में ही हो जाती है। अथवा बाल्यवस्था में उसे मृत्यु तुल्य कष्ट झेलना पड़ता है।


मृतवत्सा योग👉  पंचमेश षष्ठ भाव में गुरू व सूर्य से युक्त हो तो जातक की पत्नी का गर्भ गिरता रहता है। अथवा मृत संतान पैदा होती है। अत: इसे मृतवत्सा योग कहते है।


छत्रभंग योग👉 राहू, शनि व सूर्य में से कोर्इ भी दो ग्रह यदि दशम भाव पर निज प्रभाव ड़ालते है। और दशमेश सबल न हो तो छत्रंभग योग बनता है। जातक यदि राजा है तो राज्य से पृथक हो जाता है। अन्यथा कार्यक्षेत्र व्यवसाय में अत्यन्त कठिनाइयां व विघ्न आते है, तरक्की नही हो पाती।


चाण्डाल योग👉 क्रूर व सौम्य ग्रह एक ही भाव में साथ हों तो चाण्डाल योग बनता है। विशेषकर गुरू-मंगल, गुरू-शनि, या गुरू-राहू साथ हों तो। इससे योग के बुरे फल मिलते है। तथा जातक की संगति व सोच दूषित हो जाते है।


सुनफा योग👉 कुंडली में चन्द्रमा जहां हो उससे अगले भाव में (सूर्य को छोड़कर) यदि कोर्इ भी ग्रह बैठा हो तो सुनफा योग बनता है। इससे जातक का लाभ बढ़ता है। (यदि आगे बैठने वाला ग्रह सौम्य या चन्द्रमा का मित्र है तो शुभ लाभ व फल बढ़ते है। अन्यथा कुछ अपेक्षाकृत कमी आ जाती है)।


महाभाग योग👉  यदि जातक दिन में जन्मा है। (प्रात: से साय: तक) तथा लग्न, सूर्य व चन्द्र विषम राशि में है। तो महाभाग योग बनता है। यदि रात में जन्मा है। (साय: के बाद प्रात: से पूर्व) तथा लग्न, सूर्य व चंद्र समराशि में है। तो भी महाभाग योग बनता है। यह सौभाग्य को बढ़ाता है।


प्रेम विवाह योग👉  तृतीय, पंचम व सप्तम भाव व उनके भावेषों का परस्पर दृष्टि युति राशि से संबध हो जाए तो जातकों (स्त्री-पुरूष) में प्रेम हो जाता है। लेकिन यदि गुरू भी इन संबधो में शामिल हो जाए तो उनका प्रेम 'प्रेम विवाह' में परिवर्तित हो जाता है। लेकिन तृतीय भाव व तृतीयेश न हो, केवल पंचम, सप्तम भाव व भावेश का ही दृष्टि, युति, राशि संबंध हों और गुरू भी साथ हो तो जातक प्रेम तो करता है, लेकिन जिससे प्रेम करता हेै। उससे विवाह नही करता। भले ही जातक स्त्री हो या पुरूष।


गजकेसरी योग👉  लग्न या चन्द्र से गुरू केन्द्र में हो तथा केवल शुभग्रहों से दृष्टयुत हो, अस्त, नीच व शत्रु राशि में न हो तो गजकेसरी योग होता है। जो जातक को अच्छी पहचान प्रतिष्ठा दिलाता है।


बुधादित्य योग👉  10वें भाव में बुध व सूर्य का योग हो। पर बुध अस्त न हो तथा सूर्य मित्र या उच्च का हो तो व्यापार में सफलता दिलाने वाला यह योग बुधादित्य योग के नाम से जाना जाता है।


पापकर्तरी योग👉  शुभ ग्रह जिस भाव में हो उसके पहले व बाद के भाव में क्रूरपापग्रह हों तो पापकर्तरी योग बनता है। इससे बीच के भाव में बैठा हुआ ग्रह पाप प्रभाव तथा दबाव में आकर पीड़ित होता है। अत: शुभ फल कम दे पाता है, उसी भाव में शुभ ग्रह दो पापग्रहों या दो से अधिक पापग्रहों के साथ बैठे तो पापमध्य योग बनता है।


