श्राद्ध और पितृपक्ष का वैज्ञानिक महत्व


श्राद्ध कर्म श्रद्धा का विषय है। यह पितरों के प्रति हमारी श्रद्धा प्रकट करने का माध्यम है। श्राद्ध आत्मा के गमन जिसे संस्कृत में प्रैति कहते हैं, से जुड़ा हुआ है। प्रैति ही बाद में बोलचाल में प्रेत बन गया। यह कोई भूत-प्रेत वाली बात नहीं है। शरीर में आत्मा के अतिरिक्त मन और प्राण हैं। आत्मा तो कहीं नहीं जाती, वह तो सर्वव्यापक है, उसे छोड़ दें तो शरीर से जब मन को निकलना होता है, तो मन प्राण के साथ निकलता है। प्राण मन को लेकर निकलता है। प्राण जब निकल जाता है तो शरीर को जीवात्मा को मोह रहता है। इसके कारण वह शरीर के इर्द-गिर्द ही घूमता है, कहीं जाता नहीं। शरीर को जब नष्ट किया जाता है, उस समय प्राण मन को लेकर चलता है। मन कहाँ से आता है? कहा गया है चंद्रमा मनस: लीयते यानी मन चंद्रमा से आता है। यह भी कहा है कि चंद्रमा मनसो जात: यानी मन ही चंद्रमा का कारक है। इसलिए जब मन खराब होता है या फिर पागलपन चढ़ता है तो उसे अंग्रेजी में ल्यूनैटिक कहते हैं। ल्यूनार का अर्थ चंद्रमा होता है और इससे ही ल्यूनैटिक शब्द बना है। मन का जुड़ाव चंद्रमा से है। इसलिए हृदयाघात जैसी समस्याएं पूर्णिमा के दिन अधिक होती हैं।

चंद्रमा वनस्पति का भी कारक है। रात को चंद्रमा के कारण वनस्पतियों की वृद्धि अधिक होती है। इसलिए रात को ही पौधे अधिक बढ़ते हैं। दिन में वे सूर्य से प्रकाश संश्लेषण के द्वारा भोजन लेते हैं और रात चंद्रमा की किरणों से बढ़ते हैं। वह अन्न जब हम खाते हैं, उससे रस बनता है। रस से अशिक्त यानी रक्त बनता है। रक्त से मांस, मांस से मेद, मेद से मज्जा और मज्जा के बाद अस्थि बनती है। अस्थि के बाद वीर्य बनता है। वीर्य से ओज बनता है। ओज से मन बनता है। इस प्रकार चंद्रमा से मन बनता है। इसलिए कहा गया कि जैसा खाओगे अन्न, वैसा बनेगा मन। मन जब जाएगा तो उसकी यात्रा चंद्रमा तक की होगी। दाह संस्कार के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में होगा, मन उसी ओर अग्रसर होगा। प्राण मन को उस ओर ले जाएगा। चूंकि 27 दिनों के अपने चक्र में चंद्रमा 27 नक्षत्र में घूमता है, इसलिए चंद्रमा घूम कर अ_ाइसवें दिन फिर से उसी नक्षत्र में आ जाता है। मन की यह 28 दिन की यात्रा होती है। इन 28 दिनों तक मन की ऊर्जा को बनाए रखने के लिए श्राद्धों की व्यवस्था की गई है।

चंद्रमा सोम का कारक है। इसलिए उसे सोम भी कहते हैं। सोम सबसे अधिक चावल में होता है। धान हमेशा पानी में डूबा रहता है। सोम तरल होता है। इसलिए चावल के आटे का पिंड बनाते हैं। तिल और जौ भी इसमें मिलाते हैं। इसमें पानी मिलाते हैं, घी भी मिलाते हैं। इसलिए इसमें और भी अधिक सोमत्व आ जाता है। हथेली में अंगूठे और तर्जनी के मध्य में नीचे का उभरा हुआ स्थान है, वह शुक्र का होता है। शुक्र से ही हम जन्म लेते हैं और हम शुक्र ही हैं, इसलिए वहाँ कुश रखा जाता है। कुश ऊर्जा का कुचालक होता है। श्राद्ध करने वाला इस कुश रखे हाथों से इस पिंड को लेकर सूंघता है। चूंकि उसका और उसके पितर का शुक्र जुड़ा होता है, इसलिए वह उसे श्रद्धाभाव से उसे आकाश की ओर देख कर पितरों के गमन की दिशा में उन्हें मानसिक रूप से उन्हें समर्पित करता है और पिंड को जमीन पर गिरा देता है। इससे पितर फिर से ऊर्जावान हो जाते हैं और वे 28 दिन की यात्रा करते हैं। इस प्रकार चंद्रमा के तेरह महीनों में श्येन पक्षी की गति से वह चंद्रमा तक पहुँचता है। यह पूरा एक वर्ष हो जाता है। इसके प्रतीक के रूप में हम तेरहवीं करते हैं। गंतव्य तक पहुँचाने की व्यवस्था करते हैं। इसलिए हर 28वें दिन पिंडदान किया जाता है। उसके बाद हमारा कोई अधिकार नहीं। चंद्रमा में जाते ही मन का विखंडन हो जाएगा।

पिंडदान कराते समय पंडित लोग केवल तीन ही पितरों को याद करवाते हैं। वास्तव में सात पितरों को स्मरण करना चाहिए। हर चीज सात हैं। सात ही रस हैं, सात ही धातुएं हैं, सूर्य की किरणें भी सात हैं। इसीलिए सात जन्मों की बात कही गई है। पितर भी सात हैं। सहो मात्रा 56 होती हैं। कैसे? इसे समझें। व्यक्ति, उसका पिता, पितामह, प्रपितामह, वृद्ध पितामह, अतिवृद्ध पितामह और सबसे बड़े वृद्धातिवृद्ध पितामह, ये सात पीढियां होती हैं। इनमें से वृद्धातिवृद्ध पितामह का एक अंश, अतिवृद्ध पितामह का तीन अंश, वृद्ध पितामह का छह अंश, प्रपितामह का दस अंश, पितामह का पंद्रह अंश और पिता का इक्कीस अंश व्यक्ति को मिलता है। इसमें उसका स्वयं का अर्जित 28 अंश मिला दिया जाए तो 56 सहो मात्रा हो जाती है। जैसे ही हमें पुत्र होता है, वृद्धातिवृद्ध पितामह का एक अंश उसे चला जाता है और उनकी मुक्ति हो जाती है। इससे अतिवृद्ध पितामह अब वृद्धातिवृद्ध पितामह हो जाएगा। पुत्र के पैदा होते ही सातवें पीढ़ी का एक व्यक्ति मुक्त हो गया। इसीलिए सात पीढिय़ों के संबंधों की बात होती है।

