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शिवपिंडी पर बेल पत्र कैसे चढाए तथा बेल पत्र तोड़ने के नियम

बेल के वृक्ष में देवता निवास करते हैं । इस कारण बेल वृक्ष के प्रति अतीव कृतज्ञता का भाव रख कर उससे मन ही मन प्रार्थना करने के उपरांत उससे बेल पत्र तोडना आरंभ करना चाहिए । शिवपिंडी की पूजा के समय बेल पत्र को औंधे रख एवं उसके डंठल को अपनी ओर कर पिंडी पर चढाते हैं ।


शिवपिंडी पर बेल पत्र को औंधे चढाने से उससे निर्गुण स्तर के स्पंदन अधिक प्रक्षेपित होते हैं । इसलिए बेल पत्र से श्रद्धालु को अधिक लाभ मिलता है । सोमवार का दिन, चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी तथा अमावस्या, ये तिथियां एवं संक्रांति का काल बेल पत्र तोडने के लिए निषिद्ध माना गया है । 

बेल पत्र शिवजी को बहुत प्रिय है, अतः निषिद्ध समय में पहले दिन का रखा बेल पत्र उन्हें चढा सकते हैं । बेल पत्र में देवतातत्त्व अत्यधिक मात्रा में विद्यमान होता है । वह कई दिनों तक बना रहता है ।

इस कालावधि में शिव-तत्त्व अधिक से अधिक आकृष्ट करनेवाले बेल पत्र, श्वेत पुष्प इत्यादि शिवपिंडी पर चढाए जाते हैं । इनके द्वारा वातावरण में विद्यमान शिव-तत्त्व आकृष्ट किया जाता है । भगवान शिव के नाम का जाप करते हुए अथवा उनका एक-एक नाम लेते हुए शिवपिंडी पर बेल पत्र अर्पण करने को बिल्वार्चन कहते हैं । इस विधि में शिवपिंडी को बेल पत्रोंसे संपूर्ण आच्छादित करते हैं ।



सात वारों के देवी-देवताओ की प्रसन्नता हेतु वैदिक उपाय


सूर्य आदि सात ग्रहों के नाम पर सप्ताह के सात दिन तय किए गए हैं। हर वार का अधिपति कोई एक ग्रह है, लेकिन ग्रह देवों को भी अन्य प्रधान देवों के साथ जोड़ा गया है। इस सबके पीछे विज्ञान, ग्रहों की चाल, ऋतुचर्या, दिनचर्या और स्वस्थ सुखी रहने के तौर-तरीके बड़ी कुशलता के साथ पिरोए गए हैं।

वारों का क्रम किस प्रकार तय है यह समझने के लिए हमें आसमान में ग्रहों की कक्षाओं के क्रम को समझना होगा। ये इस प्रकार हैं-  

1. शनि 2. गुरु 3. मंगल 4. रवि 5. शुक्र  6. बुध 7. चंद्रमा। 

इनमें हर चौथा ग्रह अगले वार का मालिक होता है जैसे, रविवार के बाद उससे चौथे चन्द्रमा का, फिर चन्द्र से चौथे मंगल का क्रमश: वार आता-जाता है।

वारों के अधिदेवता:

ग्रहों को मूल रूप से विष्णु या महादेव के अंश से उत्पन्न समझा जाता है। सूर्य की पूजा, नमस्कार, अर्घ्य देना तो खास तौर पर विष्णु और शिव ही क्यों, सब तरह की पूजा में अनिवार्य कहा गया है। वारपति ग्रह और अवतारों का संबंध इस तरह से है-

1. सूर्य- रामावतार, 
2. चन्द्र- श्रीकृष्णावतार, 
3. मंगल- नृसिंह अवतार, 
4. बुध- बुद्ध अवतार, 
5. गुरु-वामन अवतार, 
6. शुक्र- परशुराम अवतार, 
7. शनि- कर्म अवतार।