सरकारी नौकरी व्यवसाय का योग👉 जन्मकुंडली में बाएं हाथ पर ग्रहों की संख्या अधिक हो तो जातक नौकरी करता है। दाएं हाथ पर अधिक हों तो व्यापार करता है। सूर्य दाएं हाथ पर हों तो सरकारी नौकरी कराता है। शनि बाएं हाथ पर हो तो नौकरी कराता है। 10 वें घर से शनि व सूर्य का सम्बन्ध हो जाए (दृष्टियुतिराशि से) तो जातक प्राय: सरकारी नौकरी करता है। गुरू व बुध बैंक की नौकरी कराते है। बुध व्यापार भी कराते है। गुरू सुनार का अध्यापन कार्य भी कराता है।


विजातीय विवाह योग👉 राहू 7वें भाव में हो तो जातक का विवाह प्राय: विजातीय विवाह होता है। (पुरूष राशि में हो तो और भी प्रबल सम्भावनाएं होती है।


चक्रयोग👉 यदि किसी कुंडली में एक राशि से छ: राशि के बीच सभी ग्रह हों तो चक्रयोग होता है। यह जातक को मंत्री पद प्राप्त करने वाला होता है।


अनफा योग👉  यदि किसी कुंडली में चन्द्रमा से पिछले भाव में कोर्इ शुभ ग्रह हों तो अनफा योग बनता है। इससे चुनाव में सफलता तथा अपने भुजाबल से यश, धन प्राप्त होता है।


भास्कर योग👉 सूर्य से दूसरे भाव में बुध, बुध से 11वें भाव में चन्द्र और चन्द्र से त्रिकोण में गुरू हो तो भास्कर योग होता है। ऐसा जातक प्रखरबुद्वि, धन, यश, रूप, पराक्रम, शास्त्र ज्ञान, गणित व गंधर्व विधा का जानकार होता है।


चक्रवती योग👉 यदि कुंडली के नीच /पाप ग्रह की राशि का स्वामी या उसकी उच्च राशि का स्वामी लग्न में हो या चन्द्रमा से केन्द्र (1,4,7,10) में हो तो जातक चक्रवती सम्राट या बड़ी धार्मिक गुरूनेता होता है।


कुबेर योग👉 गुरू, चन्द्र, सूर्य पंचमस्थ, तृतीयस्थ व नवमस्थ हो और बलवान स्थिति में भी हो तो जातक कुबेर के समान धनी व वैभवयुक्त होता है।


अविवाहित / विवाह प्रतिबंधक योग👉 चन्द्र पंचमस्थ हो या बलहीन अस्त पाप पीडित हो तथा 7वें व 12वें भाव में पापग्रह हो तो जातक कुंआरा ही रहता है। शुक्र व बुुध 7वें भाव में शुभग्रहों से दृष्ट न हों तो जातक कुंआरा रहता है। अथवा राहू व चन्द्र द्वादशस्थ हों तथा शनि व मंगल से दृष्ट हों तो जातक आजीवन कुंआरा रहता है। इसी प्रकार सप्तमेष त्रिकस्थान में हो और 6, 8, 12 के स्वामियों में से कोर्इ सप्तम भाव में हो तब भी जातक कुंआरा रहता है। शनि व मंगल, शुक्र व चन्द्र से 180° पर कुंडली में हो तो भी जातक कुंआरा रहता है।


पतिव्रता योग👉 यदि गुरू व शुक्र, सूर्य या मंगल के नवमांश में हो तो जातक एक पत्नीव्रत तथा महिला जातक पतिव्रता होती है। यदि द्वितीयेश व सप्तमेश नीच राशि में हो परन्तु सभी शुभ ग्रह केन्द्र या त्रिकोण में हो तो स्त्री जातक पतिव्रता तथा जातक एक पत्नीव्रत वाला होता है। बुध यदि गुरू के नवमांश में हों तो भी पतिव्रता योग होता है चन्द्रमा यदि सप्तम भाव में हो (महिला कुंडली) पाप प्रभाव में न हो तों भी स्त्री पति के लिए कुछ भी कर सकने वाली होती है।