अब यह समझें कि 15 दिनों का पितृपक्ष हम क्यों मनाते हैं। यह तो हमने जान लिया है कि पितरों का संबंध चंद्रमा से है। चंद्रमा की पृथिवी से दूरी 385000 कि.मी. की दूरी पर है। हम जिस समय पितृपक्ष मनाते हैं, यानी कि आश्विन महीने के पितृपक्ष में, उस समय पंद्रह दिनों तक चंद्रमा पृथिवी के सर्वाधिक निकट यानी कि लगभग 381000 कि.मी. पर ही रहता है। उसका परिक्रमापथ ही ऐसा है कि वह इस समय पृथिवी के सर्वाधिक निकट होता है। इसलिए कहा जाता है कि पितर हमारे निकट आ जाते हैं। शतपथ ब्राह्मण में कहा है विभु: उध्र्वभागे पितरो वसन्ति यानी विभु अर्थात् चंद्रमा के दूसरे हिस्से में पितरों का निवास है। चंद्रमा का एक पक्ष हमारे सामने होता है जिसे हम देखते हैं। परंतु चंद्रमा का दूसरा पक्ष हम कभी देख नहीं पाते। इस समय चंद्रमा दक्षिण दिशा में होता है। दक्षिण दिशा को यम का घर माना गया है। आज हम यदि आकाश को देखें तो दक्षिण दिशा में दो बड़े सूर्य हैं जिनसे विकिरण निकलता रहता है। हमारे ऋषियों ने उसे श्वान प्राण से चिह्नित किया है। शास्त्रों में इनका उल्लेख लघु श्वान और वृहद श्वान के नाम से हैं। इसे आज केनिस माइनर और केनिस मेजर के नाम से पहचाना जाता है। इसका उल्लेख अथर्ववेद में भी आता है। वहाँ कहा है श्यामश्च त्वा न सबलश्च प्रेषितौ यमश्च यौ पथिरक्षु श्वान। अथर्ववेद 8/1/19 के इस मंत्र में इन्हीं दोनों सूर्यों की चर्चा की गई है। श्राद्ध में हम एक प्रकार से उसे ही हवि देते हैं कि पितरों को उनके विकिरणों से कष्ट न हो।

इस प्रकार से देखा जाए तो पितृपक्ष और श्राद्ध में हम न केवल अपने पितरों का श्रद्धापूर्वक स्मरण कर रहे हैं, बल्कि पूरा खगोलशास्त्र भी समझ ले रहे हैं। श्रद्धा और विज्ञान का यह एक अद्भुत मेल है, जो हमारे ऋषियों द्वारा बनाया गया है। आज समाज के कई वर्ग श्राद्ध के इस वैज्ञानिक पक्ष को न जानने के कारण इसे ठीक से नहीं करते। कुछ लोग तीन दिन में और कुछ लोग चार दिन में ही सारी प्रक्रियाएं पूरी कर डालते हैं। यह न केवल अशास्त्रीय है, बल्कि हमारे पितरों के लिए अपमानजनक भी है। जिन पितरों के कारण हमारा अस्तित्व है, उनके निर्विघ्न परलोक यात्रा की हम व्यवस्था न करें, यह हमारी कृतघ्नता ही कहलाएगी।

पितर का अर्थ होता है पालन या रक्षण करने वाला। पितर शब्द पा रक्षणे धातु से बना है। इसका अर्थ होता है पालन और रक्षण करने वाला। एकवचन में इसका प्रयोग करने से इसका अर्थ जन्म देने वाला पिता होता है और बहुवचन में प्रयोग करने से पितर यानी सभी पूर्वज होता है। इसलिए पितर पक्ष का अर्थ यही है कि हम सभी सातों पितरों का स्मरण करें। इसलिए इसमें सात पिंडों की व्यवस्था की जाती है। इन पिंडों को बाद में मिला दिया जाता है। ये पिंड भी पितरों की वृद्धावस्था के अनुसार क्रमश: घटते आकार में बनाए जाते थे। लेकिन आज इस पर ध्यान नहीं दिया जाता।

(वार्ताधारित)

✍🏻साभार - भारतीय धरोहर

लेखक - डॉ. ओमप्रकाश पांडे

(लेखक अंतरिक्ष विज्ञानी हैं)

शिवपिंडी पर बेल पत्र कैसे चढाए तथा बेल पत्र तोड़ने के नियम

बेल के वृक्ष में देवता निवास करते हैं । इस कारण बेल वृक्ष के प्रति अतीव कृतज्ञता का भाव रख कर उससे मन ही मन प्रार्थना करने के उपरांत उससे बेल पत्र तोडना आरंभ करना चाहिए । शिवपिंडी की पूजा के समय बेल पत्र को औंधे रख एवं उसके डंठल को अपनी ओर कर पिंडी पर चढाते हैं ।


शिवपिंडी पर बेल पत्र को औंधे चढाने से उससे निर्गुण स्तर के स्पंदन अधिक प्रक्षेपित होते हैं । इसलिए बेल पत्र से श्रद्धालु को अधिक लाभ मिलता है । सोमवार का दिन, चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी तथा अमावस्या, ये तिथियां एवं संक्रांति का काल बेल पत्र तोडने के लिए निषिद्ध माना गया है । 

बेल पत्र शिवजी को बहुत प्रिय है, अतः निषिद्ध समय में पहले दिन का रखा बेल पत्र उन्हें चढा सकते हैं । बेल पत्र में देवतातत्त्व अत्यधिक मात्रा में विद्यमान होता है । वह कई दिनों तक बना रहता है ।

इस कालावधि में शिव-तत्त्व अधिक से अधिक आकृष्ट करनेवाले बेल पत्र, श्वेत पुष्प इत्यादि शिवपिंडी पर चढाए जाते हैं । इनके द्वारा वातावरण में विद्यमान शिव-तत्त्व आकृष्ट किया जाता है । भगवान शिव के नाम का जाप करते हुए अथवा उनका एक-एक नाम लेते हुए शिवपिंडी पर बेल पत्र अर्पण करने को बिल्वार्चन कहते हैं । इस विधि में शिवपिंडी को बेल पत्रोंसे संपूर्ण आच्छादित करते हैं ।



स्वामी शिवोम तीर्थ जी महाराज की गुरु परंपरा पर विस्तृत लेख


स्वामी शिवोम तीर्थ जी महाराज की गुरु परंपरा पर विस्तृत लेख : अवश्य पढ़िए और सभी गुरु भक्तों के साथ सांझा भी कीजिये --

https://shaktipaat.blogspot.com/2023/07/blog-post.html


गूंगे,बहरे, हकले, मंदबुद्धि क्यों हो जाते हैं, बच्चे,?

 


ज्योतिष के अनुसार बुध ग्रह को कुंडली का युवराज कहा जाता है, यह व्यक्ति की वाणी पर प्रभाव डालता है, बुध को कुंडली का मंत्रणा करने वाला ग्रह माना जाता है। साथ ही यह कुंडली के संचार तंत्र का मालिक होता है। 

अगर कुंडली में बुध खराब हो जाए तो, सबसे पहले व्यक्ति में वाणी का दोष पैदा हो जाता है। इस स्थिति में व्यक्ति या तो हकलाने लगता है, साफ तरीके से नहीं बोल पाता, जल्दी-जल्दी में बोलता है या चीजें स्पष्ट नहीं बोल पाता है। संचार तंत्र का जो सिस्टम है वो कान, नाक और गले से ही चलता है, क्योंकि यहीं से पूरे शरीर का कम्युनिकेशन तय होता है, इसीलिए कान नाक गला सब एक दूसरे से जुड़े हुए होते हैं !

