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पति पत्नी में होगा जबरदस्त प्रेम जब कुंडली में होंगे ये योग

 


पति-पत्नी के बीच नोक-झोंक होना आम बात है लेकिन कभी-कभी ये नोक-झोंक झगड़े का रूप ले लेती है और मनमुटाव की स्थिति बन जाती है। कुछ मामलों में तो पति-पत्नी के बीच अलगाव भी हो जाता है। वहीं कुछ जोड़े ऐसे भी होते हैं, जिनके बीच प्यार हमेशा बना रहता है। ज्योतिषीय दृष्टि से देखा जाए तो वर-वधू की कुंडली में ग्रहों की कुछ ऐसे स्थितियां होती हैं जो वैवाहिक जीवन में हमेशा सुख-शांति बनाए रखने में मदद करती हैं। आज हम आपको ग्रहों की ऐसी ही स्थितियों के बारे में बताएंगे जिनसे पति-पत्नी के बीच प्यार बेशुमार बना रहता है।

लग्न में बुध और शुक्र की युति होती है शुभ

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यदि किसी महिला की कुंडली में बुध-शुक्र की युति लग्न भाव यानी कुंडली के पहले घर में हो तो उनका पति उन्हें तहे दिल से प्यार करने वाला होता है। इसके साथ ही दांपत्य जीवन में टकराव की स्थिति भी कम ही बनती है और पति-पत्नि एक दूसरे को समझने वाले होते हैं। इसके साथ ही दोनों के बीच रोमांस की भी अधिकता देखने को मिलती है।

सप्तम भाव

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अगर पति-पत्नी की कुंडली के सप्तम भाव में कोई शुभ ग्रह जैसे शुक्र, बुध, गुरु या चंद्रमा विराजमान हो तो भी वैवाहिक जीवन सुखद बना रहता है। ऐसे जातक अपने वैवाहिक जीवन में चल रहे विवाद को कभी किसी से साझा नहीं करते और आपस में मिलकर वैवाहिक जीवन को सुखद बनाए रखने की कोशिश करते हैं। संतान पक्ष से भी ऐसे लोगों को संतुष्टि मिलती है। ऐसे लोग उच्च शिक्षित, विवेकी होते हैं और अपने पार्टनर की हमेशा इज्जत करते हैं।

लग्न और सप्तम भाव में हों शुभ ग्रह

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यदि किसी जातक की कुंडली के लग्न और सप्तम दोनों भावों में शुभ ग्रह विराजमान हैं तो वैवाहिक जीवन बहुत आनंनदायक होता है। बल्कि ऐसे लोगों को अक्सर शादी के बाद जीवन में सफलता मिलती है। ऐसे लोगों का पार्टनर अच्छे परिवार से ताल्लुक रखता है और शादी के बाद हमेशा अपने जीवनसाथी को खुश रखता है। ऐसे लोगों के दांपत्य जीवन को लोगों को जलन भी हो सकती है।

सप्तम भाव पर शुभ ग्रहों की दृष्टि

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गुरु, शुक्र, बुध और चंद्रमा में से एक या एक से अधिक शुभ ग्रहों की दृष्टि सप्तम भाव पर हो तो ऐसे लोगों को योग्य पार्टनर मिलता है। हालांकि बुध यदि किसी पाप ग्रह जैसे राहु, केतु, शनि, मंगल के साथ युत होकर सप्तम भाव को देख रहा हो तो सामान्य फल प्राप्त होते हैं। लेकिन यदि शुभ ग्रह यदि बिना किसी अशुभ प्रभाव के सप्तम भाव को देखते हैं तो ऐसे लोगों को वैवाहिक जीवन की गाड़ी को आगे बढ़ाने में कोई परेशानी नहीं होती।

यदि आपकी कुंडली में भी ग्रहों की ऐसी स्थिति है तो समझ जाइए आपको भी वैवाहिक जीवन में सुखद परिणाम प्राप्त होंगे। और यदि आपकी शादी नहीं हुई है तो आपको शादी कर लेनी चाहिए।

महंगे रत्न नहीं, पेड़-पौधों की जड़े करेंगी चमत्कार


ग्रह के अनुसार भी पौधे रोपे जा सकते हैं। इसमें सूर्य ग्रह का अर्क, चंद्रमा को पलाश, मंगल का खैर, बुध का अपमार्ग, गुरु का पीपल, शुक्र का सफेद चंदन या गूलर, शनि का शमी, राहु का दुर्वा व केतु का कुश वृक्ष माना जाता है। इन पौधों को रोपने से ग्रह शांत होते हैं। जीवन में खुशहाली भी आती है।



सूर्य

बेलमूल की जड़ में सूर्य का वास माना गया है। मान-सम्मान, यश, कीर्ति, तरक्की की चाह रखने वालों को रविवार के दिन पिंक कपड़े में इसकी जड़ को बांधकर दाहिनी भुजा में बांधना चाहिए। सूर्य के बुरे प्रभाव नष्ट होकर शुभ प्रभाव में वृद्धि होती है। अपच, चक्कर आना, हार्ट और रीढ़ से संबंधित रोगों में इससे आराम मिलता है।

मंत्र - ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः   

चंद्र

चंद्रमा से संबंधित बुरे प्रभाव कम करने के लिए खिरनी की जड़ का प्रयोग किया जाता है। सोमवार के दिन सफेद कपड़े में हाथ में बांधने पर इसके शुभ प्रभाव मिलना प्रारंभ हो जाते हैं। चंद्रमा के बुरे प्रभाव के फलस्वरूप व्यक्ति कफ और लिवर संबंधी बीमारियों से हमेशा घिरा रहता है। मानसिक रूप से विचलित रहता है।

मंत्र - ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्रमसे नमः

मंगल

अनंतमूल की जड़ में मंगल ग्रह का वास होता है। यह जड़ मंगल के बुरे प्रभाव को कम करके, उससे संबंधित जो परेशानियां आ रही होती हैं उन्हें दूर करती है। इसे लाल रंग के कपड़े में बांधकर सीधे हाथ में बांधा जाता है। इसे पहनने का सबसे अच्छा दिन मंगलवार है। इससे त्वचा, लिवर, पाइल्स और कब्ज की समस्या दूर होती है।

मंत्र - ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः

बुध

विधारा मूल की जड़ का उपयोग बुध के बुरे प्रभाव कम करने के लिए किया जाता है। बुध के बुरे प्रभाव से व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता प्रभावित होती है और उसकी निर्णय लेने की क्षमता कम होती है। विधारा मूल की जड़ को बुधवार के दिन हरे रंग के कपड़े में बांधकर सीधे हाथ में उपर की ओर बांधा जाता है। इस जड़ को बांधने वालों को दुर्गा की आराधना करना चाहिए। इसके प्रभाव से नर्वस डिस्ऑर्डर, ब्लड प्रेशर, अल्सर और एसिडिटी में आराम मिलता है।

मंत्र - ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं सः बुधाय नमः

गुरु

यदि किसी के विवाह में बाधा आ रही हो। कार्य-व्यवसाय, नौकरी में मनचाही तरक्की नहीं मिल पा रही हो तो यह सब गुरु के दुष्प्रभाव के कारण होता है। यदि ऐसा है तो व्यक्ति को हल्दी की गांठ बांधना चाहिए। गुरुवार के दिन पीले कपड़े में हल्दी की गांठ बांधकर पास रखने से कार्यों में सफलता मिलने लगती है। इसके प्रभाव से लिवर, चिकन पॉक्स, एलर्जी और पेट संबंधी रोगों में आराम मिलता है।

मंत्र - ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः

शुक्र

शुक्र ग्रह के बुरे प्रभाव कम करने के लिए अरंडमूल की जड़ का उपयोग किया जाता है। विलासितापूर्ण जीवन की चाह रखने वालों को इसकी जड़ का उपयोग करना चाहिए। शुक्रवार के दिन सफेद कपड़े में इसकी जड़ को बांधकर दाहिनी भुजा पर बांधे। इसके प्रभाव से खांसी, अस्थमा, गले और फेफड़ों से संबंधित रोगों में आराम मिलता है।

मंत्र - ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः

शनि

यदि किसी के जीवन में लगातार दुर्घटनाएं, धन हानि और बीमारी बनी रहती है तो ऐसा व्यक्ति शनि के बुरे प्रभाव से गुजर रहा होता है। इस बुरे प्रभाव को कम करने के लिए धतूरे की जड़ बांधी जाती है। इसे पहनने से सकारात्मक उर्जा का प्रवाह बनता है और व्यक्ति के जीवन में आ रही बाधाएं दूर होती हैं। इस की जड़ को शनिवार के दिन काले कपड़े में बांधकर दाहिनी भुजा में बांधना चाहिए। मस्तिष्क संबंधी रोगों में इस जड़ से बहुत फायदा मिलता है।

मंत्र - ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः

राहु

राहु ग्रह के बुरे प्रभाव कम करने के लिए सफेद चंदन का टुकड़ा या इस पेड़ की जड़ का उपयोग किया जाता है। शनिवार या सोमवार को सफेद या भूरे रंग के कपड़े में इसे बांधकर पास रखा जाता है। महिलाओं को गर्भाशय से संबंधित रोग, त्वचा की समस्या, गैस प्रॉब्लम, दस्त और बुखार में इस जड़ का चमत्कारी प्रभाव देखा गया है। बार-बार दुर्घटनाएं होती हैं तो भी इस जड़ का प्रयोग करना चाहिए।

मंत्र - ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं सः राहवे नमः

केतु

अश्वगंधा की जड़ का प्रतिनिधि ग्रह केतु है। केतु के शुभ प्रभाव में वृद्धि करने और बुरे प्रभाव कम करने में अश्वगंधा चमत्कार की तरह काम करता है। अश्वगंधा की जड़ को नीले रंग के कपड़े में बांधकर शनिवार को सीधे हाथ में बांधा जाता है। इसके प्रभाव से स्मॉलपॉक्स, यूरीन इंफेक्शन और त्वचा संबंधी रोगों में आराम मिलता है। जीवन में चल रही मानसिक परेशानियां भी इससे कम होती हैं।

मंत्र - ॐ स्त्रां स्त्रीं स्त्रौं सः केतवे नमः

ध्यान रखने योग्य बातें

1. प्रत्येक पेड़ या पौधे की जड़ को शुभ मुहूर्त जैसे रवि पुष्य, गुरु पुष्य या अन्य शुभ मुहूर्त से एक दिन पहले रात को निमंत्रण दिया जाता है। उसके बाद अगले दिन शुभ मुहूर्त या शुभ चौघडि़या देखकर घर लाना चाहिए।

2. जड़ को कच्चे दूध और गंगाजल से धोकर पूजा स्थान में रखना चाहिए। इसके बाद उससे संबंधित ग्रह के मंत्र की एक माला जाप करें।

3. सुगंधित घूप लगाने के बाद अपनी मनोकामना पूरी करने का संकल्प लें और उसे बांध लें।

जाने कोन सा ग्रह कोन सी बीमारी देगा

 


हम सभी जानते हैं कि हमारे सौरमंडल में 9 ग्रह होते हैं और ज्योतिष के अनुसार इन 9 ग्रहों का हमारे जीवन में किसी न किसी रूप में प्रभाव देखने को मिलता है. यह ग्रह न केवल इंसानों पर बल्कि पृथ्वी पर पाई जाने वाली विभिन्न प्रकार की प्रजाति, खनिज, और पेड़-पौधों पर भी प्रभाव डालते हैं. सौरमंडल में मौजूद प्रत्येक ग्रह मनुष्यों के शरीर के किसी न किसी अंग को   प्रभावित करते है.