इससे हम आसानी से समझ सकते हैं कि सब ग्रह आदि देव विष्णु या शिव जो भी नाम दें, उसी से निकले हैं।
रविवार का वारपति सूर्य स्वयं जीवन का आधार होने से विष्णु रूप कहा गया है। अत: ’आरोग्यं भास्करादिच्छेत्’ के नियम से रोग के प्रकोप को कम करने, स्वस्थ रहने, दवा का अनुकूल प्रभाव पैदा करने और आयु की रक्षा तथा आत्मबल, तन व मन की ताकत को देने वाला सूर्य है। जन्म का कारण होने से सविता, प्रसविता, प्रसव कराने वाला परिवार वृद्धि का देवता है। जो लोग प्रजनन अंगों के विकार के कारण, अज्ञात कमी की वजह से औलाद का सुख नहीं देख पाते हैं, उनके लिए सूर्य की उपासना बहुत मुफीद होती है। सूर्य के लिए गायत्री मंत्र, केवल ओम् नाम या ‘ओम् घृणि: सूर्य आदित्य:’ का जप करना, जल चढ़ाना, माता पिता या उनके जैसे जनों को ठेस न पंहुचाना अच्छा है। 

सूर्य को प्रसन्न रखने के कुछ उपाय:

सुबह मुंह को गीला रखकर सूर्य के सामने गायत्री मन्त्र या ओम् नाम का 10 या 28 बार जप करना चाहिए। 
घर में धूप और खुली हवा का प्रबंध, धूप सेंकना, बुजुर्गो के मन को ठेस नहीं पहुंचाना चाहिए।
घर में गंगाजल या किसी कुदरती सोते का जल सहेजना चाहिए।
संक्रान्ति, अमावस्या, पूर्णिमा, अष्टमी के दिन और दोनों वक्त मिलने के समय कलह, बहस, देर तक सोना और संभोग से बचें। इनसे सारे ग्रहों की अनुकूलता बनती है।

चंद्रमा को अनुकूल रखने के उपाय:

सोमवार का पति चंद्रमा मन, विचार, भावुकता, चंचलता, आवेग और आवेश का प्रतीक है। चंद्र की अनुकूलता से मन पर नियंत्रण, निर्णय करने की सही दिशा और दिल के बजाए दिमाग से अधिक काम लेने की आदत बनती है। सोम जल का ग्रह होने से शिव को खास प्रिय है। इस दिन शिवजी की पूजा, आराधना करना उपयुक्त है। ध्यान रखें शिव की पूजा सदा माता पार्वती के साथ ही साम्बसदाशिव के रूप में ही सांसारिक सुखों के लिए अधिक फलदायी है। 

चंद्र को प्रसन्न रखने के कुछ  तरीके ये हैं:

दूध, खीर, सेवई, मिठाई, पनीर, दान करना चाहिए और तारों की छांव या चांदनी में कुछ देर बैठना चाहिए।
बड़, पीपल, गूलर की गोलियां, फल या जड़ घर में रखें। अपनी कुल प्रतिष्ठा, सम्पदा को संभालें। पानी का सेवन करना और माता-पिता से अलगाव या दूरी न रखना चन्द्रमा को प्रसन्न रखने का कारगर तरीका है।
दूध में मुल्तानी मिट्टी, चोकर या बेसन मिला कर उबटन करें। किसी के सामने अपनी व्यथा किसी को ना सुनाए।

मंगल अनुकूलता के उपाय:

मंगलवार का वारपति मंगल, युद्घ और हथियारों का ग्रह हैं। इसके देवता वीर हनुमान, एकदंत गणेश और मलय स्वामी हैं। हनुमान जी की पूजा, प्रसाद चढ़ाना, मंगल का व्रत रखना और इस दिन शाकाहार करना अच्छा है। हनुमान चालीसा का पाठ आसान और कारगर उपाय है। 

अतिरिक्त शुभता के लिए-
अपने सगे भाई बहनों के लिए अपशब्द न कहें और स्त्रियों से बहस न करें।
मीठी सुहाल, पूए, चीले, पूरनपोली खाएं, खिलाएं और बांटें।
भाभियों से सामान्य व्यवहार रखें और कभी विकलांगों की सहायता करें।
नीम, बबूल का सेवन किसी तरह से करें और पेड़-पौधों की देखभाल करते रहें।

बुध की अनुकूलता के उपाय:

बुधवार का वारपति बुध, बुद्धि, हास-परिहास, अभिनय और कला और वनस्पतियों का ग्रह है। इसके प्रधान देव विष्णु हैं। अत: विष्णु जी के किसी रूप की आराधना करना शुभ है। 