अगर बुध कुंडली में खराब है तो, कान, नाक और गले की समस्या परेशान करती है, जो लोग गूंगे-बहरे होते हैं उनकी कुंडलियों में अक्सर बुध की स्थिति अच्छी नहीं होती है। इसके अलावा बुध ग्रह का संबंध व्यक्ति के स्किन से ही होता है। इसलिए जब कुंडली बुध गड़बड़ होता है तो स्किन एलर्जी होने की संभावना बहुत ज्यादा होती है। 

पेरिडॉट रत्न !

बुध दोष को ठीक करने के लिए ज्योतिष में कुछ उपाय बताए गए हैं। अगर कुंडली में बुध दोष है तो ऐसी दशा में पेरिडॉट नाम का रत्न चांदी के लॉकेट में हरे धागे में बुधवार की शाम गले में पहनना चाहिए।

यदि बुध की वजह से कान, नाक और गले की समस्या है तो, ऐसी दशा में मन ही मन या बोलकर सुबह के समय 108 बार जप करना चाहिए। साथ ही यदि बुध के कारण से स्किन की समस्या है तो, नियमित रूप से सूर्य भगवान को जल चढ़ाना चाहिए। 

इसके अलावा सुबह और शाम दोनों समय बुध के मंत्र ॐ बुं बुधाय नमः का 108 बार जप करना चाहिए। तीसरा उपाय है कि, तांबे के बर्तन में रातभर पानी भरकर रखें और सुबह खाली पेट पिएं। अगर ये उपाय किए जाएं तो, बुध से संबंधित तमाम मुश्किलें दूर हो सकती हैं।

विवाह विच्छेदन (तलाक) के कारण और ज्योतिषीय उपाय

 



ज्योतिषशास्त्र के अनुसार विवाह भंग अर्थात तलाक या विवाह विच्छेदन का परिणाम समुदाय अष्टकवर्ग में भावों द्वारा प्राप्त बिन्दु पर भी निर्भर करता है, इसके साथ-साथ भिन्नाय अष्टकवर्ग में धनेश पंचमेश, सप्तमेश, अष्टमेश, द्वादशेश द्वारा प्राप्त अंक, पांचवें, सातवें, आठवें व बारहवें भावों का बल,धनेश,पंचमेश, सप्तमेश, अष्टमेश, द्वादशेश का इष्ट और कष्ट फल पर भी निर्भर करता है। परंतु सर्वाधिक रूप से इस बात पर निर्भर करता है के सप्तम भाव और सप्तम भाव का स्वामी किस पापी और क्रूर ग्रह से सर्वाधिक रूप से प्रताडि़त है। 

सप्तम भाव में सूर्य, राहू शनि व मंगल की उपस्थिती या सप्तमेश का नीच या वेधा स्थान में बैठकर पापी व क्रूर ग्रह से पीड़ित होना तलाक से परेशानी का कारण बनता है।

तलाक के ज्योतिषीय कारण: 

सातवें भाव में बैठे द्वादशेश से राहू की युति हो तो तलाक होता है। 

बारहवें भाव में बैठें सप्तमेश से राहु की युति हो तो तलाक होता है। 

पंचम भाव में बैठे द्वादशेश से राहू की युति हो तो तलाक होता है। 

पंचम भाव में बैठे सप्तमेश से राहू की युति हो तो तलाक होता है। 

सातवें
भाव का स्वामी और बाहरवें भाव का स्वामी अगर दसवें भाव में युति करता हो तो भी तलाक होता है। 

सातवें घर में पापी ग्रह हों व चंद्रमा व शुक्र पापी ग्रह से पीड़ित हो पति-पत्नी के तलाक लेने के योग बनते हैं। 

सप्तमेश व द्वादशेश छठे आठवें या बाहरवें भाव में हो और सातवें घर में पापी ग्रह हों तो तलाक के योग बनते है। 

सातवें घर में बैठे सूर्य पर शनि के साथ शत्रु की दृष्टि होने पर तलाक होता है। 

ज्योतिषशास्त्र में जहां समस्याएं हैं तो साथ-साथ उनके शतप्रतिशत समाधान भी मौजूद हैं। दांपत्य कलह से परेशान और तलाक से मुक्ति पाने का सबसे आसान और सरल समाधान है एकादश रुद्रावतार हनुमान जी। जैसे हनुमानजी ने भगवान राम और सीता माता का मिलन करवाया। उर्मिला व सीता के सुहाग की रक्षा हेतु उन्होंने अपने प्राणों तक के बारे में भी विचार नहीं किया। हनुमान जी ने राम जी की पत्नी सीता हेतु समुद्र तक लांघ लिया जैसे हनुमान जी के कारण ही उत्तर रामायण के अनुसार लव कुश राम सीता पूरा परिवार एकत्रित हो जाता है ठीक उसी तरह शनि, मंगल, राहु और सूर्य की सप्तम भाव में युति के पश्चात् भी हनुमान जी की शरण जाकर दांपत्य जीवन सामान्यतः सुखद सिद्ध हो सकता है। आइए जानते हैं कैसे। 

तलाक से मुक्ति पाने हेतु ज्योतिषीय उपाय

घर की उत्तर दिशा में हनुमान जी का वीर रूपक चित्र लगाएं।

दक्षिमुखी हनुमान मंदिर से प्राप्त सिंदूर जीवनसाथी के चित्र पर लगाएं।

राहू के कारण तलाक की स्थिति में सात शनिवार शाम के समय दक्षिणमुखी हनुमान मंदिर में 7 नारियल चढ़ाएं।

राहू के कारण तलाक की स्थिति में सात शनिवार शाम के समय दक्षिणमुखी हनुमान जी की उल्टी सात परिक्रमा लगाएं।

शनि के कारण तलाक की स्थिति में सात शनिवार हनुमान जी के चित्र पर गुड़ का भोग लगाकर काली गाय को खिलाएं।

सूर्य के कारण तलाक की स्थिति में सात रविवार दिन के समय पूर्वमुखी हनुमान मंदिर में 7 कंधारी अनार चढ़ाकर किसी नव दंपति को भेंट करें।

मंगल के कारण तलाक की स्थिति में सात मंगलवार तांबे के लोटे में गेहूं भरकर उस पर लाल चन्दन लगाकर लोटे समेत हनुमान मंदिर में चढ़ाएं।

तलाक टालने हेतु सात मंगलवार 7 लौंग, 7 नींबू, 7 सुपारी, 7 जायफल, 7 मेलफल, 7 सीताफल 7 तांबे के त्रिकोण टुकड़े लाल कपड़े मेंं बांधकर हनुमान मंदिर में चढ़ाएं।

सूर्य के कारण तलाक की स्थिति में सात रविवार दिन के समय पूर्वमुखी हनुमान मंदिर में गुड़ की रोटी व टमाटर के साग का भोग लगाकर किसी वृद्ध दंपति को खिलाएं।

शनि के कारण तलाक की स्थिति में सात शनिवार 7 जैतून, 7 अमरूद, 7 काले जामुन, 7 बेर, 7 बादाम, 7 नारियल, 7 काले द्राक्ष काले कपड़े में बांधकर हनुमान मंदिर में चढ़ाएं।

तलाक की स्थिति को शत प्रतिशत समाप्त करने के लिए एक-एक दाना 12मुखी + 11मुखी + 10मुखी + गौरीशंकर + 8मुखी +7मुखी + 6मुखी रुद्राक्ष प्राण प्रतिष्ठित करवाकर पहनें।

तलाक – ज्योतिषीय कारण

कुंडली में ऎसे कौन से योग हैं जिनके आधार पर व्यक्ति का तलाक हो जाता है या किन्हीं कारणो से पति-पत्नी एक-दूसरे से अलग रहना आरंभ कर देते हैं.