1-गुस्सा ज्यादा, जब किसी की कुंडली में सूर्य घर 1 में हो,सूर्य मंगल एक साथ हों,सूर्य शनि एक साथ या सूर्य शनि मंगल एक साथ हों तो ऐसे व्यक्ति को ज्यादा गुस्सा और जल्दी ही गुस्सा आ जाता है।

            


2- बुध मंगल एक साथ हों तो ऐसे व्यक्ति को खून से सम्बंधित परेशानी से गुजरना होता है साथ ही जब मंगल के कारण से बुध ज्यादा खराब हो जाये तो BP की परेशानी साथ ही मंगल बुध दोनों ज्यादा बुरे हाल तो पागल पन की बीमारी हो जाती है। और गैस एसिडिटी कब्ज की भी शिकायत रहती है। इस योग के कारण लिवर से सम्बंधित बीमारी भी हो जाती हैं।


3- मंगल शनि का योग भी गैस की परेशानी देता है।


4- शनि देव घर 1 में हों तो भी गैस की प्रॉब्लम देते हैं।


5- सूर्य शुक्र एक साथ हों तो शरीर में जोश की कमी हो जाती है। ऐसे व्यक्ति में सेक्स की छमता कमजोर हो जाती है। जीवन साथी के शरीर में भी अंदरूनी बीमारी हो जाती है।


6- राहू शुक्र के मिलने से व्यक्ति को नपुंष्कता अनुभव होती है। किउंकि ऐसा व्यक्ति कम उम्र में ही अपने वीर्य हो नष्ट कर लेता है। वीर्य से सम्बंधित बीमारी जैसे स्पर्म की कमी आदि, इसके अतिरिक्त शरीर में कैलशियम की कमी हो जाती है।


7- बुध और गुरु देव व्रहष्पति मिलते हों तो अस्थमा साइनस की बीमारी हो जाती है। इये दोनों जिस घर में बैठे हों उस घर से सम्बंधित बीमारी भी देते हैं। जैसे दोनों घर 7,12 में बैठ जाएँ तो नपुंष्क तक बना देते हैं।


8- सूर्य बुध राहू मिलते हों तो आथरायटिश की बीमारी देते हैं।


9- सूर्य नीच का या शनि राहू के साथ सम्बन्ध बना ले और गुरु बुध या गुरु राहू का योग हो जाये तो पीलिया जैसी गन्दी बीमारी जीवन में कई बार होती है।


10- जिस व्यक्ति की कुंडली में केतु देव नीच के होंगे उसके कमर पाँवो जोड़ों में दर्द की शिकायत बनी रहेगी। साथ ही उसे पेशाब और किडनी के परेशानी भी देते हैं।


11-बुध गुरु,राहू गुरु दिमाग को सही डारेक्सन नहीं मिलने देते। अजीब अजीब सी भ्रांतियां होती हैं।


12- मंगल बुध एक साथ और सूर्य शनि भी मिल रहे हों तो कैंसर जैसी बुरी बीमारी बन जाती है। 


13- राहू गुरु मिलते हों तो अस्थमा t b(तपेदिक) फेफड़ों से सम्बंधित और साँस की तकलीफ देते हैं।


14- चन्द्र देव जब शुक्र देव के साथ मिलते हो तो आँखों और चमड़ी से सम्बंधित बीमारी जैसे सफेद दाग,चमड़ी पर चककत्ते आदि हो जाते हैं।


15- चन्द्र बुध जिस जातक की कुंडली में मिलते हों बो व्यक्ति बहुत ही जिददी हो जाता है और जिद ज्यादा होने के कारण किसी की बात नहीं मानता और अपना जीवन नर्क बना लेता है।


16- सूर्य मंगल बुध या बुध मंगल मिलते हों तो ऐसे व्यक्ति को B P हाई की दिक्कत कम उम्र में शुरू हो जाती है। नशों नाड़ियों में ब्लोकेज हो जाते हैं। खून से सम्बंधित बीमारी परेशानी खड़ी रहती है।


17- केतु खराब नीच के मन्दे हों और गुरु देव भी बुरे हाल साथ ही चन्द्र देव भी नीच मन्दे हों तो नर औलाद पैदा करने की शक्ति नष्ट हो जाती है। बेशक कन्या सन्तान पैदा हो जाये।

मंगल का जातक के जीवन पर प्रभाव और उपाय

 


ज्योतिष शास्त्र के अनुसार मंगल मेष और व्रश्चिक राशियों का स्वामी है। यह मकर राशि में उच्च और कर्क राशि में नीचस्थ होता है ।


जन्म कुंडली मे मंगल के योग जीवन की दशा बदलने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते है। कुंडली में मंगल की अच्छी दशा बेहद कामयाब बनाती है. वहीं इस ग्रह की बुरी दशा इंसान से सब कुछ छीन भी सकती है. मंगल के बहुत से शुभ और अशुभ योग हैं।


जन्म कुंडली के 1,4,7,8,12 भावों में मंगल की उपस्थिति जातक को मांगलिक घोषित करती है,हालाँकि कई स्थितियां ऐसी होती हैं जिनके कारण जातक का मंगल दोष भंग होता है अथवा आंशिक मांगलिक होता है ।इसका विस्तृत विवरण कुछ समय पश्चात करेंगे।


ऐसा लिखा गया है:


लग्ने व्यये च पाताले यामित्रे चाष्टमे कुज:।

कन्या वै मृतभर्ता स्याद् भर्ता भार्या हनिष्यति।।


1, 12, 4, 7, 8 इन स्थानों में जिसके मंगल हो वह मंगली होता है, जो वर, कन्या मंगली हो और उनका विवाह हो तो शुभ है और जो वर मंगली और कन्या सादी या कन्या मंगली वर सादा हो तो अशुभ है।


यामित्रे च यदा सोरिर्लग्ने वा हिबुकेथवा

नवमे द्वादशे चैव भौम दोषो न विद्मते।।


जिसके 7, 1, 4, 9, 12 इन स्थानों में शनिश्चर हो तो मंगली का दोष उसको नहीं होता।


 (ज्योतिष सर्वसंग्रह)


मांगलिक होने, आंशिक मांगलिक होने, मांगलिक होते हुए भी मांगलिक न होने बारे बहुत अधिक अवधारणाएं बन गयी हैं। 


विभिन्न प्रदेशों में भिन्न भिन्न पैमाने हैं।


मांगलिक कन्या का अमांगलिक वर और मांगलिक वर का अमांगलिक कन्या के साथ विवाह अपने आपमें सम्पूर्ण विषय है।


कुंडली मिलान के समय सप्तम भाव के साथ धन, वाणी, कुटुम्ब भाव, सुख भाव, संतान भाव, भाग्य भाव, लाभ भाव और शयन सुख भाव देखने और दोनों कुंडलियों का इस परिप्रेक्ष्य में मिलान करना और तुलनात्मक अध्ययन अति आवश्यक है।


केवल मात्र कम्पयूटर अथवा मोबाइल में उपलब्ध कुंडली मिलान साफ्टवेयर से काम नहीं चलाना चाहिए।


मंगल पराक्रम, शौर्य, साहस, सेना, सेना पति, शत्रु, रकपात्त, जोखिम,सामर्थ्य, क्रोध, भूमि,लघु भ्राता,ऑपरेशन, पुत्र, सन्तान से सम्बंधित है।


मंगल को सातवीं दृष्टि के साथ साथ चौथी और आठवीं विशेष दृष्टि भी प्राप्त है।


मंगल कुंडली में नीचस्थ हो, अशुभ ग्रहों से द्रष्टय हो, अशुभ भाव में हो तो जातक के जीवन पर अत्यधिक दुष्प्रभाव डालता है।


 यदि मंगल का सम्बन्ध छटे भाव से हो अथवा उपस्थित हो तो बड़े से बड़ा शत्रु भी जातक के सामने टिक नहीं सकता । 


सातवें घर पर मंगल की दृष्टि या उपस्थिति वैवाहिक जीवन को उथल पुथल कर सकती है ।


मंगल शुभ ग्रहों के साथ हो, शुभ भाव में हो, शुभ ग्रहों से द्रष्टय हो तो जातक को जीवन में

असीमित ऊचांई तक ले जाता है ।


ऐसे जातक बड़े बड़े शूरवीर, योद्धा, सेनापति बनते हैं, सर्जन, इंजीनयर, होटल व्यवसायी बनते हैं और अपने व्यवसाय,  लड़ाई के मैदान में एक इतिहास बना जाते हैं। उनका सारा सीना शूरवीरता के कारण मिले तमगों से भरा होता है। 


शौर्यता, शूरवीरता, साहस, सफल उद्यमी का एक ऐसा उदाहरण जिसे वर्तमान और आने वाली पीढ़ियां अपना आदर्श मान लेती हैं। 


एक सम्मानपूर्ण, शौर्य से भरा हुआ जीवन, मान, सम्मान, आदर, प्रतिष्ठा सब कुछ मिलता है।


केवल मंगल को लेकर ही सारी कुंडली की व्याख्या नहीं हो सकती, इसके साथ साथ दूसरे ग्रह, भाव, दृष्टि, शुभ, अशुभ, महादशा, दशा, गोचर सब कुछ देखने के बाद ही कुंडली की व्याख्या हो सकती है।


इसलिए मंगल से परेशान न हों।


मंगल को मंगल रहने दें, अपने जीवन में अपने जीवन साथी के जीवन में अमंगल न बनने दें ।


मंगल के प्रमुख शुभ और अशुभ योग


मंगल का पहला अशुभ योग 


👉 किसी कुंडली में मंगल और राहु एक साथ हों तो अंगारक योग बनता है.

👉अक्सर यह योग बड़ी दुर्घटना का कारण बनता है.

👉 इसके चलते लोगों को सर्जरी और रक्त से जुड़ी गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ता है.

👉 अंगारक योग इंसान का स्वभाव बहुत क्रूर और नकारात्मक बना देता है.

👉 इस योग की वजह से परिवार के साथ रिश्ते बिगड़ने लगते हैं.


मंगल का दूसरा अशुभ योग 


अंगारक योग के बाद मंगल का दूसरा अशुभ योग है मंगल दोष. यह इंसान के व्यक्तित्व और रिश्तों को नाजुक बना देता है.

👉 कुंडली के पहले, चौथे, सातवें, आठवें और बारहवें स्थान में मंगल हो तो मंगलदोष का योग बनता है.

👉 इस योग में जन्म लेने वाले व्यक्ति को मांगलिक कहते हैं.

👉 कुंडली की यह स्थिति विवाह संबंधों के लिए बहुत संवेदनशील मानी जाती है.


मंगल का तीसरा अशुभ योग 

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नीचस्थ मंगल तीसरा सबसे अशुभ योग है. जिनकी कुंडली में यह योग बनता है, उन्हें अजीब परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है.

👉 इस योग में कर्क राशि में मंगल नीच का यानी कमजोर हो जाता है.

👉  जिनकी कुंडली में नीचस्थ मंगल योग होता है, उनमें आत्मविश्वास और साहस की कमी होती है.

👉 यह योग खून की कमी का भी कारण बनता है.

👉 कभी–कभी कर्क राशि का नीचस्थ मंगल इंसान को डॉक्टर या सर्जन भी बना देता है.


मंगल का चौथा अशुभ योग 

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मंगल का एक और अशुभ योग है जो बहुत खतरनाक है. इसे शनि मंगल (अग्नि योग) कहा जाता है. इसके कारण इंसान की जिंदगी में बड़ी और जानलेवा घटनाओं का योग बनता है.

👉  ज्योतिष में शनि को हवा और मंगल को आग माना जाता है.

👉  जिनकी कुंडली में शनि मंगल (अग्नि योग) होता है उन्हें हथियार, हवाई हादसों और बड़ी दुर्घटनाओं से सावधान रहना चाहिए.

👉  हालांकि यह योग कभी–कभी बड़ी कामयाबी भी दिलाता है.


मंगल का पहला शुभ योग 


मंगल के शुभ योग में भाग्य चमक उठता है. लक्ष्मी योग मंगल का पहला शुभ योग है.

👉  चंद्रमा और मंगल के संयोग से लक्ष्मी योग बनता है.

👉  यह योग इंसान को धनवान बनाता है.

👉  जिनकी कुंडली में लक्ष्मी योग है, उन्हें नियमित दान करना चाहिए।


मंगल का दूसरा शुभ योग 


👉 मंगल से बनने वाले पंच-महापुरुष योग को रूचक योग कहते हैं.

👉 जब मंगल मजबूत स्थिति के साथ मेष, वृश्चिक या मकर राशि में हो तो रूचक योग बनता है.

👉 यह योग इंसान को राजा, भू-स्वामी, सेनाध्यक्ष और प्रशासक जैसे बड़े पद दिलाता है.