अरिश्टभंग योग👉  शुक्लपक्ष की रात्रि का जन्म हो और छठे या 8वें भाव में चन्द्र हो तो सर्वारिष्ट नाशक योग होता है। जन्म राशि का स्वामी 1, 4, 7, 10 में स्थित हों तो भी अरिश्टनाशक योग होता है। चन्द्रमा, स्वराशि, उच्च राशि या मित्रराशि में हो तो सर्वारिष्ट नष्ट होते है। चन्द्रमा के 10वें भाग में गुरू, 12वें में बुध, शुक्र व कुंडली के 12वें में पापग्रह हों तो भी अरिष्ट नष्ट होते है।


मूक योग👉 गुरू व षष्ठेश लग्न में हो अथवा बुध व षष्ठेश की युति किसी भी भाव (विशेषकर दूसरे) में हो। अथवा क्रूर ग्रह सनिध में और चन्द्रमा पापग्रहों से युक्त हो। या कर्क, वृश्चिक व मीन राशि के बुध को अमावस्य का चन्द्र सम्बन्ध है। तो मूक योग बनता है। इस योग में जातक गूंगा होता है।


विशेष👉  8 व 12 राशि पापग्रहों से युक्त हो तथा किसी भी राशि के अंतिम अंशो में वृष राशि का चन्द्र हो तथा चंद्र पर पापग्रहों की दृष्टि हो तो जातक जीवन भर गूंगा रहता है।


बधिर योग👉 शनि से चौथे स्थान में बुध हो तथा षष्ठेश त्रिक भावों में हो तो बधिर योग होता है। अथवा पूर्ण चन्द्र व शुक्र साथ बैठे हो तो बधिर योग बनता है। 12वें भाव में बुध-शुक्र की युति हो अथवा 3, 5, 9, 11 भावों में पापग्रह बिना शुभ ग्रहों से दृष्ट हों अथवा 6,12 भाव में बैठे षष्ठेश पर शनि की दृष्टि न हो तो भी बधिर योग होता है।

कुंडली में विभिन्न ग्रहों की अशुभ स्थिति के लक्षण


किसी मनुष्य के जीवन में कौन-सा ग्रह अशुभ प्रभाव डाल रहा है, इसका औसत निर्धारण उसके जीवन में घटने वाली घटनाओं के आधार पर भी ज्ञात किया जा सकता है | विभिन्न ग्रहों की अशुभ स्थिति पर निम्नलिखित लक्षण प्राप्त होते हैं –

1-सूर्य- तेज का अभाव, आलस्य, अकड़न, जड़ता, कन्तिहिनता, म्लान छवि, मुख(कंठ) में हमेशा थूक का आना | लाल गाय या वस्तुओं का खो जाना या नष्ट हो जाना, भूरी भैंस या इस रंग के सामान की क्षति | हृदय क्षेत्र में दुर्बलता का अनुभव |

2-चन्द्र- दुखी, भावुकता, निराशा, अपनी व्यथा बताकर रोना, अनुभूति क्षमता का ह्रास, पालतू पशुओं की मृत्यु, जल का अभाव (घर में), तरलता का अभाव (शरीर में), मानसिक विक्षिप्तता की स्तिथि, मानसिक असन्तुलन या हताशा के कारण गुमसुम रहना, घर के क्षेत्र में कुआं या नल का सूखना, अपने प्रभाव क्षेत्र में तालाब का सुखना आदि |

3-मंगल- दृष्टि दुर्बलता, चक्षु (आंख) क्षय, शरीर के जोड़ों में पीड़ा और अकड़न, कमर एवं रीढ़ की हड्डी में दर्द तथा अकड़न, रक्त की कमी, त्वचा के रंग का पिला पड़ना, पीलिया होना, शारीरिक रूप से सबल होने पर भी संतानोत्पत्ति की क्षमता का न होना, शुक्राणुओं की दुर्बलता, नपुंसकता (शिथिलता), पति पक्ष की हानि (स्वास्थ्य , धन, प्राण आदि) |