जन्म कुंडली में लग्नेश व चंद्रमा से सप्तम भाव के स्वामी ग्रह शुक्र ग्रह की स्थिति से प्रतिकूल स्थिति में स्थित हों.


कुंडली में चतुर्थ भाव का स्वामी छठे भाव में स्थित हो या छठे भाव का स्वामी चतुर्थ भाव में हो तब यह अदालती तलाक दर्शाता है अर्थात पति-पत्नी का तलाक कोर्ट केस क माध्यम से होगा.

बारहवें भाव के स्वामी की चतुर्थ भाव के स्वामी से युति हो रही हो और चतुर्थेश कुंडली के छठे, आठवें या बारहवें भाव में स्थित हो तब पति-पत्नी का अलगाव हो जाता है.

अलगाव देने वाले ग्रह शनि, सूर्य तथा राहु का सातवें भाव, सप्तमेश और शुक्र पर प्रभाव पड़ रहा हो या सातवें व आठवें भावों पर एक साथ प्रभाव पड़ रहा हो.

जन्म कुंडली में सप्तमेश की युति द्वादशेश के साथ सातवें भाव या बारहवें भाव में हो रही हो.

सप्तमेश व द्वादशेश का आपस में राशि परिवर्तन हो रहा हो और इनमें से किसी की भी राहु के साथ युती हो रही हो.

सप्तमेश व द्वादशेश जन्म कुंडली के दशम भाव में राहु/केतु के साथ स्थित हों.

जन्म लग्न में मंगल या शनि की राशि हो और उसमें शुक्र लग्न में ही स्थित हो, सातवें भाव में सूर्य, शनि या राहु स्थित हो तब भी अलगाव की संभावना बनती है.

जन्म कुंडली में शनि या शुक्र के साथ राहु लग्न में स्थित हो. 

जन्म कुंडली में सूर्य, राहु, शनि व द्वादशेश चतुर्थ भाव में स्थित हो.

जन्म कुंडली में शुक्र आर्द्रा, मूल, कृत्तिका या ज्येष्ठा नक्षत्र में स्थित हो तब भी दांपत्य जीवन में अलगाव के योग बनते हैं.

कुंडली के लग्न या सातवें भाव में राहु व शनि स्थित हो और चतुर्थ भाव अत्यधिक पीड़ित हो या अशुभ प्रभाव में हो तब तब भी अलग होने के योग बनते हैं.

शुक्र से छठे, आठवें या बारहवें भाव में पापी ग्रह स्थित हों और कुंडली का चतुर्थ भाव पीड़ित अवस्था में हो.

षष्ठेश एक अलगाववादी ग्रह हो और वह दूसरे, चतुर्थ, सप्तम व बारहवें भाव में स्थित हो तब भी अलगाव होने की संभावना बनती है.

जन्म कुंडली में लग्नेश व सप्तमेश षडाष्टक अथवा द्विद्वार्दश स्थितियों में हों तब पति-पत्नी के अलग होने की संभावना बनती है.

लंबे समय तक चलने वाले मुकदमे | 

कई बार पति-पत्नी की आपसी रजामंदी से तलाक जल्दी हो जाता है तो कई बार दोनो अपनी ही किसी जिद को लेकर अड़ जाते हैं और कोर्ट में वर्षो तक मुकदमा चलता ही रहता है. आइए लंबे समय तक चलने वाले मुकदमों के बारे में जानें.

यदि जन्म कुंडली में षष्ठेश वक्री अवस्था में स्थित है तब तलाक के लिए मुकदमा बहुत लम्बे समय तक चलता है.

यदि जन्म कुंडली में अष्टमेश की छठे भाव पर दृष्टि हो तब मुकदमा बहुत लम्बे समय तक चलता है.

यदि वक्री ग्रह की आठवें भाव पर दृष्टि हो, विशेषकर शुक्र की तब भी कोर्ट केस बहुत लंबे समय तक चलते हैं.

घर में रखें शंख जानिये आश्चर्यजनक लाभ



पूजा-पाठ में शंख बजाने का चलन युगों-युगों से है। देश के कई भागों में लोग शंख को पूजाघर में रखते हैं और इसे नियमित रूप से बजाते हैं। ऐसे में यह उत्सुकता एकदम स्वाभाविक है कि शंख केवल पूजा-अर्चना में ही उपयोगी है या इसका सीधे तौर पर कुछ लाभ भी है!!


ऐसी मान्यता है कि शंख की पूजा से मनोकामनाएं पूरी होती हैं. शंख बजाने से दुष्ट आत्माएं पास नहीं फटकती हैं. शंख को देवी लक्ष्मी (Goddess Lakshmi) की मूर्ति या तस्वीर के पास शंख रखने से घर में सुख, समृद्धि और वैभव आता है. वैज्ञानिकों के अनुसार शंख की आवाज से वातावरण में मौजूद कई तरह के जीवाणुओं-कीटाणुओं का नाश होता है.

सनातन धर्म की कई ऐसी बातें हैं, जो न केवल आध्यात्मिक रूप से, बल्कि कई दूसरे तरह से भी लाभदायक हैं। शंख रखने, बजाने व इसके जल का उचित इस्तेमाल करने से कई तरह के लाभ होते हैं। कई फायदे तो सीधे तौर पर सेहत से जुड़े हैं।


पूजा में शंख बजाने और इसके इस्तेमाल से क्या-क्या फायदे होते हैं।


1. ऐसी मान्यता है कि जिस घर में शंख होता है, वहां लक्ष्मी का वास होता है। धार्मिक ग्रंथों में शंख को लक्ष्मी का भाई
बताया गया है, क्योंकि लक्ष्मी की तरह शंख भी सागर से ही उत्पन्न हुआ है. शंख की गिनती समुद्र मंथन से निकले चौदह रत्नों में होती है।

2. शंख को इसलिए भी शुभ माना गया है, क्योंकि माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु, दोनों ही अपने हाथों में इसे धारण करते हैं।

3. पूजा-पाठ में शंख बजाने से वातावरण पवित्र होता है। जहां तक इसकी आवाज जाती है, इसे सुनकर लोगों के मन में सकारात्मक विचार पैदा होते हैं। अच्छे विचारों का फल भी स्वाभाविक रूप से बेहतर ही होता है।

4. शंख के जल से विष्णु लक्ष्मी आदि का अभि‍षेक करने से ईश्वर प्रसन्न होते हैं और उनकी कृपा प्राप्त होती है।