👉  इस योग वाले व्यक्ति को कमजोर और गरीब लोगों की मदद करनी चाहिए ।


मंगल के अशुभ योगों के उपाय

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1👉 मंगल कृत अरिष्ट शांति के लिए किसी भी शुक्ल पक्ष के मंगलवार से शुरू करके लाल वस्त्र पहनकर श्री हनुमान जी की मूर्ती से सामने कुशाशन पर बैठा कर गेरू अथवा लाल चंदन का टीका लगाकर एवं घी की ज्योति जगाकर श्री हनुमानाष्टक अथवा हनुमान चालीसा का प्रतिदिन काम से कम 21 संख्या में पाठ करे।ऐसा नियमित 41 दिन तक करने पर कठिन से कठिन कार्य की सिद्धि होती है।श्री हनुमानाष्टक पाठ के प्रारंभ में श्री हनुमत-स्तवन के सात मंत्रो का भी पाठ करने से विशेष लाभ होता है।पाठ के बाद किशमिश या लड्डू का भोग लगाना शुभ रहेगा।


2👉 हर मंगलवार को स्नान आदि से निवृत होकर लाल वस्त्र एवं लाल चंदन का तिलक धारण कर कुशाशन पर बैठ कर 41 दिन नियमित रूप से 108 बार हनुमान चालीसा का पाठ एवं लड्डू का भोग लगाने से भौमकृत अरिष्ट की शांति होती है।


3👉 जन्म कुंडली में मंगल योग कारक होकर भी शुभ फल ना दे रहा हो तो हर मंगल वार कपिला गाय को मीठी रोटियां खिलाकर नमस्कार करना चाहिए गौ को हरा चारा जल सेवा एवं लाल वस्त्र पहना कर अलंकृत करने से मंगल के अशुभ फल की शांति होती है।


4👉 अपने इष्ट देव को घर में ही 27 मंगलवार सिंदूर का तिलक लगाकर खुद भी प्रसाद स्वरूप तिलक लगाना शुभदायक रहेगा।


5👉 सोमवार की रात्रि को ताँबे के बर्तन में पानी सिराहने रख कर मंगलवार की प्रातः घर में लगाये हुए गुलाब के पौधों को वही जल मंगल का बीज मंत्र पढ़ते हुए डाले।


6👉 किसी भी विशेष यात्रा पर जाने से पहले शहद का सेवन शुभ रहेगा।


7👉 यदि कुंडली में मंगल नीच राशिगत हो या अस्त हो तो शरीर पर सोने या तांबे का गहना या अन्य कोई वस्तु धारण नहीं करना चाहिए।इस स्तिथि में लाल रंग के वस्रों एवं लाल चंदन का भी परहेज करना चाहिए।


8👉 मंगल अशुभ होने की स्तिथि में मंगल सम्बंधित वस्तुओ (ताम्र बर्तन, इलेक्ट्रॉनिक वस्तु, लाल वस्त्र, गुड़ आदि) के उपहार विशेष कर मंगलवार या मंगल के नक्षत्रो में ग्रहण ना करे अपतु इनका दान इन दिनों विशेष लाभदाय रहेगा।


9👉 गेंहू तथा मसूर की दाल के सात-सात दाने लाल पत्थर पर सिंदूर का तिलक लगाकर इनको लाल वस्त्र में लपेटकर मंगलवार को मंगल का बीज मंत्र पढ़ते हुए बहते जल में प्रवाहित करें।


10👉 27 मंगलवार किसी अंध विद्यालय में या किसी अंगहीन व्यक्ति को मीठा भोजन कराना शुभ होगा।


11👉 मंगल की अशुभता में माँस-मछली-शराब आदि तामसिक भोजन का परहेज विशेष जरूरी है।


12👉 बिना नमक का एक समय भोजन या फलाहारी रहते हुए मंगलवार का व्रत रखना कल्याण प्रद रहेगा।


13👉 सोमवार की रात्रि सरहाने ताम्र पात्र में जल रख कर प्रातः बरगद की जड़ में मंगल के बीज मंत्र या ब्राह्मण को वैदिक मन्त्र से जल चढ़ाना शुभ रहेगा।


14👉 कर्ज से छुटकारे एवं संतान सुख के लिए ज्योतिषी से परामर्श कर सवा दस रत्ती का मूंगा धारण करना, भौम गायत्री मंत्र का नियमानुसार जप ,तथा मंगल स्त्रोत्र का पाठ करना कल्याणकारी रहता है।
                       


15👉 ऋण, रोग एवं शत्रु भय से मुक्ति के लिए एवं आयोग्य,धन - संपदा - पुत्र प्राप्ति के लिए मंगल यंत्र धारण तथा मंगल की औषधियों से नियमित स्नान इसके अतिरिक्त मंगल के वैदिक मंत्रों का निर्दिष्ट अनुसार ब्राह्मणों द्वारा जप और दशांश हवन करना शीघ्र कल्याणकारी रहेगा।


16👉 कुंडली में मांगलिक आदि दोष के कारण मंगल अशुभ फल दे रहा हो तो जातक/जातिका को श्री सुंदरकांड का नियमित 108 दिन तक हनुमान जी की चोला -जनेऊ एवं भोग लगाकर पाठ करने से वैवाहिक एवं पारिवारिक सुखों में वृद्धि करता है।इसके अतिरिक्त भौम शांति के लिए मंगल चंडिका स्त्रोत्र का पाठ भी विशेष लाभप्रद माना गया है।


17👉 अनंतमूल की जड़ मंगलवार को अनुराधा नक्षत्र में लाल धागे से दाएं बाजू में बाँधने से भौम कृत अरिष्ट की शांति होती है।

लगन में अलग अलग ग्रहो का प्रभाव

 


ज्योतिष के कुछ अद्भुत फलित सूत्र 

यदि लग्न पर शुभ ग्रहों की दृष्टि फल अधिक हो तो अशुभ ग्रहों की दृष्टि की अशुभता कम होने लगती है। उसी तरह अशुभ ग्रह अच्छे कारक स्थानों के स्वामी होकर प्रबल हैं व लग्न पर दृष्टि डाल रहे हैं तो शुभ प्रभाव ही देंगे। जैसे तुला लग्न में शनि यदि चौथे या ग्यारहवें स्थान से लग्न को देख रहा है तो शुभ फल ही मिलेंगे।


1. जिन लोगों का सूर्य‌ लग्न में होगा उनकी आंखें हल्का नीला पन लिए या ब्लू होगी और छोटी उम्र में चश्मा लग जाएगा

2. जिन लोगों का चंद्रमा लग्न में होगा वह देखने में बहुत ही ज्यादा सुंदर होगे साथ ही किसी का अनुशासन पसंद नहीं करेगा

3. जिन लोगों का मंगल लग्न में स्थित हो ऐसे लोग बहुत उतावले होते हैं और राजकारण में झुकाव ज्यादा होता है

3. जिन लोगों के लग्न में बुध स्थित हो ऐसे लोग बहुत मजाकिया स्वभाव के होते हैं

4. जिन लोगों के दूसरे भाव में चंद्रमा ऐसे लोग हद से ज्यादा पैसा खर्च करते है

5. जिन लोगों के दूसरे घर में गुरु को ऐसे लोगों की दो शादियां होने का योग बनता है

6. जिन लोगों के दूसरे भाव में राहु हो ऐसे लोगों का भाग्योदय जन्म स्थान से दूर  ही होगा

7. जिन लोगों का दूसरे भाव में केतु हो वह लोग झूठ बहुत बोलते है या बात को घुमा फिरा कर बोलते हैं जो लोगों की समझ में नहीं आता

8. तीसरे भाव में मंगल हो तो 3भाई  होंगे

9. तीसरे भाव में बुध हो तो जातक बहुत डरपोक होगा

10. तीसरे भाव में शुक्र यह बुध तो वह कलाप्रेमी होगा मतलब संगीत और म्यूजिक में इनकी रूचि विशेष रहेगी।

कुंडली में विभिन्न ग्रहों की अशुभ स्थिति के लक्षण


किसी मनुष्य के जीवन में कौन-सा ग्रह अशुभ प्रभाव डाल रहा है, इसका औसत निर्धारण उसके जीवन में घटने वाली घटनाओं के आधार पर भी ज्ञात किया जा सकता है | विभिन्न ग्रहों की अशुभ स्थिति पर निम्नलिखित लक्षण प्राप्त होते हैं –

1-सूर्य- तेज का अभाव, आलस्य, अकड़न, जड़ता, कन्तिहिनता, म्लान छवि, मुख(कंठ) में हमेशा थूक का आना | लाल गाय या वस्तुओं का खो जाना या नष्ट हो जाना, भूरी भैंस या इस रंग के सामान की क्षति | हृदय क्षेत्र में दुर्बलता का अनुभव |

2-चन्द्र- दुखी, भावुकता, निराशा, अपनी व्यथा बताकर रोना, अनुभूति क्षमता का ह्रास, पालतू पशुओं की मृत्यु, जल का अभाव (घर में), तरलता का अभाव (शरीर में), मानसिक विक्षिप्तता की स्तिथि, मानसिक असन्तुलन या हताशा के कारण गुमसुम रहना, घर के क्षेत्र में कुआं या नल का सूखना, अपने प्रभाव क्षेत्र में तालाब का सुखना आदि |

3-मंगल- दृष्टि दुर्बलता, चक्षु (आंख) क्षय, शरीर के जोड़ों में पीड़ा और अकड़न, कमर एवं रीढ़ की हड्डी में दर्द तथा अकड़न, रक्त की कमी, त्वचा के रंग का पिला पड़ना, पीलिया होना, शारीरिक रूप से सबल होने पर भी संतानोत्पत्ति की क्षमता का न होना, शुक्राणुओं की दुर्बलता, नपुंसकता (शिथिलता), पति पक्ष की हानि (स्वास्थ्य , धन, प्राण आदि) |

4-बुध- अस्थि दुर्बलता, दंतक्षय, घ्राणशक्ति का क्षय होना, हकलाहट, वाणी दोष, हिचकी, अपनी बातें कहने में गड़बड़ा जाना, नाक से खून बहना, रति शक्ति का क्षय (स्त्री-पुरुष दोनों की), नपुंसकता (स्नायविक), स्नायुओं का कमजोर पड़ना, बन्ध्यापन (स्नायविक), कंधो का दर्द, गर्दन की अकड़न, वैवाहिक सम्बन्ध में क्षुब्धता, व्यापार की भागीदारी में हानि, रोजगार में अकड़न, शत्रु उपद्रव, परस्त्री लोलुपता या सम्बन्ध, परपुरुष लोलुपता या सम्बन्ध, अहंकार से हानि, पड़ोसी से अनबन रहना, कर्ज |

5-बृहस्पति- चोटी के बाल का उड़ना, धन या सोने का खो जाना या चोरी हो जाना या हानि हो जाना, शिक्षा में रुकावट, अपयश , व्यर्थ का कलंक, सांस का दोष, अर्थहानी, परतंत्रता, खिन्नता, प्रेम में असफलता, प्रियतमा की हानि (मृत्यु या अनबन), प्रियमत की हानि (मृत्यु या अनबन), जुए में हानि, सन्तानहानि (नपुंसकता, बन्ध्यापन, अल्पजीवन), आत्मिक शक्ति का अभाव, बुरे स्वप्नों का आना आदि |

6-शुक्र– स्वप्नदोष, लिंगदोष, परस्त्री लोलुपता, शुक्राणुहीनता या कर्ज, नाजायज सन्तान, त्वचा रोग, अंगूठे की हानि (हाथ), पड़ोसी से हानि, कर्ज की अधिकता, परिश्रम करने पर भी आर्थिक लाभ नहीं, भूमि हानि आदि |

7-शनि- व्यवसाय में हानि, अर्थहानि, रोजगार में हानि, अधिकार हानि, अपयश, मान-सम्मान की हानि, कृषि-भूमि की हानि, बुरे कार्यों में प्रवृत्ति, मकान हानि, अधार्मिक प्रवृत्ति (नास्तिकता), रिश्वत लेते पकड़े जाना या रिश्वत में हंगामा और अपयश, रोग, आकस्मिक मृत्यु, ऊंचाई से गिरकर शरीर या प्राणहानि, अचानक धनहानि, दुर्घटना, निराशा, घोर अपमान, निन्दक प्रवृत्ति, राजदण्ड |

8-राहु- संतानहीनता, विद्याहानि, बुद्धिहानि, उज्जड़ता, अरुचि, पूर्ण नपुंसकता, बन्ध्यापन, अन्याय करने की प्रवृत्ति, क्रूरता, रोजगारहानि, भूमिहानि, आकस्मिक अर्थहानि, राजदण्ड, शत्रुपिड़ा, बदनामी, कारावास का दण्ड, घर से निकाला, चोरी हो जाना, चोर-डाकू से हानि, दु:स्वप्न, अनिद्रा, मानसिक असंयता |