4-बुध- अस्थि दुर्बलता, दंतक्षय, घ्राणशक्ति का क्षय होना, हकलाहट, वाणी दोष, हिचकी, अपनी बातें कहने में गड़बड़ा जाना, नाक से खून बहना, रति शक्ति का क्षय (स्त्री-पुरुष दोनों की), नपुंसकता (स्नायविक), स्नायुओं का कमजोर पड़ना, बन्ध्यापन (स्नायविक), कंधो का दर्द, गर्दन की अकड़न, वैवाहिक सम्बन्ध में क्षुब्धता, व्यापार की भागीदारी में हानि, रोजगार में अकड़न, शत्रु उपद्रव, परस्त्री लोलुपता या सम्बन्ध, परपुरुष लोलुपता या सम्बन्ध, अहंकार से हानि, पड़ोसी से अनबन रहना, कर्ज |

5-बृहस्पति- चोटी के बाल का उड़ना, धन या सोने का खो जाना या चोरी हो जाना या हानि हो जाना, शिक्षा में रुकावट, अपयश , व्यर्थ का कलंक, सांस का दोष, अर्थहानी, परतंत्रता, खिन्नता, प्रेम में असफलता, प्रियतमा की हानि (मृत्यु या अनबन), प्रियमत की हानि (मृत्यु या अनबन), जुए में हानि, सन्तानहानि (नपुंसकता, बन्ध्यापन, अल्पजीवन), आत्मिक शक्ति का अभाव, बुरे स्वप्नों का आना आदि |

6-शुक्र– स्वप्नदोष, लिंगदोष, परस्त्री लोलुपता, शुक्राणुहीनता या कर्ज, नाजायज सन्तान, त्वचा रोग, अंगूठे की हानि (हाथ), पड़ोसी से हानि, कर्ज की अधिकता, परिश्रम करने पर भी आर्थिक लाभ नहीं, भूमि हानि आदि |

7-शनि- व्यवसाय में हानि, अर्थहानि, रोजगार में हानि, अधिकार हानि, अपयश, मान-सम्मान की हानि, कृषि-भूमि की हानि, बुरे कार्यों में प्रवृत्ति, मकान हानि, अधार्मिक प्रवृत्ति (नास्तिकता), रिश्वत लेते पकड़े जाना या रिश्वत में हंगामा और अपयश, रोग, आकस्मिक मृत्यु, ऊंचाई से गिरकर शरीर या प्राणहानि, अचानक धनहानि, दुर्घटना, निराशा, घोर अपमान, निन्दक प्रवृत्ति, राजदण्ड |

8-राहु- संतानहीनता, विद्याहानि, बुद्धिहानि, उज्जड़ता, अरुचि, पूर्ण नपुंसकता, बन्ध्यापन, अन्याय करने की प्रवृत्ति, क्रूरता, रोजगारहानि, भूमिहानि, आकस्मिक अर्थहानि, राजदण्ड, शत्रुपिड़ा, बदनामी, कारावास का दण्ड, घर से निकाला, चोरी हो जाना, चोर-डाकू से हानि, दु:स्वप्न, अनिद्रा, मानसिक असंयता |

9-केतु- रोग, ऋण की बढ़ोत्तरी, लड़ाई-झगड़े से हानि, भाई से दुश्मनी, घोर दु:ख, नौकरों की कमी, अस्त्र से शारीरक क्षति, सांप द्वारा काटना, आग से हानि, शत्रु से हानि, अन्याय की प्रवृत्ति, पाप-प्रवृत्ति, मांस खाने की प्रवृत्ति, राजदण्ड (कैद) |

कुंडली में मंगल केतु की युति के परिणाम


जिस व्यक्ति की कुंडली में मंगल केतु की अशुभ युति होती है  उसके सम्बन्ध अपने भाई , मित्रो , पड़ोसियों से ज्यादा लम्बे समय तक टिकते नहीं है, जैसे ही इसके सम्बन्ध दुसरो से खराब हो जाते है इसके अन्दर एक अजीब सी सोच उत्पन्न होती है के दुसरो के साथ क्या ऐसा करू जिससे वह परेशान हो जाए या मुसीबत में आ जाए । 