ओम् नमो भगवते वासुदेवाय या 
श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। हे नाथ नारायण वासुदेव।। 

का जप करना श्रेयस्कर है। 

मांस मदिरा, मानसिक हिंसा, पक्षियों को पालना, ससुराल से गहरे संबंध रखना आदि बातों से बचें।
वनस्पति, जड़ी-बूटी पाले प्रसाधन इस्तेमाल करना, सोना धारण करना, पौधे रखना, बहन बेटी और उनके परिवार जनों का आदर करना, केसर लगी मिठाई या केसरी हलुवा या मूंग दाल के पदार्थ खाना खिलाना शुभ है।
दादी को कोई भेंट देने, सांड को गुड़ रोटी खिलाने, केले और बताशे बांटने से बुध प्रसन्न रहता है।
स्नान जल में चावल डालना, पीपल में जल देना, हरी सब्जी शिवजी को भेंट करना, कभी पत्ते के दोने में कुछ खाना, कभी दान करना मंगलकारक है।

गुरु देव बृहस्पति की अनुकूलता के उपाय:

गुरुवार का देवता संसार का सृजनहार ब्रह्मा है। अत: विवाह, संतान सुख, परिवार सुख, ज्ञान, वाणी और हुनर के साथ बड़प्पन अधिकार का स्वामी बृहस्पति है। इसके लिए सिर्फ ओम् नाम का जप करना काफी फायदेमंद है। 

अधिक शुभता के लिए:

किसी के साथ कपड़े शेयर न करें। चरित्र, जुबान और आचरण को मजबूत रखें।
हल्दी वाली रोटी, चने की दाल, पीला वस्त्र, घी, बूरे का सेवन वितरण करें।
कन्याओं का आदर करें।

दैत्य गुरु शुक्र की अनुकूलता के उपाय:

शुक्रवार देवी के आधीन है। अत: दुर्गा पूजा, दीपक जलाना, खेतड़ी बोकर रखना, कन्यापूजन, करना और जालसाजी, झूठी गवाही से बचना अच्छा है। दुर्गाचालीसा आदि पढ़ना, खुशबू का प्रयोग, धूपबत्ती जलाना, साफ-सुथरा और आकर्षक बनने की कोशिश करना शुभ है।

शनि देव को अनुकूल बनाने के उपाय:

शनिवार के अधिपति भैरव, हनुमान, महाकाली, नृसिंह हैं। भावनानुसार इनमें से किसी की पूजा आराधना करना अच्छे परिणाम देगा। बस्ती के बाहर किसी शिवमंदिर में पूजा करना भी लाभदायक है। अधिक शुभता के लिए-
मजदूरों, मेहनतकशों का दिल न दुखाना, जीवन में अनुशासन रखना, साफ-सुथरा रहना, रोज नहाना और हाथ-पैर, दाढ़ी, नाखूनों को साफ सलीकेदार रखना, तेल मालिश, शनि को खुश रखने की रामबाण दवा है।

देवी देवताओ के बारे में वो बातें जिन्हें आप नहीं जानते होगे


प्र०-  देवता किसे कहते है?

उ०-देवो दानाद्वा, दीपनाद्वा द्योतनाद्वा , द्युस्थानो भवतीति वा । दान देने वाले देव कहाते हैं   दीपन अर्थात विद्या रुपी प्रकाश करने वाले देव कहाते हैं ।  द्योतन अर्थात सत्योपदेश करने वाले देव कहाते हैं ।विद्वान भी विद्या आदि का दान करने से देव कहाते हैं विद्वानसो ही देवा । सब मूर्ति मान पदार्थों का प्रकाश करने से सूर्य आदि को भी देवता कहते हैं । देव देवी देवता- इन सबका एक ही अर्थ है ।

प्र०- देवता कितने प्रकार के होते है?

उ०- देवता दो प्रकार के होते हैं- जड देवता और चेतन देवता ।

प्र०- चेतन देवता कौन से है?

उ०- माता , पिता , गुरु , आचार्य , अतिथि , पति पत्नी ये सब चेतन देवता है। 

प्र०- क्या चेतन देवों की पूजा करनी चाहिये और करे तो कैसे ?