‍5. ब्रह्मवैवर्त पुराण में कहा गया है कि शंख में जल रखने और इसे छिड़कने से वातावरण शुद्ध होता है।

6. शंख की आवाज लोगों को पूजा-अर्चना के लिए प्रेरित करती है। ऐसी मान्यता है कि शंख की पूजा से कामनाएं पूरी होती हैं. इससे दुष्ट आत्माएं पास नहीं फटकती हैं।

7. वैज्ञानिकों का मानना है कि शंख की आवाज से वातावरण में मौजूद कई तरह के जीवाणुओं-कीटाणुओं का नाश हो जाता है. कई टेस्ट से इस तरह के नतीजे मिले हैं।

8. आयुर्वेद के मुताबिक, शंखोदक के भस्म के उपयोग से पेट की बीमारियां, पथरी, पीलिया आदि कई तरह की बीमारियां दूर होती हैं। हालांकि इसका उपयोग एक्सपर्ट वैद्य की सलाह से ही किया जाना चाहिए।

9. शंख बजाने से फेफड़े का व्यायाम होता है। पुराणों के जिक्र मिलता है कि अगर श्वास का रोगी नियमि‍त तौर पर शंख बजाए, तो वह बीमारी से मुक्त हो सकता है।

10. शंख में रखे पानी का सेवन करने से हड्डियां मजबूत होती हैं। यह दांतों के लिए भी लाभदायक है। शंख में कैल्श‍ियम, फास्फोरस व गंधक के गुण होने की वजह से यह फायदेमंद है।

11. वास्तुशास्त्र के मुताबिक भी शंख में ऐसे कई गुण होते हैं, जिससे घर में पॉजिटिव एनर्जी आती है। शंख की आवाज से 'सोई हुई भूमि' जाग्रत होकर शुभ फल देती है.॥


ग्रहों को मजबूत करें भोजन में लें यह आहार

 


आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि आप ग्रह-नक्षत्रों के अशुभ फल को कुछ खाकर शुभ फल में बदल सकते हैं। क्या सचमुच ऐसा हो सकता है? कहते हैं कि जैसा खाओगे अन्न, वैसा बनेगा मन। जैसा बनेगा मन, वैसा होगा आपका वर्तमान और भविष्य। अन्न ही जहर है और अन्न ही अमृत है।

ग्रह और नक्षत्रों का प्रभाव हमारे जीवन में सबसे पहले हमारे शरीर और फिर मन पर ही पड़ता है। शरीर में ग्रहों से संबंधित सभी तत्व मौजूद रहते हैं। ये ग्रह और नक्षत्र उन्हीं तत्वों को प्रभावित करते हैं। जैसे धरती पर स्थित जल को चन्द्रमा प्रभावित करता है उसी तरह वह शरीर में मौजूद जल को भी प्रभावित कर हमारे मन को चंचल या स्थित बनाता है। इसी तरह सभी ग्रह अपने-अपने तत्वों पर अच्छे या बुरे प्रभाव को डालते हैं। 

सूर्य :- सूर्य अगर मजबूत हो तो हमें मान-सम्मान, सुख-समृद्धि मिलती है, पिता का संग और सहयोग मिलता है। अगर सूर्य कमजोर हो तो मुंह में थूक ज्यादा बनेगा, होठों के किनारों पर थूक इकट्ठा हो जाता हैं। पिता से नहीं बनेगी, सरकार से या सरकारी नौकरी में सस्पेंड होना या झूठे आरोप लगना, मान सम्मान को ठेस पहुंचना आदि परेशानी रहेगी।

सूर्य को बल देने के लिए चोकर वाले आटे की रोटी खाएं, फल अधिक खाएं निहार मुंह गुड़ खाकर ऊपर से पानी पीयें, ग्वारपाठा का सेवन करें रोजाना व्यायाम करें सूर्य को जल दें।

चन्द्र:- माँ से दूरी बन जाये, जातक वहमी हो जाये, हाथ-पैर शिथिल पड़ जाएँ, चेहरे पर दाग-धब्बे पड़ जाएँ, मन में उमंग खुशी न रहे तो समझें चंद्रमा खराब है।

चंद्रमा को ठीक करने के लिए दूध में हरी इलायची डालकर पियें, खीर खाएं, केवडा डालकर और चांदी के गिलास में पनीर और दूध पियें लीची, पनीर, नारियल खाये और मखाने की खीर खाने से चन्द्र मजबूत होता है। जंक फूड खाने से बचें क्योंकि इससे राहू एक्टिव हो जाता है।

मंगल :- जल्दी थकना, भाई-बहन से झगड़ा हो या दूरी बन जाये, चोट ज्यादा लगे हड्डियों का टूटना शरीर में खून की कमी हो जाये और शरीर में ऊर्जा की कमी रहें, तो समझ लें मंगल खराब हैं पपीता, चुकंदर खाने से मंगल मजबूत होता है. गुड़ डालकर मीठी लस्सी पियें, मंगल मजबूत होगा। लौकी, तौरी की सब्जी खाएं।

बुध :- बुध कमजोर होगा तो दांत खराब होंगे, जातक अपने विचारों को अभिव्यक्त नहीं कर पायेगा, स्किन (त्वचा) के रोग हो जाते हैं, बुद्धि खराब हो जाती है, मेमोरी कम हो जायें। इसके लिए हरी मिर्च, आंवला, हरी सब्जियों का खूब सेवन करें तांबे के बर्तन में रखा हुआ जल पियें।

गुरु:- गुरु खराब हो तो जातक मोटा होता चला जाता है, आपसी रिश्ते बिगड़ जाते है लीवर खराब हो जाता है अस्थमां सांस की बीमारी हो जाती है। इसके लिए अनार और पपीता, गन्ना खायें, गुड खाएं। सूर्य अगर सम्मान देता है तो गुरु उस सम्मान को बनाये रखता है, इसलिए गुरु को मजबूत रखें सांस की बीमारी हो तो रात को दूध में दो चुटकी हल्दी डालकर पिये. केला के सेवन से भी गुरु मजबूत होता है।

शुक्र :- शुक्र खराब हो तो तन, मन, धन सब पर ग्रहण लग जाता है धन, वैभव, ऐश्वर्य सभी कुछ शुक्र अच्छा हो, तो ही मिलता है अतः शुक्र को बली रखने के लिए साबूदाने की खीर खाएं, पनीर खाएं, छेना तथा छेने की बनी मिठाइयां खायें, दूध पछाड़कर उस पानी को पीने से भी शुक्र मजबूत होता है।

शनि :- व्यावहारिक जीवन में कुछ पाना है तो शनि मजबूत होना चाहिए उड़द, राजमा, खाये चावल आदि में (लौंग) डालकर खाएं, राई का पानी पियें,  शनि मजबूत होगा।

राहु/केतु :- राहु शनि के समान है और केतु मंगल के समान, अतः शनि और मंगल की चीजें खानी चाहिए।

पति पत्नी में होगा जबरदस्त प्रेम जब कुंडली में होंगे ये योग

 