इस युति वाले जातको को संतान सम्बन्धी काफी कष्ट उठाने पड़ते है , गर्भपात की भी काफी घटनाए होती है । ऐसे युति वालो को उच्च रक्तचाप समबन्धी या खून से सम्बंधित परेशानियों का सामना करना पड़ता है यह 28  से 32  और 48  से 50  या मंगल , केतु के दशा में ज्यादा होने की सम्भावना बनी रहती है । 

इसी दौरान फोड़े फिनसिआ या किसी और तरह से चमड़ी , एलर्जी से खराब हो जाती है । इस युति के कारण जातक में जोश तो होता है लेकिन वह जोश ज्यादा लम्बे समय तक बरकरार नहीं रह पाता जिस कारण व्यक्ति अधिक समय तक किसी मुद्दे पर स्थिर नहीं रहते हैं, जल्दी ही उनके अंदर का उत्साह कम हो जाता है और वह उस काम से हट जाते हैं । यह युति व्यक्ति को  हिंसक बना देती  है।

इस योग से प्रभावित जातक अपने क्रोध पर नियंत्रण नहीं रख पाते और कभी-कभी जेल यात्रा भी कर बैठते हैं। अगर यह युति शुभ हो तो ऐसा जातक पुलिस और सेना में नौकरी करता है और आध्यात्मिक विचारो में रूचि रखने वाला होता है, साधु सन्यासी से विशेष रूप से प्रभावित रहते है , इनके घर में  कोई सन्यासी भी  हो सकता है। यह युति जातक को जीवन में अचानक लाभ - हानि करवा देती है। 

यह युति ग्रहो की अपनी अपनी दशा में धन दौलत और मान  सम्मान भी भरपूर देती है ।यह युति राजनीति और सरकार से सम्बंधित कार्य में उन्नति भी करवा देती है इस युति वालो को दूसरे के ऊपर शासन  करने की लालसा बनी रहती है. 

कुंडली के 12 भावों में लग्नेश की स्थिति और उनका प्रभाव


माना जाता है कि जन्म कुंडली के जिस भाव में लग्नेश स्थित होता है तो उस भाव से संबंधित फलों में व्यक्ति की रुचि अधिक होती है अथवा उस भाव के फलों का प्रभाव जातक के जीवन में देखा जाता है. यदि लग्नेश कुंडली में पीड़ित है तब व्यक्ति को समस्याओं का सामना करना पड़ेगा. जैसे कि लग्नेश का 6,8,12 भावों में जाना शुभ नहीं माना जाता है क्योंकि छठा भाव रोग, ऋण तथा शत्रुओं का है तो जातक किसी ना किसी रुप से त्रस्त रहेगा. आठवें भाव में जाने से भी जातक कठिनाईयों में रहेगा तथा बारहवाँ भाव भी व्यय भाव है तो लग्नेश की स्थिति यहाँ भी शुभ नहीं है.

वैसे तो माना गया है कि लग्नेश जिस क्षेत्र में जाएगा तो उसी क्षेत्र की तरफ झुकाव भी होगा. इस लेख के माध्यम से लग्नेश की कुंडली के बारह भावों में स्थित होने के फल बताए जाएंगे जो निम्नलिखित हैं :-

लग्नेश की लग्न में स्थिति – Ascendant Lord in Ascendant

कुंडली के लग्न में ही लग्नेश भी स्थित है और वह किसी तरह के पाप प्रभाव में भी नहीं है तब लग्न अत्यधिक शक्तिशाली बन जाता है. व्यक्ति बहुत मजबूत होता है, उसके इरादे कोई नहीं हिला सकता है. पुरुषार्थ से जीवन में सभी कुछ हासिल करता है. अपनी चाहतों को अधिक से अधिक पूरा करने की चाह होती है क्योंकि लग्न में ही स्थित है तो अपना ध्यान पहले करने वाला जातक होता है. अपनी ओर सभी का ध्यान भी चाहता है.