उ०- हां करनी चाहिये क्योंकि ये हमारा पालन पौषण करते हैं, हमारी रक्षा करते हैं, हमे ज्ञान देकर मनुष्य बनाते हैं । और पूजा का अर्थ है सत्कार करना,  इन सबका सम्मान करना इनकी आज्ञा का पालन करना , इनकी आवश्यकता पूरी करना यही इनकी पूजा है ।और जो ऐसा नहीं करता उसे कृत्घ्नता का पाप लगता है।

प्र०- क्या यदि माता पिता उल्टी गलत शिक्षा दे तो उसे भी मानना चाहिये ? 

उ०- नहीं, यदि माता पिता दुष्ट हैं तो उनकी गलत बात बिल्कुल न माने, यदि वे चोरी आदि या मद्यपान आदि बुरी सलाह दे तो उसको न माने लेकिन सेवा फिर भी करे।

प्र०- पौराणिक लोग कहते हैं कि तैंतीस करोड़ देवता हैं , क्या यह सच है ? 

उ०- नहीं , कोटि शब्द के दो अर्थ हैं, पहला कोटि का अर्थ करोड़ और दूसरा कोटि का अर्थ प्रकार । जड देवता तैंतीस प्रकार के है।

प्र०- जड़ देवता कौन से है?

उ०- आठ वसु- अग्नि पृथ्वी वायु अन्तरिक्ष आदित्य द्यौ चन्द्रमा और नक्षत्र, इन्हें वसु इसलिए कहते हैं कि सब पदार्थ इन्हीं में वसते हैं । ग्यारह रुद्र - प्राण अपान व्यान उदान समान नाग कुर्म  कृकल देवदत्त धनञ्जय और जीवात्मा क्योंकि जब ये शरीर से निकलते हैं तो मरण होने से सब सम्बन्धी रोते हैं इसलिए इन्हें रुद्र कहते हैं । आदित्य बारह महिनों को कहते हैं क्योंकि सब जगत के पदार्थों का ये आदान करते हैं और सबकी आयु को ग्रहण करते हैं । इन्द्र बिजली को कहते हैं क्योंकि सब ऐश्वर्य की विद्या का आधार वही है। यज्ञ को प्रजापति इसलिए कहते हैं क्योंकि सब वायु और वृष्टिजल की शुद्धि द्वारा प्रजा का पालन होता है, पशुओं को भी यज्ञ कहते है क्योंकि उनसे भी प्रजा का पालन होता है। ये तैंतीस देव कहाते हैं  । इनके अतिरिक्त  तीन देव स्थान नाम जन्म को कहते हैं और अन्न व प्राण को भी देव कहते हैं ।

प्र०- क्या इन जड देवो की पूजा करनी चाहिये और कैसे?

उ०- जी हां, ईश्वर द्वारा दिये जड पदार्थों  का अपने व दूसरे के सुख के लिए सदुपयोग करना ही जड पूजा है। ईश्वर द्वारा बनाये पदार्थों की रक्षा करना उन्हें गन्दा न करना ही पूजा है क्योंकि ये अमूल्य है ।

प्र०- क्या ये सारे देव उपास्य है? 

उ०- नहीं । ईश्वर सब देवो का देव होने से महादेव कहाता है और केवल वही उपास्य है दूसरा नहीं।

प्र०- वेद मन्त्रों के साथ देवता लिखा होता है क्यों ? 

उ०- जिस मन्त्र का जो विषय जिस ऋषि ने समाधि अवस्था मे बैठकर साक्षात्कार किया उस मन्त्र का वही देवता व ऋषि होता है।

पूजापाठ से जुड़ी हुईं महत्वपूर्ण बातें


★ एक हाथ से प्रणाम नही करना चाहिए।

★ सोए हुए व्यक्ति का चरण स्पर्श नहीं करना चाहिए। 

★ बड़ों को प्रणाम करते समय उनके दाहिने पैर पर दाहिने हाथ से और उनके बांये पैर को बांये हाथ से छूकर प्रणाम करें। 

★ जप करते समय जीभ या होंठ को नहीं हिलाना चाहिए। इसे उपांशु जप कहते हैं। इसका फल सौगुणा फलदायक होता हैं।