9-केतु- रोग, ऋण की बढ़ोत्तरी, लड़ाई-झगड़े से हानि, भाई से दुश्मनी, घोर दु:ख, नौकरों की कमी, अस्त्र से शारीरक क्षति, सांप द्वारा काटना, आग से हानि, शत्रु से हानि, अन्याय की प्रवृत्ति, पाप-प्रवृत्ति, मांस खाने की प्रवृत्ति, राजदण्ड (कैद) |

कुंडली में शुभ,अशुभ और पापी ग्रह और उनका प्रभाव

        
गुरु(बृहस्पति) शुक्र बुध और पूर्ण बली चन्द्र यह शुभ ग्रह है।बुध यदि अकेला कुंडली में हो या शुभ ग्रहो के साथ हो तो शुभ और पाप ग्रहो के साथ हो तो पापी हो जाता है।शनि राहु केतु यह पाप ग्रह है तो मंगल क्रूर ग्रह है सूर्य भी एक क्रूर ग्रह है लेकिन मंगल से कुछ कम क्रूर है।    

जब कुंडली के शुभ ग्रहो गुरु शुक्र बुध चन्द्र पर पाप ग्रहो का किसी भी तरह प्रभाव न हो साथ ही विशेष लग्न पंचम नवम चतुर्थ सप्तम भाव और इन भावेशों पर पाप ग्रहो का प्रभाव न हो मतलब कि जातक के जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओ जैसे सप्तम भाव(विवाह) पंचम भाव(संतान, बुद्धि, शिक्षा, प्रेम, पुर्नजन्म आदि) चतुर्थ भाव गृहस्थी, लग्न(खुद जातक और पूरे जीवन की नींव) और सुख दायक ग्रहों गुरु शुक्र बुध चन्द्र यह सभी पाप ग्रहो के प्रभाव से दूर हो यदि किसी पाप ग्रह का प्रभाव भी है तो एक से ज्यादे का न हो तब जीवन बहुत आसानी और सुख से बीत जाता है।

लेकिन जब इन्ही भाव भावेशों पर ज्यादा से ज्यादा पाप ग्रहो का प्रभाव हो शुभ ग्रह भी पाप ग्रहो के प्रभाव में हो तब जीवन कठिनाई से बीतता है क्योंकि शुभ ग्रह स्थाई सुख देने वाले ग्रह है और पाप ग्रह दुःख देने वाले ग्रह है।यदि पाप ग्रहो के कारण कोई सुख मिलता भी है तो वह बहुत कम समय के लिए होता है एक तरह से कहे कि वह सुख दुःख का निर्माण करने के लिए होता है।जैसे सप्तम भाव और सप्तमेश दोनों शनि और राहु के पाप प्रभाव से पीड़ित हो विवाह कारक गुरु शुक्र पर भी शनि राहु या शनि केतु या मंगल का प्रभाव होने से सप्तम भाव और सप्तमेश दोनो पर शुभ ग्रहो का प्रभाव न हो तब विवाह होने के बाद भी यह पाप ग्रह विवाह के कुछ समय बाद वैवाहिक जीवन को कष्टकारी बनाकर वैवाहिक जीवन बर्बाद कर देते है।

जातक या जातिका कितना भी प्रयास करे वैवाहिक जीवन को सुधारने का लेकिन यह पाप ग्रह वैवाहिक जीवन को कष्टकारी बनाकर उसे बर्बाद करने में कोई कसर नही छोड़ते।इसके विपरीत यदि सप्तम भाव और सप्तम और गुरु शुक्र पर पाप ग्रहो का प्रभाव न हो तब यह शुभ ग्रहो का प्रभाव वैवाहिक जीवन पर हो तब बहुत सुखद और आराम से वैवाहिक जीवन व्यतीत होता है।यदि पाप ग्रहों का प्रभाव लग्न पंचम नवम और चोथे भाव आदि सुख केंद्र त्रिकोण भावो पर कम हो , 3 6 8 11 और 12वे भाव में पाप ग्रहों की स्थिति कुंडली में हो तब यह पाप ग्रह ज्यादा क्रूर और पाप प्रभाव जीवन पर नही डालते साथ ही शुभ ग्रह औऱ केंद्रेश त्रिकोणेश और इन भावेशों के स्वामी पाप ग्रहों से मुक्त होने चाहिए।

इस तरह यदि किसी जातक की कुंडली पर पाप शुभ और पाप ग्रहो के प्रभाव की स्थिति ठीक जगह और युति-योग-दृष्टि-सम्बन्ध आदि के अनुसार ठीक जगह है तो जीवन सुख और आसान तरह से बीतेगा यदि पाप ग्रहो के प्रभाव में ज़िन्दगी के महत्वपूर्ण पहलु ज्यादा है तो कष्ट और संघर्ष से जीवन बीतेगा।

ज्योतिष और शिक्षा, विषय के प्रकार और उनके सिग्निफिकैट कारक ग्रह



1 इंजीनियरिंग के मुख्य ग्रह (शनि और मंगल) ग्रहों विषयों
2. इलेक्ट्रोनिक और कॉम इंजी , बुध , गुरु , मंगल और हाउस
3. इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग बुध , मंगल, गुरु
4. मैक् इंजीनियरिंग बुध , मंगल , शनि
5. केमिकल इंजीनियरिंग शुक्र , चंद्रमा
6. खनन इंजीनियरिंग, शनि , बुध , मंगल
7. ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग शुक्र, मंगल
8. एयर कंडीशन इंजी ,शनि , मंगल
9. स्टील इंजी, शनि , मंगल
10. पेट्रो केमिकल ,चंद्रमा , शनि, मंगल, सूर्य
11. विमानन इंजी,शुक्र, मंगल ,बुध , और (3,7,11th )

मेडिकल मुख्य कारक significant  विषय ग्रह:

1. हार्ट विशेषज्ञ ,रवि
2. सर्जन ,सूर्य, मंगल
3. ईएनटी विशेषज्ञ ,सूर्य , बुध
4. बच्चों विशेषज्ञ, सूर्य , गुरु , बुध
5. कैंसर विशेषज्ञ ,सूर्य , गुरु
6. स्त्री रोग विशेषज्ञ ,सूर्य , शुक्र
7. नेत्र विशेषज्ञ ,सूर्य , शुक्र
8. प्लास्टिक सर्जन ,सूर्य , शुक्र
9. पाप विशेषज्ञ सूर्य, शनि
10 आयुर्वेद स्पेशल सूर्य, केतु
11. हिस्टीरिया स्पेशल ,सूर्य, राह
12. डेंटिस्ट ,सूर्य, मंगल , शुक्र व 7h
13. फार्मेसिस्ट सूर्य
14. नर्स, सूर्य, चंद्रमा , बुध

बायो विषय :ग्रह

1. बायोटेक ,सूर्य , गुरु , बुध
2. माइक्रोबायोलॉजी ,गुरु , बुध , मंगल
3. बॉटनी ,सूर्य , गुरु , बुध
4. जूलॉजी ,शनि, गुरु
वाणिज्य विषय गुरु = फाइनेंस ।, बुध = वाणिज्य ग्रहों ,विषय ग्रह
1. वित्तीय सलाहकार, सूर्य , बुध , गुरु , मंगल और 12 वीं h
2. चार्टर्ड लेखा ,सूर्य , बुध , गुरु , मंगल और 3rd h
3. राजस्व सलाहकार ,गुरु , बुध , मंगल, 2 & 11हाउस
4. सांख्यिकी ,शनि, बुध , गुरू
5. बीमा सलाहकार ,शनि, बुध , और 8 th हाउस
6. होटल ,मंगल , शुक्र , चंद्रमा , 4th हाउस
7. बैंकर ,गुरु , बुध
8. एमबीए, सूर्य , गुरु , मंगल, बुध
9. रियल स्टेट एक्सपर्ट, मंगल ग्रह , गुरु , शुक्र , बुध
10 हाइपर स्टोर, मंगल ग्रह ,गुरू , शुक्र , 2 nd हाउस

कला विषयों :मुख्य significant शुक्र ग्रह:

1. अधिवक्ता (कानून): बुध , गुरु , मंगल , शनी और 3rd हाउस
2. शिक्षा (बी.एड.): गुरु , बुध , सूर्य और 4 th हाउस
3. मीडिया : गुरु , बुध , शुक्र और 3th हाउस
4. विज्ञापन :गुरु , बुध ,7, 3 हाउस
5. समाज कल्याण :(एनजीओ) चंद्रमा , शुक्र , गुरु और 11 वीं हाउस
6. निजी सचिव: बुध , मंगल, गुरु और 3 rd हाउस
7. फ्रंट एंड मैनेजमेंट: बुध , गुरु और 3rd हाउस
8. फोटोग्राफर: सूर्य , शुक्र , चंद्रमा
9. फिल्म और संगीत कैरियर:शुक्र , बुध ,गुरु व 5 th हाउस
10 डेयरी उत्पादन एवं मैनेजमेंट: शुक्र , चंद्रमा , मंगल और 6 th हाउस
11.Textile डिजाइनिंग :शुक्र , बुध , चंद्रमा व 5th हाउस
12. उद्यमिता Entrepreneurshipएवं मैनेजमेंट :गुरु , बुध , मंगल, 7th हाउस
13. पर्यटन और एयरलाइन मैनेजमेंट : शुक्र , बुध , 9 एवं (3,7,11) हाउस
14. खाद्य विज्ञान एवं गुणवत्ता :गुरु , मंगल
15. परिधान प्रोड और एक्सपोर्ट : शुक्र , बुध , मंगल 9 वीं और 7 वीं हाउस
16. विदेशी भाषा :केतु , बुध , गुरु
17. कर्रिएर इन स्पोर्ट्स :मंगल ,गुरु ,सुर्य ,शुक्र और 5th हाउस
18. राजनीति शास्त्र :गुरु,शुक्र
19. गहने डिजाइन :,शुक्र , बुध ,गुरु ,मंगल व 5 th हाउस
20. निजी खुफिया कैरियर:शनि , बुध
नौकरी कौन सी होगी वह 10th हाउस पर निर्भर करती है:
10 वीं हाउस के मुख्य significator:कारक :
10 वीं हाउस मै बैठे ग्रह का प्रभाव :

विषय के प्रकार :मुख्य significant ग्रह:

1. इंजीनियरिंग मुख्य ग्रह (शनि और मंगल)
2. इलेक्ट्रोनिक इंजी :सूर्य , बुध गुरु , मंगल और3rd हाउस
3. इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग: बुध , मंगल, गुरु
4. मैक् इंजीनियरिंग: बुध , मंगल , शनि
5. केमिकल इंजीनियरिंग: शुक्र , चंद्रमा
6. खनन इंजीनियरिंग : शनि , बुध , मंगल
7. ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग: शुक्र , मंगल
8. एयर -कंडीशन इंजी :शनि , मंगल
9. स्टील इंजी: शनि , मंगल
10 पेट्रो केमिकल :चंद्रमा , शनि, मंगल, सूर्य
11. एविएशन इंजी :शुक्र , मंगल , बुध और सूर्य , (3,7,11) हाउस

जातक के शिक्षा योग कैसे हैं? यह एक सहज जिज्ञासा होती है जिसके बारे में जन्मकुंडली के चतुर्थ भाव के अधिपति की स्थिति से सहज ही जानकारी प्राप्त की जा सकती है. यानि चतुर्थेश कुंडली के जिस भाव में बैठा हो उसके अनुसार परिणाम प्राप्त होते हैं. नीचे हम सभी भावों की स्थिति के अनुसार फ़ल बता रहे हैं.

प्रथम भाव - अगर चतुर्थेश कुंडली के प्रथम भाव में बैठा हो तो जातक जीवन में अच्छी विद्या प्राप्त करता है जो उसको लाभदायक रहती है.

द्वितीय भाव - अगर चतुर्थेश कुंडली के द्वितीय भाव में बैठा हो तो ऐसा जातक विद्या अवश्य प्राप्त करता है भले ही उसके पालकों की आर्थिक हैसियत उसे पढाने लायक ना हो तो भी.