पति-पत्नी के बीच नोक-झोंक होना आम बात है लेकिन कभी-कभी ये नोक-झोंक झगड़े का रूप ले लेती है और मनमुटाव की स्थिति बन जाती है। कुछ मामलों में तो पति-पत्नी के बीच अलगाव भी हो जाता है। वहीं कुछ जोड़े ऐसे भी होते हैं, जिनके बीच प्यार हमेशा बना रहता है। ज्योतिषीय दृष्टि से देखा जाए तो वर-वधू की कुंडली में ग्रहों की कुछ ऐसे स्थितियां होती हैं जो वैवाहिक जीवन में हमेशा सुख-शांति बनाए रखने में मदद करती हैं। आज हम आपको ग्रहों की ऐसी ही स्थितियों के बारे में बताएंगे जिनसे पति-पत्नी के बीच प्यार बेशुमार बना रहता है।

लग्न में बुध और शुक्र की युति होती है शुभ

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यदि किसी महिला की कुंडली में बुध-शुक्र की युति लग्न भाव यानी कुंडली के पहले घर में हो तो उनका पति उन्हें तहे दिल से प्यार करने वाला होता है। इसके साथ ही दांपत्य जीवन में टकराव की स्थिति भी कम ही बनती है और पति-पत्नि एक दूसरे को समझने वाले होते हैं। इसके साथ ही दोनों के बीच रोमांस की भी अधिकता देखने को मिलती है।

सप्तम भाव

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अगर पति-पत्नी की कुंडली के सप्तम भाव में कोई शुभ ग्रह जैसे शुक्र, बुध, गुरु या चंद्रमा विराजमान हो तो भी वैवाहिक जीवन सुखद बना रहता है। ऐसे जातक अपने वैवाहिक जीवन में चल रहे विवाद को कभी किसी से साझा नहीं करते और आपस में मिलकर वैवाहिक जीवन को सुखद बनाए रखने की कोशिश करते हैं। संतान पक्ष से भी ऐसे लोगों को संतुष्टि मिलती है। ऐसे लोग उच्च शिक्षित, विवेकी होते हैं और अपने पार्टनर की हमेशा इज्जत करते हैं।

लग्न और सप्तम भाव में हों शुभ ग्रह

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यदि किसी जातक की कुंडली के लग्न और सप्तम दोनों भावों में शुभ ग्रह विराजमान हैं तो वैवाहिक जीवन बहुत आनंनदायक होता है। बल्कि ऐसे लोगों को अक्सर शादी के बाद जीवन में सफलता मिलती है। ऐसे लोगों का पार्टनर अच्छे परिवार से ताल्लुक रखता है और शादी के बाद हमेशा अपने जीवनसाथी को खुश रखता है। ऐसे लोगों के दांपत्य जीवन को लोगों को जलन भी हो सकती है।

सप्तम भाव पर शुभ ग्रहों की दृष्टि

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गुरु, शुक्र, बुध और चंद्रमा में से एक या एक से अधिक शुभ ग्रहों की दृष्टि सप्तम भाव पर हो तो ऐसे लोगों को योग्य पार्टनर मिलता है। हालांकि बुध यदि किसी पाप ग्रह जैसे राहु, केतु, शनि, मंगल के साथ युत होकर सप्तम भाव को देख रहा हो तो सामान्य फल प्राप्त होते हैं। लेकिन यदि शुभ ग्रह यदि बिना किसी अशुभ प्रभाव के सप्तम भाव को देखते हैं तो ऐसे लोगों को वैवाहिक जीवन की गाड़ी को आगे बढ़ाने में कोई परेशानी नहीं होती।

यदि आपकी कुंडली में भी ग्रहों की ऐसी स्थिति है तो समझ जाइए आपको भी वैवाहिक जीवन में सुखद परिणाम प्राप्त होंगे। और यदि आपकी शादी नहीं हुई है तो आपको शादी कर लेनी चाहिए।

महंगे रत्न नहीं, पेड़-पौधों की जड़े करेंगी चमत्कार


ग्रह के अनुसार भी पौधे रोपे जा सकते हैं। इसमें सूर्य ग्रह का अर्क, चंद्रमा को पलाश, मंगल का खैर, बुध का अपमार्ग, गुरु का पीपल, शुक्र का सफेद चंदन या गूलर, शनि का शमी, राहु का दुर्वा व केतु का कुश वृक्ष माना जाता है। इन पौधों को रोपने से ग्रह शांत होते हैं। जीवन में खुशहाली भी आती है।



सूर्य

बेलमूल की जड़ में सूर्य का वास माना गया है। मान-सम्मान, यश, कीर्ति, तरक्की की चाह रखने वालों को रविवार के दिन पिंक कपड़े में इसकी जड़ को बांधकर दाहिनी भुजा में बांधना चाहिए। सूर्य के बुरे प्रभाव नष्ट होकर शुभ प्रभाव में वृद्धि होती है। अपच, चक्कर आना, हार्ट और रीढ़ से संबंधित रोगों में इससे आराम मिलता है।

मंत्र - ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः   

चंद्र

चंद्रमा से संबंधित बुरे प्रभाव कम करने के लिए खिरनी की जड़ का प्रयोग किया जाता है। सोमवार के दिन सफेद कपड़े में हाथ में बांधने पर इसके शुभ प्रभाव मिलना प्रारंभ हो जाते हैं। चंद्रमा के बुरे प्रभाव के फलस्वरूप व्यक्ति कफ और लिवर संबंधी बीमारियों से हमेशा घिरा रहता है। मानसिक रूप से विचलित रहता है।

मंत्र - ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्रमसे नमः

मंगल

अनंतमूल की जड़ में मंगल ग्रह का वास होता है। यह जड़ मंगल के बुरे प्रभाव को कम करके, उससे संबंधित जो परेशानियां आ रही होती हैं उन्हें दूर करती है। इसे लाल रंग के कपड़े में बांधकर सीधे हाथ में बांधा जाता है। इसे पहनने का सबसे अच्छा दिन मंगलवार है। इससे त्वचा, लिवर, पाइल्स और कब्ज की समस्या दूर होती है।

मंत्र - ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः

बुध

विधारा मूल की जड़ का उपयोग बुध के बुरे प्रभाव कम करने के लिए किया जाता है। बुध के बुरे प्रभाव से व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता प्रभावित होती है और उसकी निर्णय लेने की क्षमता कम होती है। विधारा मूल की जड़ को बुधवार के दिन हरे रंग के कपड़े में बांधकर सीधे हाथ में उपर की ओर बांधा जाता है। इस जड़ को बांधने वालों को दुर्गा की आराधना करना चाहिए। इसके प्रभाव से नर्वस डिस्ऑर्डर, ब्लड प्रेशर, अल्सर और एसिडिटी में आराम मिलता है।

मंत्र - ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं सः बुधाय नमः

गुरु

यदि किसी के विवाह में बाधा आ रही हो। कार्य-व्यवसाय, नौकरी में मनचाही तरक्की नहीं मिल पा रही हो तो यह सब गुरु के दुष्प्रभाव के कारण होता है। यदि ऐसा है तो व्यक्ति को हल्दी की गांठ बांधना चाहिए। गुरुवार के दिन पीले कपड़े में हल्दी की गांठ बांधकर पास रखने से कार्यों में सफलता मिलने लगती है। इसके प्रभाव से लिवर, चिकन पॉक्स, एलर्जी और पेट संबंधी रोगों में आराम मिलता है।