★ जप करते समय दाहिने हाथ को कपड़े या गौमुखी से ढककर रखना चाहिए। 

★ जप के बाद आसन के नीचे की भूमि को स्पर्श कर नेत्रों से लगाना चाहिए।

★ संक्रान्ति, द्वादशी, अमावस्या, पूर्णिमा, रविवार और सन्ध्या के समय तुलसी तोड़ना निषिद्ध हैं।

★ दीपक से दीपक को नही जलाना चाहिए।

★ यज्ञ, श्राद्ध आदि में काले तिल का प्रयोग करना चाहिए, सफेद तिल का नहीं। 

★ शनिवार को पीपल पर जल चढ़ाना चाहिए। पीपल की सात परिक्रमा करनी चाहिए। परिक्रमा करना श्रेष्ठ है, 

★ कूमड़ा-मतीरा-नारियल आदि को स्त्रियां नहीं तोड़े या चाकू आदि से नहीं काटें। यह उत्तम नही माना गया हैं। 

★ भोजन प्रसाद को लाघंना नहीं चाहिए।

★  देव प्रतिमा देखकर अवश्य प्रणाम करें।

★  किसी को भी कोई वस्तु या दान-दक्षिणा दाहिने हाथ से देना चाहिए।

★  एकादशी, अमावस्या, कृृष्ण चतुर्दशी, पूर्णिमा व्रत तथा श्राद्ध के दिन क्षौर-कर्म (दाढ़ी) नहीं बनाना चाहिए ।

★ बिना यज्ञोपवित या शिखा बंधन के जो भी कार्य, कर्म किया जाता है, वह निष्फल हो जाता हैं।

★ शंकर जी को बिल्वपत्र, विष्णु जी को तुलसी, गणेश जी को दूर्वा, लक्ष्मी जी को कमल प्रिय हैं।

★ शंकर जी को शिवरात्रि के सिवाय कुंुकुम नहीं चढ़ती।

★ शिवजी को कुंद, विष्णु जी को धतूरा, देवी जी  को आक तथा मदार और सूर्य भगवानको तगर के फूल नहीं चढ़ावे।

★ अक्षत देवताओं को तीन बार तथा पितरों को एक बार धोकर चढ़ावंे।

★ नये बिल्व पत्र नहीं मिले तो चढ़ाये हुए बिल्व पत्र धोकर फिर चढ़ाए जा सकते हैं।

★ विष्णु भगवान को चावल गणेश जी  को तुलसी, दुर्गा जी और सूर्य नारायण  को बिल्व पत्र नहीं चढ़ावें।

★ पत्र-पुष्प-फल का मुख नीचे करके नहीं चढ़ावें, जैसे उत्पन्न होते हों वैसे ही चढ़ावें।

★ किंतु बिल्वपत्र उलटा करके डंडी तोड़कर शंकर पर चढ़ावें। 

★पान की डंडी का अग्रभाग तोड़कर चढ़ावें।

★ सड़ा हुआ पान या पुष्प नहीं चढ़ावे।

★ गणेश को तुलसी भाद्र शुक्ल चतुर्थी को चढ़ती हैं।

★ पांच रात्रि तक कमल का फूल बासी नहीं होता है।

★ दस रात्रि तक तुलसी पत्र बासी नहीं होते हैं।

★ सभी धार्मिक कार्यो में पत्नी को दाहिने भाग में बिठाकर धार्मिक क्रियाएं सम्पन्न करनी चाहिए।

★ पूजन करनेवाला ललाट पर तिलक लगाकर ही पूजा करें।

★ पूर्वाभिमुख बैठकर अपने बांयी ओर घंटा, धूप तथा दाहिनी ओर शंख, जलपात्र एवं पूजन सामग्री रखें।

★ घी का दीपक अपने बांयी ओर तथा देवता को दाहिने ओर रखें एवं चांवल पर दीपक रखकर प्रज्वलित करें। 

आप सभी को निवेदन है अगर हो सके तो और लोगों को भी आप इन महत्वपूर्ण बातों से अवगत करा सकते हैं

जानिये शिवलिंग पर क्या चढ़ाने से मिलता है क्या फल


सबसे पहले कुछ बातें बिल्व वृक्ष  की:

1. बिल्व वृक्ष के आसपास सांप नहीं आते ।

2. अगर किसी की शव यात्रा बिल्व वृक्ष की छाया से होकर गुजरे तो उसका मोक्ष हो जाता है ।

3. वायुमंडल में व्याप्त अशुध्दियों को सोखने की क्षमता सबसे ज्यादा बिल्व वृक्ष में होती है ।

4. चार पांच छः या सात पत्तो वाले बिल्व पत्रक पाने वाला परम भाग्यशाली और शिव को अर्पण करने से अनंत गुना फल मिलता है ।

5. बेल वृक्ष को काटने से वंश का नाश होता है। और बेल वृक्ष लगाने से वंश की वृद्धि होती है।

6. सुबह शाम बेल वृक्ष के दर्शन मात्र से पापो का नाश होता है।

7. बेल वृक्ष को सींचने से पितर तृप्त होते है।

8. बेल वृक्ष और सफ़ेद आक् को जोड़े से लगाने पर अटूट लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।

9. बेल पत्र और ताम्र धातु के एक विशेष प्रयोग से ऋषि मुनि स्वर्ण धातु का उत्पादन करते थे ।

10. जीवन में सिर्फ एक बार और वो भी यदि भूल से भी शिवलिंग पर बेल पत्र चढ़ा दिया हो तो भी उसके सारे पाप मुक्त हो जाते है ।

11. बेल वृक्ष का रोपण, पोषण और संवर्धन करने से महादेव से साक्षात्कार करने का अवश्य लाभ मिलता है।

कृपया बिल्व पत्र का पेड़ जरूर लगाये । बिल्व पत्र के लिए पेड़ को क्षति न पहुचाएं शिवजी की पूजा में ध्यान रखने योग्य बात शिवपुराण के अनुसार भगवान शिव को कौन सी चीज़ चढाने से मिलता है क्या फल किसी भी देवी-देवता का पूजन करते वक़्त उनको अनेक चीज़ें अर्पित की जाती है। 

प्रायः भगवन को अर्पित की जाने वाली हर चीज़ का फल अलग होता है। शिव पुराण में इस बात का वर्णन मिलता है की भगवन शिव को अर्पित करने वाली अलग-अलग चीज़ों का क्या फल होता है।

शिवपुराण के अनुसार जानिए कौन सा अनाज भगवान शिव को चढ़ाने से क्या फल मिलता है:

1. भगवान शिव को चावल चढ़ाने से धन की प्राप्ति होती है।

2. तिल चढ़ाने से पापों का नाश हो जाता है।

3. जौ अर्पित करने से सुख में वृद्धि होती है।

4. गेहूं चढ़ाने से संतान वृद्धि होती है।यह सभी अन्न भगवान को अर्पण करने के बाद गरीबों में वितरीत कर देना चाहिए।

शिवपुराण के अनुसार जानिए भगवान शिव को कौन सा रस (द्रव्य) चढ़ाने से उसका क्या फल मिलता है:

1. ज्वर (बुखार) होने पर भगवान शिव को जलधारा चढ़ाने से शीघ्र लाभ मिलता है। सुख व संतान की वृद्धि के लिए भी जलधारा द्वारा शिव की पूजा उत्तम बताई गई है।

2. नपुंसक व्यक्ति अगर शुद्ध घी से भगवान शिव का अभिषेक करे, ब्राह्मणों को भोजन कराए तथा सोमवार का व्रत करे तो उसकी समस्या का निदान संभव है।

3. तेज दिमाग के लिए शक्कर मिश्रित दूध भगवान शिव को चढ़ाएं।

4. सुगंधित तेल से भगवान शिव का अभिषेक करने पर समृद्धि में वृद्धि होती है।

5. शिवलिंग पर ईख (गन्ना) का रस चढ़ाया जाए तो सभी आनंदों की प्राप्ति होती है।

6. शिव को गंगाजल चढ़ाने से भोग व मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है।

7. मधु (शहद) से भगवान शिव का अभिषेक करने से राजयक्ष्मा (टीबी) रोग में आराम मिलता है।

शिवपुराण के अनुसार जानिए भगवान शिव को कौन का फूल चढ़ाया जाए तो उसका क्या फल मिलता है:

1. लाल व सफेद आंकड़े के फूल से भगवान शिव का पूजन करने पर भोग व मोक्ष की प्राप्ति होती है।