लग्नेश की दूसरे भाव में स्थिति – Ascendant Lord in 2H

जन्म कुंडली का दूसरा भाव धन भाव होने के साथ कुटुम्ब का भी माना जाता है. यदि लग्नेश कुंडली के दूसरे भाव में स्थित है तब व्यक्ति अपने प्रयासों से धन कमाता है. कुटुम्ब भाव है तो व्यक्ति का झुकाव अपने घर-परिवार की ओर काफी ज्यादा होता है. धन कमाने में जुटा रहता है और व्यक्ति के भीतर संस्कार भी देखे जा सकते हैं.

लग्नेश की तीसरे भाव में स्थिति – Ascendant Lord in 3H

तीसरे भाव को प्रयासों का माना गया है. कम्यूनिकेशन्स के लिए भी इसी भाव को देखा गया है. यदि लग्नेश तीसरे भाव में स्थित हो तब व्यक्ति को अपने शौक पूरे करने का जोश रहता है. मौज मस्ती व दोस्तों के साथ रहना अच्छा लगता है लेकिन बात-बात में क्रोध करने वाला भी होता है, भले ही वह कई बार क्रोध को अप्रत्यक्ष रुप से ही प्रकट करता हो. आलसी होता है किसी तरह के कोई प्रयास नहीं करना चाहता है. सामाजिक कार्यों में रुचि नहीं होती है. जैसा कि यह भाव कम्यूनिकेशन्स का भी है तो जातक लोगों से मेलजोल कम ही रखता है. समाज में कैसे रहा जाता है इसकी जानकारी नहीं होती है लेकिन अपनी अकड़ में रहना अच्छा लगता है.

लग्नेश की चतुर्थ भाव में स्थिति – Ascendant Lord in 4H

चतुर्थ भाव को सुख भाव कहा गया है तथा माता को भी इसी भाव से देखते हैं. यदि लग्नेश चतुर्थ भाव में स्थित है तब व्यक्ति का झुकाव अपनी माता की ओर होगा. सभी प्रकार की सुख सुविधाओं को पाने वाला होगा. सुख-संपत्ति के प्रति जातक को घमंड भी रहेगा. दूसरों को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति भी व्यक्ति में देखी जा सकती है. लग्नेश के चतुर्थ में होने से वह दशम भाव को भी दृष्ट करेगा जिससे व्यक्ति का अपने व्यवसाय के प्रति रुझान देखा जा सकता है.

लग्नेश की पंचम भाव में स्थिति – Ascendant Lord in 5H

पंचम भाव एक धर्म त्रिकोण माना गया है और इसे लक्ष्मी स्थान भी कहते हैं. व्यक्ति को नाम व शोहरत मिलेगी, इस भाव से शिक्षा भी देखी जाती है तो व्यक्ति अच्छी शिक्षा प्राप्त करेगा. बुद्धिमान होगा और अपने बल पर धनी बनने वाला भी होगा. पंचम भाव से भावुकता भी देखी जा हैं क्योंकि प्रेम संबंध भी यहीं से देखे जाते हैं. जब भाव ही नहीं होगा तो प्रेम कैसे होगा. व्यक्ति का भावुकता के प्रति भी झुकाव देखा जा सकता है.

यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य यह है कि यदि लग्न और लग्नेश के मध्य राशि परिवर्तन हो रहा है तब संतान प्राप्ति में कमी हो सकती है. यदि लग्नेश एक पाप ग्रह होकर पंचम में स्थित है या पंचम में पाप ग्रहों के प्रभाव में है तब व्यक्ति की बुद्धि भ्रमित सी रहती है.

 लग्नेश की छठे भाव में स्थिति – Ascendant Lord in 6H

छठे भाव को शुभ नहीं माना गया है. यह भाव रोग, ऋण तथा शत्रुओं का भाव माना गया है. शत्रु प्रत्यक्ष हों या अप्रत्यक्ष हों, उनका आकंलन इसी भाव से किया जाता है. व्यक्ति रोगग्रस्त रह सकता है यदि कुंडली का दशाक्रम भी खराब चल रहा हो.