तृतीय भाव - अगर चतुर्थेश कुंडली के तृतीय भाव में बैठा हो तो जातक की विद्या प्राप्त करने में उसकी माता की विशेष भूमिका होती है. माता की मेहनत से ऐसा जातक शिक्षा प्राप्त कर लेता है.

चतुर्त भाव - अगर चतुर्थेश कुंडली के चतुर्थ भाव में ही बैठा हो तो ऐसा जातक बहुत ही उत्तम विद्या प्राप्त करता है.

पंचम भाव - अगर चतुर्थेश कुंडली के पंचम भाव में बैठा हो तो ऐसा जातक अनेक प्रकार की बाधाओं के साथ विद्या प्राप्त करता है और जातक अपने जीवन में ऐसी विद्या का कोई उपयोग नही कर पाता है.

षष्ठ भाव - अगर चतुर्थेश कुंडली के षष्ठ भाव में बैठा हो तो ऐसे जातक को विद्याध्ययन में बहुत अडेचने आती हैं परंतु उसे विद्या लाभकारी होती है.

सप्तम भाव - अगर चतुर्थेश कुंडली के सप्तम भाव में बैठा हो तो और ऐसे जातक की विद्या २२ साल की उम्र के पहले पूर्ण हो जाती है और उससे जातक लाभ प्राप्त करता है. यदि २२ साल की उम्र के पहले विवाह हो जाये तो उसकी विद्या प्राप्ति में विघ्न उत्पन्न हो जाते हैं.

अष्टम भाव - अगर चतुर्थेश कुंडली के अष्टम भाव में बैठा हो तो ऐसे जातक को मातृ सुख में कमी होती है और मातृ सुख के अभाव वश विद्या में न्युनता.

नवम भाव - अगर चतुर्थेश कुंडली के नवम भाव में बैठा हो तो ऐसा जातक प्रचारक, आलोचक, एवम शिक्षक होता है चाहे पूरी विद्या प्राप्त की हो या नही.

दशम भाव - अगर चतुर्थेश कुंडली के दशम भाव में बैठा हो तो ऐसे जातक को स्कूल जाने में डर लगता है और विद्या में कमी रहती है. ऐसा जातक अपने पिता का कार्य संभालता है.

एकादशम भाव - अगर चतुर्थेश कुंडली के एकादश भाव में बैठा हो तो ऐसा जातक अनेक रूकावटों के साथ विद्या प्राप्त करता है.

द्वादश भाव - ऐसा जातक घर के बाहर रहकर विद्या प्राप्त करता है. ऐसा जातक पढे तो पूरा पढे वर्ना एकांत में बैठा विद्या प्राप्त करने के सपने लेने वाला होता है.

सात वारों के देवी-देवताओ की प्रसन्नता हेतु वैदिक उपाय


सूर्य आदि सात ग्रहों के नाम पर सप्ताह के सात दिन तय किए गए हैं। हर वार का अधिपति कोई एक ग्रह है, लेकिन ग्रह देवों को भी अन्य प्रधान देवों के साथ जोड़ा गया है। इस सबके पीछे विज्ञान, ग्रहों की चाल, ऋतुचर्या, दिनचर्या और स्वस्थ सुखी रहने के तौर-तरीके बड़ी कुशलता के साथ पिरोए गए हैं।

वारों का क्रम किस प्रकार तय है यह समझने के लिए हमें आसमान में ग्रहों की कक्षाओं के क्रम को समझना होगा। ये इस प्रकार हैं-  

1. शनि 2. गुरु 3. मंगल 4. रवि 5. शुक्र  6. बुध 7. चंद्रमा। 

इनमें हर चौथा ग्रह अगले वार का मालिक होता है जैसे, रविवार के बाद उससे चौथे चन्द्रमा का, फिर चन्द्र से चौथे मंगल का क्रमश: वार आता-जाता है।

वारों के अधिदेवता:

ग्रहों को मूल रूप से विष्णु या महादेव के अंश से उत्पन्न समझा जाता है। सूर्य की पूजा, नमस्कार, अर्घ्य देना तो खास तौर पर विष्णु और शिव ही क्यों, सब तरह की पूजा में अनिवार्य कहा गया है। वारपति ग्रह और अवतारों का संबंध इस तरह से है-

1. सूर्य- रामावतार, 
2. चन्द्र- श्रीकृष्णावतार, 
3. मंगल- नृसिंह अवतार, 
4. बुध- बुद्ध अवतार, 
5. गुरु-वामन अवतार, 
6. शुक्र- परशुराम अवतार, 
7. शनि- कर्म अवतार।

इससे हम आसानी से समझ सकते हैं कि सब ग्रह आदि देव विष्णु या शिव जो भी नाम दें, उसी से निकले हैं।
रविवार का वारपति सूर्य स्वयं जीवन का आधार होने से विष्णु रूप कहा गया है। अत: ’आरोग्यं भास्करादिच्छेत्’ के नियम से रोग के प्रकोप को कम करने, स्वस्थ रहने, दवा का अनुकूल प्रभाव पैदा करने और आयु की रक्षा तथा आत्मबल, तन व मन की ताकत को देने वाला सूर्य है। जन्म का कारण होने से सविता, प्रसविता, प्रसव कराने वाला परिवार वृद्धि का देवता है। जो लोग प्रजनन अंगों के विकार के कारण, अज्ञात कमी की वजह से औलाद का सुख नहीं देख पाते हैं, उनके लिए सूर्य की उपासना बहुत मुफीद होती है। सूर्य के लिए गायत्री मंत्र, केवल ओम् नाम या ‘ओम् घृणि: सूर्य आदित्य:’ का जप करना, जल चढ़ाना, माता पिता या उनके जैसे जनों को ठेस न पंहुचाना अच्छा है। 

सूर्य को प्रसन्न रखने के कुछ उपाय:

सुबह मुंह को गीला रखकर सूर्य के सामने गायत्री मन्त्र या ओम् नाम का 10 या 28 बार जप करना चाहिए। 
घर में धूप और खुली हवा का प्रबंध, धूप सेंकना, बुजुर्गो के मन को ठेस नहीं पहुंचाना चाहिए।
घर में गंगाजल या किसी कुदरती सोते का जल सहेजना चाहिए।
संक्रान्ति, अमावस्या, पूर्णिमा, अष्टमी के दिन और दोनों वक्त मिलने के समय कलह, बहस, देर तक सोना और संभोग से बचें। इनसे सारे ग्रहों की अनुकूलता बनती है।

चंद्रमा को अनुकूल रखने के उपाय:

सोमवार का पति चंद्रमा मन, विचार, भावुकता, चंचलता, आवेग और आवेश का प्रतीक है। चंद्र की अनुकूलता से मन पर नियंत्रण, निर्णय करने की सही दिशा और दिल के बजाए दिमाग से अधिक काम लेने की आदत बनती है। सोम जल का ग्रह होने से शिव को खास प्रिय है। इस दिन शिवजी की पूजा, आराधना करना उपयुक्त है। ध्यान रखें शिव की पूजा सदा माता पार्वती के साथ ही साम्बसदाशिव के रूप में ही सांसारिक सुखों के लिए अधिक फलदायी है। 

चंद्र को प्रसन्न रखने के कुछ  तरीके ये हैं:

दूध, खीर, सेवई, मिठाई, पनीर, दान करना चाहिए और तारों की छांव या चांदनी में कुछ देर बैठना चाहिए।
बड़, पीपल, गूलर की गोलियां, फल या जड़ घर में रखें। अपनी कुल प्रतिष्ठा, सम्पदा को संभालें। पानी का सेवन करना और माता-पिता से अलगाव या दूरी न रखना चन्द्रमा को प्रसन्न रखने का कारगर तरीका है।
दूध में मुल्तानी मिट्टी, चोकर या बेसन मिला कर उबटन करें। किसी के सामने अपनी व्यथा किसी को ना सुनाए।

मंगल अनुकूलता के उपाय:

मंगलवार का वारपति मंगल, युद्घ और हथियारों का ग्रह हैं। इसके देवता वीर हनुमान, एकदंत गणेश और मलय स्वामी हैं। हनुमान जी की पूजा, प्रसाद चढ़ाना, मंगल का व्रत रखना और इस दिन शाकाहार करना अच्छा है। हनुमान चालीसा का पाठ आसान और कारगर उपाय है। 

अतिरिक्त शुभता के लिए-
अपने सगे भाई बहनों के लिए अपशब्द न कहें और स्त्रियों से बहस न करें।
मीठी सुहाल, पूए, चीले, पूरनपोली खाएं, खिलाएं और बांटें।
भाभियों से सामान्य व्यवहार रखें और कभी विकलांगों की सहायता करें।
नीम, बबूल का सेवन किसी तरह से करें और पेड़-पौधों की देखभाल करते रहें।

बुध की अनुकूलता के उपाय:

बुधवार का वारपति बुध, बुद्धि, हास-परिहास, अभिनय और कला और वनस्पतियों का ग्रह है। इसके प्रधान देव विष्णु हैं। अत: विष्णु जी के किसी रूप की आराधना करना शुभ है। 

ओम् नमो भगवते वासुदेवाय या 
श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। हे नाथ नारायण वासुदेव।। 

का जप करना श्रेयस्कर है। 

मांस मदिरा, मानसिक हिंसा, पक्षियों को पालना, ससुराल से गहरे संबंध रखना आदि बातों से बचें।
वनस्पति, जड़ी-बूटी पाले प्रसाधन इस्तेमाल करना, सोना धारण करना, पौधे रखना, बहन बेटी और उनके परिवार जनों का आदर करना, केसर लगी मिठाई या केसरी हलुवा या मूंग दाल के पदार्थ खाना खिलाना शुभ है।
दादी को कोई भेंट देने, सांड को गुड़ रोटी खिलाने, केले और बताशे बांटने से बुध प्रसन्न रहता है।
स्नान जल में चावल डालना, पीपल में जल देना, हरी सब्जी शिवजी को भेंट करना, कभी पत्ते के दोने में कुछ खाना, कभी दान करना मंगलकारक है।

गुरु देव बृहस्पति की अनुकूलता के उपाय:

गुरुवार का देवता संसार का सृजनहार ब्रह्मा है। अत: विवाह, संतान सुख, परिवार सुख, ज्ञान, वाणी और हुनर के साथ बड़प्पन अधिकार का स्वामी बृहस्पति है। इसके लिए सिर्फ ओम् नाम का जप करना काफी फायदेमंद है। 

अधिक शुभता के लिए:

किसी के साथ कपड़े शेयर न करें। चरित्र, जुबान और आचरण को मजबूत रखें।
हल्दी वाली रोटी, चने की दाल, पीला वस्त्र, घी, बूरे का सेवन वितरण करें।
कन्याओं का आदर करें।

दैत्य गुरु शुक्र की अनुकूलता के उपाय:

शुक्रवार देवी के आधीन है। अत: दुर्गा पूजा, दीपक जलाना, खेतड़ी बोकर रखना, कन्यापूजन, करना और जालसाजी, झूठी गवाही से बचना अच्छा है। दुर्गाचालीसा आदि पढ़ना, खुशबू का प्रयोग, धूपबत्ती जलाना, साफ-सुथरा और आकर्षक बनने की कोशिश करना शुभ है।

शनि देव को अनुकूल बनाने के उपाय:

शनिवार के अधिपति भैरव, हनुमान, महाकाली, नृसिंह हैं। भावनानुसार इनमें से किसी की पूजा आराधना करना अच्छे परिणाम देगा। बस्ती के बाहर किसी शिवमंदिर में पूजा करना भी लाभदायक है। अधिक शुभता के लिए-
मजदूरों, मेहनतकशों का दिल न दुखाना, जीवन में अनुशासन रखना, साफ-सुथरा रहना, रोज नहाना और हाथ-पैर, दाढ़ी, नाखूनों को साफ सलीकेदार रखना, तेल मालिश, शनि को खुश रखने की रामबाण दवा है।

ग्रह अनुसार रत्न धारण करने के नियम


1- अगर सूर्य को शक्तिशाली बनाना है तो माणिक्य रत्न पहने । कम से कम सवा पांच रत्ती या फिर 7 - 9 रत्ती के माणिक को स्वर्ण की अंगूठी में, रविवार के दिन पुष्य योग में दाहिने हाथ की अनामिका अंगुली में धारण करें ।