2. चमेली के फूल से पूजन करने पर वाहन सुख मिलता है।

3. अलसी के फूलों से शिव का पूजन करने से मनुष्य भगवान विष्णु को प्रिय होता है।

4. शमी पत्रों (पत्तों) से पूजन करने पर मोक्ष प्राप्त होता है।

5. बेला के फूल से पूजन करने पर सुंदर व सुशील पत्नी मिलती है।

6. जूही के फूल से शिव का पूजन करें तो घर में कभी अन्न की कमी नहीं होती।

7. कनेर के फूलों से शिव पूजन करने से नए वस्त्र मिलते हैं।

8. हरसिंगार के फूलों से पूजन करने पर सुख-सम्पत्ति में वृद्धि होती है।

9. धतूरे के फूल से पूजन करने पर भगवान शंकर सुयोग्य पुत्र प्रदान करते हैं, जो कुल का नाम रोशन करता है।

10. लाल डंठलवाला धतूरा पूजन में शुभ माना गया है।

11. दूर्वा से पूजन करने पर आयु बढ़ती है ।

पूजापाठ में दीपक जलाने के वैदिक नियम


दीप प्रकाश का द्योतक है, तो प्रकाश ज्ञान का। परमात्मा से हमें संपूर्ण ज्ञान मिले इसीलिए दीप प्रज्वलन  करने की परंपरा है। कोई भी पूजा हो या किसी समारोह का शुभारंभ। समस्त शुभ कार्यों का आरंभ दीप  प्रज्वलन से होता है। 

जिस प्रकार दीप की ज्योति हमेशा ऊपर की ओर उठी रहती है, उसी प्रकार मानव  की वृत्ति भी सदा ऊपर ही उठे, यही दीप प्रज्वलन का अर्थ है। अत: समस्त कल्याण की चाह रखने वाले  मनुष्य को दीप जलाते समय यह मंत्र अवश्य पढ़ना चाहिए। निश्चित ही आपका कल्याण होगा।  

1.दीपक जलाते समय और मंदिर में आरती लेते समय इस मंत्र का जाप करना चाहिए।

मंत्र- शुभम करोति कल्याणं, आरोग्यं धन संपदाम्। शत्रु बुद्धि विनाशाय, दीपं ज्योति नमोस्तुते।।

इस मंत्र का सरल अर्थ यह है कि शुभ और कल्याण करने वाली, आरोग्य और धन संपदा देने वाली, शत्रु बुद्धि का नाश और शत्रुओं पर विजय दिलाने वाली दीपक की ज्योति को हम नमस्कार करते हैं।

इस प्रकार दीपक जलाकर मंत्र बोलने से घर-परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है और शत्रुओं से हमारी रक्षा होती है।

2.देवी-देवताओं के सामने घी का दीपक अपने बाएं हाथ की ओर लगाना चाहिए। तेल का दीपक दाएं हाथ की ओर लगाना चाहिए।

3.इस बात का ध्यान रखें कि पूजा के बीच में दीपक बुझना नहीं चाहिए। ऐसा होने पर पूजा का पूर्ण फल प्राप्त नहीं हो पाता है। अगर दीपक बुझ जाता है तो तुरंत जला देना चाहिए और भगवान से भूल-चूक की क्षमायाचना करनी चाहिए।

4.घी के दीपक के लिए सफेद रुई की बत्ती उपयोग करना चाहिए। जबकि तेल के दीपक के लिए लाल धागे की बत्ती ज्यादा शुभ रहती है।

5.पूजा में कभी भी खंडित दीपक नहीं जलाना चाहिए। पूजा-पाठ में खंडित चीजें शुभ नहीं मानी जाती है।

6.अगर घर में नियमित रूप से दीपक जलाया जाता है तो वहां हमेशा सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है। दीपक के धुएं से वातावरण में मौजूद हानिकारक सूक्ष्म कीटाणु भी नष्ट हो जाते हैं।

7.शास्त्रों के अनुसार रोज शाम को मुख्य द्वार के पास दीपक जलाना चाहिए। इससे देवी लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं। इसी वजह से शाम को मेन गेट के पास दीपक जलाने की परंपरा चली आ रही है।