छठे भाव का दूसरा पहलू देखें तो यह भाव प्रतिस्पर्धा का भी माना गया है और शत्रु व्यक्ति के प्रतिद्वंद्वी भी हो सकते हैं. व्यक्ति शत्रुओं का नाश करने वाला होगा. प्रतियोगिताओं में जीतने वाला होगा अर्थात हर प्रतिस्पर्धा को जीतकर चीजें हासिल करने वाला होगा. छठे भाव से माता के परिवार को देखा जाता है अर्थात जातक के ननिहाल को देखा जाता है. लग्नेश का इस भाव में होना जातक को उसके ननिहाल से ज्यादा जोड़कर रखता है. ननिहाल की ओर झुकाव अधिक रहता है. व्यक्ति अपने पिता को नाम देने वाला होता है.

इस भाव में होने से व्यक्ति थोड़ा भ्रमित रहने के साथ किसी ना किसी पचड़े में भी फंसा रहता है लेकिन जीवन में अपनी मेहनत से कमाने वाला होता है. अगर लग्नेश छठे भाव में पीड़ित होकर स्थित है तब कोई भी लाभ जातक को नहीं मिलेगा. किसी ना किसी समस्या से घिरा रहेगा और ईर्ष्यालु स्वभाव का होगा. यदि छठे में पीड़ित है लेकिन वर्ग कुंडलियों में स्थिति में सुधार है तब थोड़ा हालात सुधर सकते हैं.

लग्नेश की सप्तम भाव में स्थिति – Ascendant Lord in 7H

इस भाव से सभी तरह की साझेदारियाँ देखी जाती है. व्यक्ति का जीवनसाथी भी इसी भाव से देखा जाता है. इस भाव से यात्राएँ भी देखी जाती हैं. व्यक्ति की प्रसिद्धि भी इस भाव से देखी जाती है कि वह जनता में लोकप्रिय होगा कि नहीं. यह भाव काम त्रिकोण कहलाता है तो व्यक्ति की ईच्छाएँ भी इस भाव से देखी जाएगी. अगर लग्नेश सप्तम भाव में स्थित होगा तो इस भाव से मिलने वाले सभी फलों की तरफ उसका झुकाव रहेगा.

लग्नेश यदि सप्तम भाव में शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तब सब कुछ मिलेगा लेकिन अगर अशुभ प्रभाव में होगा तब इस भाव के फलों को नहीं पा सकेगा. विवाहित जीवन भी कष्टपूर्ण रहेगा. व्यक्ति अपने घर से भी दूर चला जाता है.

लग्नेश की अष्टम भाव में स्थिति – Ascendant Lord in 8H

आठवें भाव को अच्छा नहीं माना गया है लेकिन गूढ़ विद्याओं तथा रिसर्च काम के लिए इसे अच्छा कहा गया है. यदि आठवें भाव में लग्नेश अच्छी हालत में हैं तब व्यक्ति का झुकाव गूढ़ विद्याओं की ओर हो सकता है. भले ही वह उन्हें सीखे ना लेकिन उनमें सदा दिलचस्पी बनी रहती है. व्यक्ति स्वयं भी रहस्यमयी बना रह सकता है. कोई उसके बारे में ज्यादा नहीं जान पाएगा कि वह भीतर से कैसा है. किसी ना किसी विवाद में भी घिरा रह सकता है.

आठवाँ भाव शुभ भी नहीं माना जाता है इसलिए यहाँ लग्नेश के होने से बुद्धि भी भ्रम में रहेगी. व्यक्ति का झुकाव धार्मिकता की ओर भी रहेगा जो अत्यधिक गहरी बातें होगी धर्म की खासकर उनकी तरफ रुचि ज्यादा रहेगी.