मंत्र - ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः

शुक्र

शुक्र ग्रह के बुरे प्रभाव कम करने के लिए अरंडमूल की जड़ का उपयोग किया जाता है। विलासितापूर्ण जीवन की चाह रखने वालों को इसकी जड़ का उपयोग करना चाहिए। शुक्रवार के दिन सफेद कपड़े में इसकी जड़ को बांधकर दाहिनी भुजा पर बांधे। इसके प्रभाव से खांसी, अस्थमा, गले और फेफड़ों से संबंधित रोगों में आराम मिलता है।

मंत्र - ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः

शनि

यदि किसी के जीवन में लगातार दुर्घटनाएं, धन हानि और बीमारी बनी रहती है तो ऐसा व्यक्ति शनि के बुरे प्रभाव से गुजर रहा होता है। इस बुरे प्रभाव को कम करने के लिए धतूरे की जड़ बांधी जाती है। इसे पहनने से सकारात्मक उर्जा का प्रवाह बनता है और व्यक्ति के जीवन में आ रही बाधाएं दूर होती हैं। इस की जड़ को शनिवार के दिन काले कपड़े में बांधकर दाहिनी भुजा में बांधना चाहिए। मस्तिष्क संबंधी रोगों में इस जड़ से बहुत फायदा मिलता है।

मंत्र - ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः

राहु

राहु ग्रह के बुरे प्रभाव कम करने के लिए सफेद चंदन का टुकड़ा या इस पेड़ की जड़ का उपयोग किया जाता है। शनिवार या सोमवार को सफेद या भूरे रंग के कपड़े में इसे बांधकर पास रखा जाता है। महिलाओं को गर्भाशय से संबंधित रोग, त्वचा की समस्या, गैस प्रॉब्लम, दस्त और बुखार में इस जड़ का चमत्कारी प्रभाव देखा गया है। बार-बार दुर्घटनाएं होती हैं तो भी इस जड़ का प्रयोग करना चाहिए।

मंत्र - ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं सः राहवे नमः

केतु

अश्वगंधा की जड़ का प्रतिनिधि ग्रह केतु है। केतु के शुभ प्रभाव में वृद्धि करने और बुरे प्रभाव कम करने में अश्वगंधा चमत्कार की तरह काम करता है। अश्वगंधा की जड़ को नीले रंग के कपड़े में बांधकर शनिवार को सीधे हाथ में बांधा जाता है। इसके प्रभाव से स्मॉलपॉक्स, यूरीन इंफेक्शन और त्वचा संबंधी रोगों में आराम मिलता है। जीवन में चल रही मानसिक परेशानियां भी इससे कम होती हैं।

मंत्र - ॐ स्त्रां स्त्रीं स्त्रौं सः केतवे नमः

ध्यान रखने योग्य बातें

1. प्रत्येक पेड़ या पौधे की जड़ को शुभ मुहूर्त जैसे रवि पुष्य, गुरु पुष्य या अन्य शुभ मुहूर्त से एक दिन पहले रात को निमंत्रण दिया जाता है। उसके बाद अगले दिन शुभ मुहूर्त या शुभ चौघडि़या देखकर घर लाना चाहिए।

2. जड़ को कच्चे दूध और गंगाजल से धोकर पूजा स्थान में रखना चाहिए। इसके बाद उससे संबंधित ग्रह के मंत्र की एक माला जाप करें।

3. सुगंधित घूप लगाने के बाद अपनी मनोकामना पूरी करने का संकल्प लें और उसे बांध लें।

व्यापार पर ग्रहों का प्रभाव , कोन सा व्यापार करना होगा शुभ


हर व्‍यक्ति अपने करियर में सफल होना चाहता है, फिर चाहे वह नौकरी में हो या व्यापार में. हालांकि, कई बार ऐसा हो नहीं पाता है. व‍िभिन्‍न प्रकार की रुकावटों या नकारात्‍मक घटनाओं के कारण व्‍यक्ति को सफलता मिल नहीं पाती है. 

ग्रह हमारे जीवन शैली पर भी बड़ा असर डालते हैं. हर तरह का व्यापार किसी न किसी ग्रह से संबंधित होता है. यदि जातक की कुंडली में उस ग्रह की स्थिति मजबूत हो तो उसे बड़ी कामयाबियां मिलती हैं, वरना उसे नुकसान का सामना करना पड़ता है!    

  जमीन - निर्माण या ठेकेदारी का व्यवसाय

यदि आप जमीन से जुड़ा या ठेकेदारी से जुड़ा व्यवसाय करना चाहते हैं तो आपको पहले कुंडली में स्थित अपने मंगल की स्थिति देखना होगी क्योंकि इस व्यवसाय का मुख्य ग्रह मंगल है अगर आपका मंगल ही यह कमजोर होगा तो व्यवसाय डूब सकता है

शिक्षा, सलाहकारिता का व्यवसाय

बुध, बृहस्पति और शुक्र बुद्धि के कारक ग्रह होते हैं अतः इस तरह के व्यवसाय के लिए कुंडली में स्तित बुध, बृहस्पति और शुक्र की स्थिति देखना होगी पर मुख्य रूप से इस व्यवसाय के लिए बृहस्पति की स्थिति देखना चाहिए

 लोहे, कोयले या पेट्रोल का व्यवसाय

लोहे, कोयले या पेट्रोल का व्यवसाय शनि से जुड़ा होता है और कुछ हद तक मंगल से भी यह व्यवसाय जुड़ा होता है इसलिए इस तरह के कोई भी व्यवसाय करने के लिए कुंडली में शनि और मंगल की स्थिति देखना आवश्यक है.

 दशम भाव का विश्लेषण

कुंडली में व्यापार या नौकरी को दशम भाव से देखा जाता है दशम भाव के स्वामी को दशमेश या कर्मेश या कार्येश कहते हैं इस भाव से यह देखा जाता है कि व्यक्ति सरकारी नौकरी करेगा अथवा प्राइवेट? या व्यापार करेगा तो कौन सा और उसे किस क्षेत्र में अधिक सफलता मिलेगी? 

सप्तम भाव साझेदारी का होता है इसमें मित्र ग्रह हों तो पार्टनरशिप से लाभ शत्रु ग्रह हो तो पार्टनरशिप से नुकसान मित्र ग्रह सूर्य, चंद्र, बुध, गुरु होते हैं शनि, मंगल, राहु, केतु ये आपस में मित्र होते हैं सूर्य, बुध, गुरु और शनि दशम भाव के कारक ग्रह हैं

ऐसा भी कहा जाता है कि मन का स्वामी चंद्र जिस राशि में हो, उस राशि से स्वामी ग्रह की प्रकृति के आधार पर या चंद्र से उसके युति अथवा दृष्टि संबंध के आधार पर यदि कोई व्यक्ति अपनी आजीविका अथवा कार्य का चयन करता है बलवान चंद्र से दशम भाव में गुरु हो तो गजकेसरी नामक योग होता है किंतु गुरु कर्क या धनु राशि का होना चाहिए ऐसा जातक यशस्वी, परोपकारी धर्मात्मा, मेधावी, गुणवान और राजपूज्य होता है यदि जन्म लग्न, सूर्य और दशम भाव बलवान हो तथा पाप प्रभाव में न हो तो जातक शाही कार्यों से धन कमाता है और यशस्वी होता है.