2 - चंद्र ग्रह को शक्तिशाली बनाने के लिए लिए मोती रत्न को पहनना चाहिए । मोती कम से कम सवा तीन रत्ती का तो होना चाहिए, इसे चांदी की अंगूठी में बनाकर शुक्ल-पक्ष के किसी भी सोमवार को रोहिणी नक्षत्र में धारण करना चाहिए ।

3- मंगल ग्रह को शक्तिशाली बनाने के लिए पांच रत्ती का मूंगा रत्न सोने या तांबे की अंगूठी में मंगलवार के दिन अनुराधा नक्षत्र में सूर्योदय से एक घंटे बाद तक के समय में ही पहनना चाहिए ।

4- बुध ग्रह का प्रधान रत्न पन्ना रत्न होता है, पन्ना रत्न पांच रंगों का होता है । हल्के पानी के रंग जैसा, तोते के पंखों के समान रंग वाला, सिरस के फूल के रंग के समान, सेडुल फूल के समान रंग वाला, मयूर पंख के समान रंग वाला । इन सभी रंगों में श्रेष्ठ मयूर पंख के समान रंग वाला माना जाता है, यह चमकीला और पारदर्शी कम से कम छह रत्ती का प्लेटिनम या सोने की अंगूठी में बुधवार के दिन सुबह 5 से 6 बजे के बीच ही दाहिने हाथ की सबसे छोटी उंगली में उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र में धारण करना चाहिए ।

5- बृहस्पति के लिए पुखराज रत्न सबसे उत्तम है । पुखराज रत्न 5, 7, 9,या 11 रत्ती का सोने की अंगूठी में दाहिने हाथ की तर्जनी अंगुली में गुरु-पुष्य योग में ठीक सूर्यास्त के समय धारण करना चाहिए है ।

6- -शुक्र ग्रह को शक्तिशाली बनाने के लिए हीरा रत्न कम से कम दो कैरेट का मृगशिरा नक्षत्र में बीच की मध्यमा अंगुली में पहनना चाहिए ।

7- शनि ग्रह की शांति के लिए नीलम रत्न सबसे अधिक लाभकारी है । पांच, छह, सात, नौ अथवा ग्यारह रत्ती का नीलम रत्न शनिवार को श्रवण नक्षत्र में पंचधातु की अंगूठी में मध्यमा अंगुली में पहनना चाहिए ।

8- राहु के लिए छह रत्ती का गोमेद रत्न उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र में बुधवार या शनिवार को पंचधातु की अंगुठी में मध्यमा अंगुली में पहनना चाहिए ।

9- केतु के लिए छह रत्ती का लहसुनिया रत्न गुरु पुष्य योग में गुरुवार के दिन सूर्योदय से पूर्व पंचधातु की अंगुठी में मध्यमा अंगुली में पहनना चाहिए ।

कुंडली में ग्रहदशा के अनुसार अपनाये जीवन शैली


1. जातक को यदि केमद्रुम दोष या विषदोष हो,ऐसे जातक कोई भी उपाय लंबे समय तक नही कर सकते..बहुत जल्दी निराश हो जाते है..इनका ज्योतिषीय उपायो या भगवानों से बहुत जल्दी भरोसा उठ जाता है..ये कैसे लोगो के बीच रहते है इनकी सोच को बहुत प्रभावित करता है..

ये लोग मंत्र जाप या पूजा में भी बैठे हो ध्यान केंद्रित नही कर पाते,मोबाइल में या इधर-उधर के विचारों में खोये रहते है...ऐसी महिलाये 30 में से कम से कम 4 दिन सब्जी-दाल में नमक डालना भूल जाती है या कम डालती है..

2.कुंडली मे यदि केंद्र में एक भी ठोस ग्रह ना हो तो जातक को हर क्षेत्र में अन्य लोगो के अपेक्षा अधिक मेहनत करनी पड़ती है...ऐसे लोग भीड़ में खुद को बहुत असहज महसूस करते है..उनको कभी 10 लोगो के बीच बोलने को कहा जाये तो घबराहट होती है.Self-Confidence बहुत कम होता है..

3.केंद्र में जितने अधिक सौम्य ग्रह होंगे,जातक के विनम्र होने का आप उतना अनुमान लगा सकते हो..जितने अधिक क्रूर ग्रह होंगे जातक की वाणी और व्यवहार उतना अकड़ू होंगा...

4.जातक सुबह जितने जल्दी उठेगा,गुरु और बुध उतना बढ़िया प्रभाव देंगे..सूर्योदय तक उठे तो सूर्य भी बढ़िया फल देंगा..9-10 बजे उठे ग्रह ठीक फल नही देते..11 बजे या उसके बाद उठे तो दिन भर राहू और शनि आप पर हावी रहेंगे..

5.जातक सूर्यास्त के पहले जितना अधिक स्वच्छ पानी पियेगा,चंद्रमा अच्छे परिणाम देंगा...मंगल आपको परेशान कर रहा हो तो दूध में शहद डालकर पीना चालू कीजिये..गुरु को बल देना हो तो दूध में हल्दी/केशर डालकर पीजिए...इसी तरह शुक्र को बल देना है तो दूध के साथ अश्वगंधा लीजिए...आप जितनी अधिक कॉफी पियोगे राहू आप पर उतना ही हावी रहेगा,कभी गौर करना अतः लंबे समय तक कॉफ़ी नही पीनी चाहिए शौकीयतौर पर पीजिये..

6.योगकारक ग्रहो से संबंधित रंग के वस्त्र धारण करने की कोशिश करे...पैंट कोई भी चलेगा पर शर्त,t-shirt, Hairband, दुपट्टा आदि...जो ग्रह समस्या दे रहे उनके रंग इस्तेमाल कम से कम करे..संभव हो तो नैलपैंट भी योगकारक में से किसी एक ग्रह का (जिसका रंग भड़काऊ ना हो) वो प्रयोग करे...

7.मोबाइल या लैपटॉप पर सन्नी लियोन या शाहरुख खान की जगह संभव हो तो श्रीयंत्र या भगवानों की फ़ोटो रखे,मन शांत रहेगा..

8.उम्र के पड़ाव के हिसाब से ही ग्रह और उनके उपाय काम करते है अतः छोटे बच्चो और बुजुर्गों पर भी ये बात लागू होती है..इनको सिर्फ भगवान की भक्ति फायदा देती है..रत्न अपना पूरा प्रभाव इनके स्किन और रक्तप्रवाह के कारण नही दिखा पाते..जिस तरह यौन उत्तेजनाओं की गोली का जितना फायदा युवा को हो सकता है उतना फायदा ना तो किसी बच्चे को होगा ना ही किसी बुजुर्ग,यही सूत्र रत्नों के ऊपर लागू होता है...

9.ग्रहो से बलवान होता है समय(काल)...समय अच्छा हो तो ग्रह भी आपको बुरा फल नही देते और जब समय खराब हो तो योगकारक ग्रह भी आपको अकेला छोड़कर हिमालय में तपस्या करने चले जाते है या फिर "आउट ऑफ कवरेज मोड" पर चले जाते है सो समय कैसा भी हो भक्ति में अपना समय अवश्य लगाये..

दुख में स्मिरण सब करे,सुख में करे ना कोय..
जो सुख में भी स्मिरण करे,तो दुख काहे को होय...

ग्रहों के भावों का विस्तृत विश्लेषण


“ सर्वे त्रिकोण नेतारा शुभ फल प्रदा “
सभी त्रिकोण के नेता शुभ फल देने वाले होते है /

“ त्रिशाडाए स्वामिनः अशुभ फल प्रदा “
3 ,6 ,11 के स्वामी अशुभ फल देने वाले होते है /

“ लग्नेषा सर्वदा शुभः “
लग्न हमेशा शुभ फल देने वाली होती है /

अष्टमेषा सर्वदा अशुभा “
अष्टमेष हमेशा अशुभ फल देते है /

द्वि द्वादश (2 ,12 ) 

अपनी दूसरी राशी के अनुसार फल देते है / अगर इनकी दूसरी राशी नहीं है तो यह अशुभ फल देते है /

केंद्र भावो के स्वामी अपने स्वाभाव को त्याग कर फल देते है /
यदि वे शुभ होते है तो शुभ प्रभाव छोड़ देते है और अगर अशुभ होते है तो अपनी अशुभता छोड़ देते है /
अर्थात तथस्ट हो जाते है /और अपनी दूसरी राशी के अनुसार फल करते है /
ग्रह जब दो भावो का स्वामी होते है तो अपनी मूल त्रिकोण राशी का अधिक फल करते है /
लग्नेश के मित्र शुभ फल देते है /

ग्रहों की बालादि अवस्थाए :

विषम राशियों के लिए सम राशियों के लिए
0 डिग्री से 6 डिग्री बाल अवस्था 0 डिग्री से 6 डिग्री मृत
6 डिग्री से 12 डिग्री कुमार 6 डिग्री से 12 डिग्री वृद्ध
12 डिग्री से 18 डिग्री युवा 12 डिग्री से 18 डिग्री युवा
18 डिग्री से 24 डिग्री वृद्ध 18 डिग्री से 24 डिग्री कुमार
24 डिग्री से 30 डिग्री मृत 24 डिग्री से 30 डिग्री बाल अवस्था

बाल्यावस्था में ग्रह अत्यंत न्यून फल देता है। कुमारावस्था में अर्द्ध मात्रा में फल देता है । युवावस्था का ग्रह पूर्ण फल देता है। विर्धावस्था वाला अत्यंत अल्प फल देता है और मिर्त अवस्था वाला ग्रह फल देने में अक्षम होता है।

जाग्रतादि अवस्थाएँ:- ग्रहों की कई प्रकार की अवस्थाएं होती हैं. यह अवस्थाएँ ग्रहों के अंश अथवा अन्य कई नियमों के आधार पर आधारित होती हैं. इन्हीं अवस्थाओं में से ग्रहों की एक अवस्था जाग्रत या जाग्रतादि अवस्थाएँ होती हैं. इन अवस्थाओं के आधार पर ग्रह विभिन्न फलों का प्रतिपादन करते हैं.

विषम राशियों के लिए सम राशियों के लिए:

0 डिग्री से १० डिग्री जाग्रत अवस्था 0 डिग्री से १० डिग्री सुषुप्त अवस्था
१० डिग्री से २० डिग्री स्वप्न अवस्था १० डिग्री से २० डिग्री स्वप्न अवस्था
२० डिग्री से 30 डिग्री सुषुप्त अवस्था २० डिग्री से 30 डिग्री जाग्रत अवस्था

जाग्रत अवस्था | Jagarat Avastha:

ग्रह उत्तम अवस्था में हो तो वह अपना सौ प्रतिशत फल देने वाला होता है. इसमें उसके गुण प्रभावशाली रुप से अच्छे फलों का प्रतिपादन करते हैं. जाग्रत अवस्था में ग्रह जागा हुआ होता है. ग्रह कैसे जागता है इसका विश्लेषण करते हैं. जब कुण्डली में ग्रह अपनी मूलत्रिकोण राशि में या स्वराशि अर्थात अपनी राशि में हो तो यह ग्रह की जाग्रत अवस्था कहलाती है.

जाग्रत अवस्था प्रभाव | Effect of Jagrat Awastha:

इस अवस्था के कारण सुंदर वस्त्र एवं आभूषणों की प्राप्ति होती है. भवन, जमीन जायदाद एवं अन्य सुखों की प्राप्ति होती है. शिक्षा एवं ज्ञान में वृद्धि होती है. शत्रुओं का नाश होता है और भौतिक सुख सुविधाओं की प्राप्ति होती है. व्यक्ति विचारशील होकर कार्य करता है. उसे राजसी ठाठ बाट मिलता है, उच्च राजकीय सम्मान एवं पद की प्राप्ति होती है. भू-संपत्ति का लाभ मिलता है. व्यापार एवं व्यवसाय में वृद्धि होती है. शिक्षा एवं ज्ञान में वृद्धि होती है. अनेकों प्रकार की सुख एवं सुविधाओं की प्राप्ति होती है.

स्वप्न अवस्था | Swapna Awastha:

इस अवस्था में ग्रह मध्यम बल का होता है. वह अपना पचास प्रतिशत तक फल देने वाला होता है. इसके अंतर्गत ग्रह की स्थिति को इस बात से समझा जाता है कि ग्रह या तो मित्र राशि में होता है या शुभ वर्गों के साथ युति में हो अथवा उनके द्वारा दृष्ट हो रहा हो तथा उस ग्रह को गुरू का सहयोग मिल रहा हो तो इस अवस्था को उस ग्रह की स्वप्न अवस्था कहते हैं.