 लग्नेश की नवम भाव में स्थिति – Ascendant Lord in 9H

नवम भाव सबसे बली धर्म त्रिकोण हैं और पूरी कुंडली का सबसे अधिक महत्वपूर्ण भाव भी हैं क्योंकि यहीं से भाग्य भी देखा जाता है. यदि यह भाव बली है तो भाग्य से सभी कुछ व्यक्ति को जीवन में मिल जाएगा. इस भाव से पिता तथा गुरु दोनों का आंकलन किया जाता है. यदि लग्नेश इस नवम भाव में स्थित हो तब व्यक्ति का झुकाव धर्म की ओर तो होगा ही उसे अपने पिता तथा गुरु की ओर भी लगाव रहेगा. गुरुजनों तथा वरिष्ठ लोगों का आदर करेगा. शिक्षित होगा तथा जीवन को अच्छे तरीके से जीने वाला रहेगा. लग्नेश का नवम में जाना राजयोगकारी होगा.

यदि लग्नेश नवम भाव में पीड़ित है तब पिता से कोई लगाव नहीं होगा और लगाव होगा भी तो पिता से कुछ मिलेगा नहीं. जीवन में भाग्य को जगाने के लिए संघर्ष ज्यादा करने पड़ेगें. एक आम जीवन बिताने वाला व्यक्ति हो सकता है.

लग्नेश की दशम भाव में स्थिति – Ascendant Lord in 10H

लग्नेश का दशम भाव में जाना अच्छा माना गया है. यदि इस भाव में लग्नेश उच्च का हो जाए या एक अच्छी हालत में भी हो तब व्यक्ति किसी ना किसी संस्था को बनाने वाला होता है. अपने कार्य क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान भी बनाता है. व्यक्ति का रुझान अपने कार्यक्षेत्र अथवा व्यवसाय की ओर अधिक रहेगा और कर्म करना ही अपना पहला कर्तव्य भी समझेगा.

अगर लग्नेश दशम भाव में पीड़ित अवस्था में है अथवा नीच का भी है तब व्यक्ति पैसा तो कमाएगा लेकिन बुरे कर्मों से और नीच कर्म की ओर झुकाव भी ज्यादा रहेगा. किसी ना किसी तरह से पैसा कमाने में ही मन लगा रहेगा. मन में सदा धन कमाने की उधेड़बुन भी चलती रहेगी.

लग्नेश की एकादश भाव में स्थिति – Ascendant Lord in 11H

एकादश भाव को उपचय भाव भी कहा गया है. यह एक काम त्रिकोण भी है. लाभ तथा कला को भी यहाँ से देखा जाता है. पिता की ओर के रिश्तेदारों को भी इसी भाव से देखा जाता है. मित्रों को और उनके मध्य की लोकप्रियता को भी इसी भाव से देखा जाता है. यदि लग्नेश, एकादश भाव में स्थित है तब व्यक्ति मित्रों की ओर झुका रहेगा और पिता की ओर के लोगों से लगाव रहेगा. अपने आप को स्थापित करने तथा नाम, शोहरत कमाने में भी रुचि रहेगी.

यदि लग्नेश पीड़ित होकर एकादश भाव में स्थित है तब गलत तरीके से काम करने वाला होगा. अपने मतलब से ही लोगों से बात करेगा अर्थात मतलबी होगा. अपने लोगों से दूर रहेगा और नीच प्रवृत्ति वाला, घटिया तथा स्वार्थी होगा.  

लग्नेश की द्वादश भाव में स्थिति – Ascendant Lord in 12H

द्वादश भाव को व्यय भाव कहा कहा गया है. इस भाव से हर तरह के खर्चे देखे जाते हैं. विदेश यात्राएँ भी इस भाव से देखी जाती हैं. लग्नेश के इस भाव में जाने से व्यक्ति खर्चीला होगा, यात्राओं में रुचि रहेगी और अपने घर से दूर रहने वाला होगा. इस भाव से दानादि भी देखा जाता है और यदि लग्नेश अच्छी हालत में इस भाव में स्थित है तब धार्मिक कार्यों में दान देने में उसकी रुचि रहेगी, दानी होगा.

यदि लग्नेश इस भाव में पीड़ित अवस्था में है तब घर से दूर जाकर संघर्ष करेगा और अकेले रहने में उसकी रुचि भी रहेगी. विषय वासनाओं की ओर झुकाव अधिक होगा और उन पर अत्यधिक पैसा खर्च करेगा.