स्वप्न अवस्था प्रभाव | Effect of Swapna Awastha:

इस अवस्था में ग्रह के 50% फल मिलते हैं जिसके द्वारा कुछ शुभ फलों की प्राप्ति होती है. शांत प्रकृति देखी जा सकती है. व्यक्ति दान करने की चाह रखने वाला होता है. शास्त्रों के प्रति रुचि एवं लगाव होता है. पठन पाठन में मन लगाने वाला होता है. व्यक्ति के मित्रों की संख्या अच्छी होती है तथा व्यक्ति राजा का मंत्री या सलाहकार भी हो सकता है. वर्तमान समय में व्यक्ति किसी अच्छे पद पर सलाहकार का काम करने वाला हो सकता है.

सुसुप्त अवस्था | Susupta Awastha:

इस अवस्थ अमें ग्रह अधम या अक्षम होता है. केवल सात प्रतिशत के करीब फल देता है. इस अवस्था में ग्रह नीच का होता है, ग्रह अपने शत्रु की राशी में हो सकता है. शत्रु के क्षेत्रीय होता हो या अशुभ ग्रहों के साथ हो तब यह उस ग्रह कि सुसुप्त या सोई हुई अवस्था होती है.

सुसुप्त अवस्था प्रभाव | Effect of Sususpta Awastha:

इस अवस्था के कारण धार्मिकता का लोप होता है. बिमारी के लक्षण देखे जा सकते हैं. सोचने समझने की ताकत कम होती है विवेक पूर्ण कार्य नहीं हो पाता. व्यक्ति जीवन में लक्ष्यहीन सा महसूस करता है, झगडालू प्रवृत्ति होने लगती है. पांचवें भाव के प्रभावों क अलोप होने लगता है. इस अवस्था के कारण धन की हानी होती है. निर्बल होता है और प्रताड़ना मिलती है. नीच कर्म करने वाला होता है. स्वास्थ्य में हमेशा परेशानी बनी रह सकती है. शत्रुओं से परेशानियां, धन एवं मान सम्मान की हानी, शरीर की उर्जा का ह्रास होत है. तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर पेश करने की आदत होती है. कुतर्क करने वाला होता है.

वैदिक ज्योतिष में ग्रहों की कई प्रकार की अवस्थाओं का वर्णन मिलता है. यह अवस्थाएँ ग्रहों के अंश अथवा अन्य कई तरह के बलों पर आधारित होती हैं. बालादि अवस्था में ग्रहों को बल उनके अंशो के आधार पर मिलता है जबकि दीप्तादि में राशि के आधार पर मिलता है. जैसे कि नाम से ही पता चलता है कि ये अवस्थाएँ ग्रह के प्रकाश को बताती हैं. जब ग्रह अपनी उच्च राशि, मूल त्रिकोण राशि और स्वराशि में होते हैं तो राशियों की स्थिति के अनुकूल फल देते हैं और इन्हें ही दीप्तादि अवस्था कहते हैं .

जिस प्रकार समाज में व्यक्ति एक-दूसरे के मित्र या शत्रु होते हैं उसी प्रकार ग्रह भी आपस में मित्रता, शत्रुता और समभाव रखते हैं उसी के अनुसार वह फल भी देते हैं. यह अवस्थाएँ ग्रहों की नैसर्गिक तथा तात्कालिक मित्रता को को मिलाकर पंचधा मैत्री से देखा जाता है.

दीप्त अवस्था | Dipta Avastha:

जब भी कोई ग्रह कुण्डली में उच्च का हो या अपनी उच्च राशि में स्थित हो अथवा उच्च के अंश में स्थित हो तो वह उसकी दीप्त अवस्था होती है. इसमें वह अपने सम्पूर्ण फल देने में सक्षम होता है. इस अवस्था में ग्रह अपने पूर्ण प्रकाश युक्त होता है. दीप्त अवस्था में स्थित ग्रह की दशा आने पर वह ग्रह अपार सम्पदा प्रदान करता है.

दीप्त अवस्था प्रभाव | Effects of Dipta Avastha:

इस अवस्था से साहस, वैभव, धन संपत्ति, भौतिक वस्तुओं की प्राप्ति, दीर्घकालिक खुशी, राजकीय मान सम्मान, राजकृपा, प्राप्त होती है. व्यक्ति शक्तिशाली, गुणवान व पुरूषार्थी होता है. उसके कार्यों में शालीनता होती है.

स्वस्थ अवस्था | Svastha Avastha:

जब भी ग्रह कुण्डली में अपनी मूलत्रिकोण राशि में या स्वराशि में होता है तब वह स्वस्थ अवस्था में होता है. इसमें वह अच्छे फल देता है. व्यक्ति समाजिक यश प्राप्त करता है और हर क्षेत्र में उसे सफलता मिलती है. वह शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है और यश, सम्पदा, सम्मान प्राप्त करता है.

स्वस्थ अवस्था प्रभाव | Effects of Svastha Avastha:

इस अवस्था में ग्रह अपने ही घर में माना जाता है. इस अवस्था में ग्रह अपने सारे फल देने में सक्षम होता है. ग्रह जिस भाव में स्थित होता है और जिन भावों का स्वामी होता है उनसे संबंधित सभी अशुभ व शुभ फल प्रदान करता है. जातक को धन, वाहन, भवन, आभूषण सभी कुछ प्राप्त होता है. भौतिक सुख, विलास पूर्ण वस्तुएं, आभूषण, अच्छा स्वास्थ्य, आराम-परस्त जीवन, भूमि सुख, दांपत्य सुख, संतान, धार्मिक विचारों से परिपूर्ण, पद्दोन्नति आदि मिलती है.

मुदित अवस्था | Mudita Avastha:

जन्म कुण्डली में कोई भी ग्रह यदि अपनी मित्र की राशि में स्थित होता है तब वह उस ग्रह की मुदित अवस्था होती है. जिस प्रकार व्यक्ति अपने अच्छे मित्रों के साथ खुश रहता है ठीक उसी प्रकार ग्रह भी अपनी मित्र राशि में मुदित अर्थात प्रसन्न रहते हैं. मुदित अवस्था के प्रभाव से व्यक्ति धन-सम्पत्ति व धार्मिक कार्यो में रुचि दर्शाता है. जातक किसी की सहायता से भी कार्य कर सकता है. इस अवस्था में स्थित ग्रह की दशा होने पर जातक जीवन में सफलता प्राप्त करता है तथा जीवन में नई ऊचाईयों को छूता है.

मुदित अवस्था प्रभाव | Effects of Mudita Avastha:

कुण्डली में यदि ग्रह अपनी मुदित अवस्था में स्थित है तब व्यक्ति को आर्थिक लाभ और धन प्राप्ति होती है. व्यक्ति सभ्य व्यवहार करने वाला होता है और उसे मानसिक संतोष की प्राप्ति होती है. उसे आभूषण, वस्त्र, वाहन का सुख मिलता है. धार्मिक प्रवृति जागृत होती है और मित्र के व्यवहार द्वारा अच्छे गुणों की प्राप्ति होती है.

शान्त अवस्था | Santa Avastha:

कोई ग्रह कुण्डली में शुभ ग्रह की राशि में हो और वर्गो (सप्तमांश् नवांश, दशमाशं इत्यादि ) में अपने शुभ वर्गों में होता है तो वह उसकी शान्त अवस्था होती है. जातक धैर्यवान व शान्त प्रकृति का होता है. वह शास्त्रों का ज्ञाता होता है और दानी होता है. व्यक्ति बहुत से मित्रों से परिपूर्ण हो सकता है. व्यक्ति सरकारी अधिकारी होकर किसी उच्च पद पर आसीन हो सकता है.

शांत अवस्था प्रभाव | Effects of Santa Avastha:

यह अवस्था मानसिक संतोष की अनुभूति प्रदान करने वाली होती है. जातक मित्रता पूर्ण व्यवहार करने वाला होता है. एक अच्छे सलाहकार की भूमिका निभाने वाला होता है. लेखन कार्य में रुचि होती है. अधिक पाने की लालसा रहती है. मकान एवं जायदाद संबंधी सुख की प्राप्ति होती है. धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन करना एवं योग ध्यान में रुचि उत्पन्न होती है.

शक्त अवस्था | Shakt Avastha:

कुण्ड्ली में जब कोई ग्रह उदित अवस्था अर्थात ग्रह के अस्त होने से पहले की अवस्था में होता है तब यह ग्रह की शक्त अवस्था होती है. इस अवस्था में ग्रह इतना शक्तिशाली नहीं होता और पूर्ण फल देने में समर्थ नही होता है परन्तु वह अपने कार्य में सक्षम, शत्रु का नाश करने वाला, शौकीन मिजाज़ होता है. इस अवस्था में स्थित ग्रह की दशा होने पर जातक जीवन में कठिनाईयो के साथ सफलता प्राप्त करता है.

शक्त अवस्था प्रभाव | Effects of Shakt Avastha:

इस अवस्था के प्रभाव के परिणामस्वरुप व्यक्ति को मान सम्मान की प्राप्ति होती है, उसे जीवन में खुशी मिलती है. व्यक्ति को अपने कामों के लिए प्रसिद्धि मिलती है, उसके पुरुषार्थ में वृद्धि होती है, कार्यों को संपन्न करने की दक्षता होती है. व्यक्ति को अचानक से मिलने वाले परिणाम प्राप्त होते हैं. उतार- चढाव से भरी जिंदगी भी हो सकती है. लेकिन बहुत बुरे परिणाम नहीं मिलते हैं.

पीड़ित अवस्था | Peedit Avastha:

कुण्डली में जब भी ग्रह सूर्य के समीप आते है तब वह अस्त हो जाते है. इस अवस्था में ग्रह अपना प्रभाव खो देते है. अस्त ग्रह की अवस्था उसकी पीडित अवस्था होती है. इस अवस्था में ग्रह अशुभ फल प्रदान करता है. जातक बुरे व्यसनों में लिप्त हो सकता है. यदि लग्नेश होकर ग्रह अस्त होगा तो जातक जीवन मे रोग ग्रस्त हो सकता है. जातक को अपने जीवन काल मे बदनामी मिल सकती है. पीडित ग्रह जातक को कार्य में असफलता देता है.

पीड़ित अवस्था प्रभाव | Effects of Peedit Avastha:

व्यक्ति को जीवन में धन हानि हो सकती है. जीवन साथी एवं बच्चों से अनबन और कलह की स्थिति उत्पन्न हो साक्ती है व्यक्ति रोग एवं व्याधि से प्रभावित हो सकता है, विशेषकर नेत्र संबंधी रोग परेशानी दे सकते हैं. व्यक्ति की किसी कारण से बदनामी हो सकती है अथवा वह पाप पूर्ण या अनैतिक कामों में लिप्त हो सकता है. व्यक्ति को अपने द्वारा किए प्रयासों में विफलता मिलती है और वह बुरी लत से प्रभावित हो सकता है.

दीन अवस्था | Deen Avastha:

जब भी ग्रह कुण्डली में अपनी नीच राशि में होता है वह उसकी दीन अवस्था होती है. यहाँ ग्रह अपनी सारी शक्ति खो चुका होता है. व्यक्ति को अपने जीवन काल में संघर्षो से गुजरना पडता है. जीवन में निर्धनता का सामना करना पडता है. व्यक्ति सरकारी अधिकारियों से दुखी, भयभीत, अपने लोगो से शत्रुता, कानून व सामाजिक नियमों की अवहेलना करने वाला होता है.

दीन अवस्था प्रभाव | Effects of Deen Avastha:

ग्रह की इस अवस्था में व्यक्ति के बनते हुए काम बिगड़ जाते हैं. व्यक्ति कुछ ज्यादा ही व्यावहारिक हो जाता है. हर परिस्थिति से डरने वाला, शोक संताप से पीड़ित, शारीरिक क्षमता में गिरावट का अनुभव होता है. संबंधियों से विरोध का सामना करना पड़ सकता है और घर परिवर्तन की स्थिति उत्पन्न होने की नौबत तक आ सकती है. व्यक्ति बिमारियों से ग्रस्त होता है एवं लोगों द्वारा तिरस्कृति भी हो सकता है.

विकल अवस्था | Vikal Avastha:

जब भी कुण्डली के किसी भी भाव या राशि में ग्रह पाप (अशुभ) ग्रहों के साथ होता है तब वह ग्रह की विकल अवस्था होती है. जिस तरह से एक साधारण व्यक्ति यदि किसी ताकतवर या पाप कर्म करने वाले व्यक्ति के साथ बैठ जाता है तब वह स्वयं को बेचैन महसूस करता है. इसी तरह ग्रह भी पाप ग्रहों के साथ बेचैनी महसूस करते हैं और यही अवस्था ग्रह की विकल अवस्था होती है. ग्रह अपने फलानुसार फल नही दे पाता और वह साथ बैठे ग्रहों के अनुरुप फल देता है. इसके फल स्वरुप जातक नीच प्रकृति वाला होता है. जातक शक्तिहीन होकर दूसरों का सेवक होता है और बुरी संगति का संग करने वाला होता है.

विकल अवस्था प्रभाव | Effects of Vikal Avastha:

ग्रह की विकल अवस्था के परिणामस्वरुप व्यक्ति शक्तिहीन तथा बलहीन होता है. व्यक्ति की आत्म-सम्मान की हानि भी हो सकती है. मित्रों एवं सगे संबंधियों से अलगाव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है. आत्मिक दुख, मानसिक प्रताड़ना, जीवन साथी तथा बच्चों से हानि एवं कष्ट की स्थिति पैदा हो सकती है. व्यक्ति को चोरों द्वारा हानि भी हो सकती है. उसके स्तरहीन लोगों से संबंध बनते हैं.

खल अवस्था | Khal Avastha:

जब भी कुण्डली के किसी भी भाव या राशि में दो ग्रह या दो से अधिक ग्रह आपस में 1 अंश के अन्तर में हों तो यह गृह युद्ध की स्थिति होती है. इसमे से अधिक अंशो वाला ग्रह युद्ध में परास्त होता है. परास्त ग्रह खल अवस्था में माना जाता है वह जातक को निर्धन बनाता है और जातक क्रोधी स्वभाव वाला होता है. जातक दूसरों के धन पर बुरी दृष्टि रखने वाला होता है.

खल अवस्था प्रभाव | Effects of Khal Avastha:

ग्रह की इस अवस्था के प्रभाव से व्यक्ति के अंदर शत्रुता की भावना पनपती है. वह अपने ही लोगों द्वारा प्रताड़ित होता है. स्वभाव से झगडालू हो सकता है. अपने पिता से व्यक्ति की अलगाव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है. धन- संपत्ति एवं जायदाद की हानि हो सकती है. व्यक्ति गलत कार्यों द्वारा धन एकत्रित करना चाहेगा तथा अपना हित करने वाला व स्वार्थी प्रवृत्ति का हो सकता है.

दुखी अवस्था | Dukhi Avastha:

जन्म कुण्डली में जब कोई ग्रह शत्रु ग्रह के क्षेत्र में हो अथवा शत्रु ग्रह की राशि में बैठा हो तो वह दुखी अवस्था में होता है. जिस तरह से यदि कभी किसी व्यक्ति को अपने शत्रु के घर में जाना पड़े तो वह वहाँ जाकर परेशानी का अनुभव करता है. इसी तरह से ग्रह भी शत्रु के घर में परेशान होता है. ग्रह की इस अवस्था के कारण व्यक्ति को अनेक कष्ट मिलते हैं. उसे परिस्थतियों के कारण कष्ट की अनुभूति होती है.

दुखी अवस्था प्रभाव | Effects of Dukhi Avastha:

ग्रह की इस अवस्था के कारण व्यक्ति का स्थान परिवर्तन होता है. अपने प्रिय जनों से अलग रहने की स्थिति पैदा हो सकती है. आग लगने का भय तथा चोरी का होने का भय व्यक्ति को सताता है. व्यक्ति के साथ सदा असमंजस की स्थिति बनी रहती है.

भाव संधि - जब कोई ग्रह भाव संधि पर होता है तो उसे निर्बल अवस्था में माना जाता है और ऐसा ग्रह पूर्ण फल देने में असमर्थ होता है /

भाव मध्य - जब कोई ग्रह भाव के बीचो बीच होता है या फिर बिच से निकट होता है तो उसे स्वस्थ्य अवस्था में माना जाता है और ऐसा ग्रह पूर्ण फल देने में समर्थ होता है /

ग्रहों का दिग्बल :

दिग्बली ग्रह जातक को अपनी दिशा में ले जाकर कई प्रकार से लाभ देने में सहायक बनते हैं. यह जातक को आर्थिक रूप से संपन्न बनाने में सहायक होते हैं तथा आभूषणों, भूमि-भवन एवं वाहन सुख देते हैं. व्यक्ति को वैभवता की प्राप्ति हो सकती है. जातक यशस्वी तथा सम्मानित व्यक्ति बनता है.

सूर्य | Sun

सूर्य के दिगबली होने पर व्यक्ति को आत्मिक रूप से मजबूत अंतर्मन की प्राप्ति होती है. वह अपने फैसलों के प्रति काफी सदृढ़ होता है. व्यक्ति में कार्यों को पूर्ण करने की जो स्वेच्छा उत्पन्न होती है वह बहुत ही महत्वपूर्ण होती है. व्यक्ति अन्य लोगों के लिए भी मार्गदर्शक बनकर उभरता है. सभी के लिए एक बेहतर उदाहरण रूप में वह समाज के लिए सहायक सिद्ध होता है. जन समाज कल्याण की चाह उसमें रहती है. व्यक्ति अपने निर्देशों का कडा़ई से पालन कराने की इच्छा रखता है. वह अपने कामों में सुस्ती नहीं दिखाता है उसकी यह प्रतिभा उसे आगे रखते हुए सभी के समक्ष सम्मानित कराती है.

चंद्रमा | Moon

चंद्रमा के दिग्बली होने पर व्यक्ति का मन शांत भाव से सभी कामों को करने की ओर लगा रहता है. जातक के मन में अनेक भावनाएं हर पल जन्म लेती रहती हैं. वह अपने मन को नियंत्रित करना जानता है जिस कारण वह उचित रूप से दूसरों के समक्ष स्वयं को प्रदर्शित करने की कला का जानकार होता है. जातक धन वैभव से युक्त होता है. रत्नों एवं वस्त्राभूषणों का सुख प्राप्त होता है. सरकार की कृपा प्राप्त होती है तथा समानित स्थान मिलता है. व्यक्ति का आकर्षण एवं दूसरों के साथ आत्मिक रूप से जुड़ जाना बहुत प्रबल होता है, इसी कारण यह जल्द ही दूसरों के चहेते बन जाते हैं. बंधु-बांधवों के चहेते होते हैं उनसे स्नेह प्राप्त करते हैं. जातक मान मर्यादा का पालन करने वाला होता है.

मंगल | Mars

मंगल ग्रह के दिग्बली होने पर व्यक्ति का साहस और शौर्य बढ़ता है. व्यक्ति भय की भावना से मुक्त होता है और वह किसि भी कार्य को करने से भय नहीं खाता है. जातक अपने मार्ग को स्वयं सुनिश्चित करने वाला होता है वह अपने नियमों तथा वचनों का पक्का होता है. वह विद्वान लोगों का आदर करने वाला होता है तथा दूसरों के लिए मददगार सिद्ध होता है. उसके कामों में स्वेच्छा अधिक झलकती है. किसी अन्य के कथनों को मानने में उसे कष्ट होता है. वह अपने नेतृत्व क चाह रखने वाला होता है वह चाहता है की दूसरे भी उसकी इच्छा का आदर करें और उसके निर्देशों का पालन करने वाले हों. जातक में धर्मिकता का आचरण करने की इच्छा रहती है वह अनेक व्यक्तियों को आश्रय देने वाला होता है.

बुध | Mercury

बुध के दिग्बली होने पर जातक का स्वभाव काफी प्रभावशाली बनता है. उसमें स्वयं के लिए विशेष अनुभूति प्रकट होती है. वह अपने अनुसार जीवन जीने की चाह रखने वाला होता है तथा किसी के आदेशों को सुनने की चाह उसमें नहीं होती है. व्यक्ति में चातुर्य का गुण प्रबल होता है, अपनी वाणी के प्रभाव द्वारा लोगों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है. जातक में स्नेह और सौहार्दय भी होता है वह दूसरों को अपने साथ जोड़ने वाला होता है तथा प्रेम की चाह रखता है. जातक जीवन में सुख सुविधाओं की चाह रखने वाला होता है वह जीवन को सामर्थ्य पूर्ण जीना चाहता है. हास-परिहास में पारंगत होता है और प्रसन्नचित रहने वाला वाक-कुशलता से युक्त होता है.

बृहस्पति | Jupiter

बृहस्पति के दिग्बली होने पर जातक को सुखों की प्राप्ति होती है. देह से स्वस्थ रहता है तथा मन से मजबूत होता है. हितकारी होता है तथा विद्वेष की भावना से मुक्त रहते हुए काम करने वाला होता है. जातक दूसरों के सहयोग के लिए प्रयासरत रहता है और मददगार होता है. जातक को विद्वान लोगों की संगति मिलती है तथा गुरूजनों की सेवा करके प्रसन्न रहता है. अन्न वस्त्र इत्यादि का सुख भोगने वाला होता है आर्थिक रूप से संतुष्ट रहता है. शत्रुओं के भय से मुक्त रहता है तथा निर्भयता से काम करने वाला होता है. जातक के विचारों को सभी लोग बहुत सम्मान देते हैं तथा प्रजा की दृष्टि में उसे सम्मान की प्राप्ति होती है.

शुक्र | Venus

शुक्र के दिगबली होने पर जातक के जीवन में सौंदर्य का आकर्षण प्रबल होता है. साजो सामान के प्रति उसे बहुत लगाव रहता है तथा वह अपने रहन सहन को भी बहुत उन्नत किस्म का जीने की चाहत रखने वाला होता है. व्यक्ति को स्वयं को सजाने संवारने की इच्छा खूब होती है वह अपने बनाव श्रृंगार पर खूब समय व्यतीत कर सकता है. जातक दूसरों के आकर्षण का आधार भी होता है. लोग इनकी ओर स्वत: ही खिंचे चले आते हैं. जातक देश-विदेश में प्रतिष्ठित होता है और धनार्जन करता है. उदार मन का तथा दूसरों के लिए समर्पण का भाव भी रखता है.

शनि | Saturn

शनि के दिग्बली होने पर जातक ब्राह्मण व देवताओं का भक्त तथा सेवक होता है. वह दूसरों के लिए सेवाकार्य करने वाला होता है. सहायक बनता है. भोग-विलास की इच्छा करने वाला होता है. गीत संगीत तथा नृत्य इत्यादि में व्यक्ति की की रूचि होती है. चतुरता पूर्ण कार्यों को अंजाम देने की कला का जानकार होता है तथा व्यापार कार्यों में निपुण रहता है.

पूर्व दिशा लग्न में बुध व गुरु दिग्बली हो जाते है बौधिक क्षमता ज्यादा होगी व्यकित्व अच्छा होगा /
दशम भाव में सूर्य व मंगल को दिग्बल प्राप्त है जो कैरियर के लिए है
सप्तम भाव शनि को दिग्बल प्राप्त है विवाह के लिए
चतुर्थ भाव चन्द्र व शुक्र को दिग्बल प्राप्त है भौतिक सुख

ग्रहों का चतुर्विद सम्बन्ध :

क्षेत्र सम्बन्ध :- जब दो गृह एक दुसरे की राशी में स्थित होते है तो क्षेत्र सम्बन्ध हो जाता है इसे परिवर्तन योग भी कहा जाता है /

द्रष्टि सम्बन्ध :-जब दो गृह एक दुसरे को पूर्ण द्रष्टि से देखते है /

स्थान द्रष्टि सम्बन्ध :- जब किसी गृह को उसकी अधिष्ठित राशी का स्वामी पूर्ण द्रष्टि से देखता हो तो स्थान द्रष्टि सम्बन्ध कहते है /

युति सम्बन्ध :- जब किसी भी भाव में दो गृह एक साथ बैठे हो तो युति सम्बन्ध होता है /

राज योग में अशुभ ग्रह राज योग खंडित कर देता है /