कुंडली में व्यापार या नौकरी को दशम भाव से देखा जाता है दशम भाव के स्वामी को दशमेश या कर्मेश या कार्येश कहते हैं। इस भाव से यह देखा जाता है कि व्यक्ति सरकारी नौकरी करेगा अथवा प्राइवेट? या व्यापार करेगा तो कौन सा और उसे किस क्षेत्र में अधिक सफलता मिलेगी? सप्तम भाव साझेदारी का होता है इसमें मित्र ग्रह हों तो पार्टनरशिप से लाभ शत्रु ग्रह हो तो पार्टनरशिप से नुकसान। मित्र ग्रह सूर्य, चंद्र, बुध, गुरु होते हैं। शनि, मंगल, राहु, केतु ये आपस में मित्र होते हैं। सूर्य, बुध, गुरु और शनि दशम भाव के कारक ग्रह हैं

कैसे करें सौभाग्य को आकर्षित घोड़े की नाल से

 



आमतौर पर द्वार के ऊपर या तो गणेशजी की मूर्ति या चित्र स्थापित किया जाता है या कोई मंगल प्रतीक लगाया जाता है, परंतु कुछ लोग तंत्र-मंत्र और नज़र जैसे टोटकों से बचने के लिए काले घोड़े की नाल का भी प्रयोग करते हैं। हमारे देश में घोड़े की नाल को शुभ और सौभाग्यवर्धक माना जाता है। मान्यता है कि घोड़े की नाल को घर में स्थापित करने से जादू-टोने, नकारात्मक ऊर्जा व बुरी नजर से मुक्ति मिलती है

क्या है इसकी अहमियत?

घोड़े की नाल का आकार (यू शेप) आइडियल शेप होता है. घोड़े की नाल घर के मुख्य द्वार पर लगाने से सौभाग्य में बढ़ोतरी होती है और ऐसा कहते हैं कि जिस घर के मुख्य द्वार पर घोड़े की नाल लगी होती है, वहां बुरी शक्तियां प्रवेश नहीं कर सकतीं और ये बुरी नज़र से भी बचाता है.

कैसे करें पहचान?

घोड़े की नाल असली होनी चाहिए, जिसका इस्तेमाल घोड़े द्वारा किया गया हो. बाज़ार में बिना इस्तेमाल किए हुए नाल भी बिकते हैं, अतः नाल ख़रीदते समय यह जान लें कि घोड़े ने इसे इस्तेमाल किया है या नहीं?

कैसे लगाएं?

घोड़े की नाल को आप दो तरह से लगा सकती हैंः

* पहला यू पैटर्न में लगाया जा सकता है.

* दूसरा रिवर्स यू पैटर्न में लगाया जा सकता है.

यू पैटर्न में लगाने से लाभ

* जब घोड़े की नाल की दोनों सिराएं ऊपर की ओर होती हैं, तब उसे यू पैटर्न कहते हैं.

* इस तरह से घोड़े की नाल को लगाने से सौभाग्य की प्राप्ति होती है.

* घर एवं दुकानों में लगाने के लिए घोड़े की नाल का यू पैटर्न अत्यधिक प्रभावशाली माना जाता है.

रिवर्स यू पैटर्न में लगाने से लाभ

* यू पैटर्न को उल्टा करने पर घोड़े की नाल की दोनों सिराएं नीचे की ओर हो जाती हैं. इसे रिवर्स यू पैटर्न कहते हैं.

* घोड़े की नाल को इस तरह से लगाने से घर में नकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश नहीं होता है.

* गो डाउन या बंगले के लिए घोड़े की नाल का रिवर्स यू पैटर्न अधिक उपयुक्त है. इससे नकारात्मक ऊर्जा उल्टे पैर लौट जाती है.

* ध्यान रहे, यदि रिवर्स यू में घोड़े की नाल मेन डोर पर लगी हो, तो ऊपर की दीवार पर आईना भी अवश्य लगाएं.

कहां लगाएं इसे?

* घोड़े की नाल को मुख्य द्वार पर बाहर की ओर डोर या डोर फ्रेम के ऊपर लगाएं. इसे लगाने की यही सही विधि है.

* यह उत्तर, पश्‍चिम व उत्तर-पश्‍चिम दिशा वाले मुख्य द्वार के लिए अत्यंत लाभकारी होते हैं.

कहां न लगाएं?

यदि आपके मकान का मुख्य द्वार पूर्व या दक्षिण-पूर्व दिशा में है, तो इस दिशा में इसे न लगाएं, क्योंकि घोड़े की नाल मेटल की होती है और इस दिशा में मेटल की वस्तु लगाना अशुभ होता है

एकादशी व्रत का महत्व जाने


 हिंदू पंचांग के अनुसार हर चन्द्र पक्ष (कृष्ण और शुक्ल पक्ष) की 11वी तिथि पर एकादशी का व्रत किया जाता है. हर माह में एक कृष्ण पक्ष और एक शुक्ल पक्ष होता हैं इस प्रकार एक महीने में दो एकादशी उपवास होते हैं. भगवान विष्णु के भक्त उनका आशीर्वाद लेने के लिए एकादशी व्रत का पालन करते हैं. एकादशी का व्रत तीन दिन तक चलता है. भक्त उपवास के दिन से एक दिन पहले दोपहर में एकल भोजन लेते हैं ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि अगले दिन पेट में कोई अवशिष्ट भोजन नहीं रहे. भक्त एकादशी के पूरे दिन उपवास रखते हैं और अगले दिन सूर्योदय के बाद ही उपवास तोड़ते (या पारण) करते हैं. एकादशी व्रत के दौरान सभी प्रकार के अनाज का सेवन वर्जित है.

भक्त अपनी इच्छा और शरीर की शक्ति के अनुसार एक समय भोजन के साथ, केवल पानी के साथ, पानी के बिना उपवास चुन सकते हैं. हालांकि यह उपवास शुरू करने से पहले तय किया जाना चाहिए. हालांकि उपवास करने में असमर्थ लोग तरल पदार्थ ले सकते हैं, या यदि जरूरत हो तो फलहारी खाद्य पदार्थ भी ग्रहण कर सकते हैं. एकादशी या व्रत के फलस्वरूप एकादशी के दिन व्रत का पालन करते हुए उस रात को जागरण भी करते हैं और साथ ही भगवान विष्णु की पूजा भी करते हैं.


एकादशी पर ध्यान रखने योग्य बातें

एकादशी व्रत का एक मुख्य पर्व हैं इसीलिए इस दिन नीचे दी गयी निम्न चीज़े अवश्य करनी चाहिए.

एकादशी के दिन अपनी श्रद्धा के अनुरूप दान अवश्य करना चाहिए.

इस दिन आपने व्रत रखा हो या नहीं लेकिन किसी और के द्वारा दिया गया भोजन ग्रहण ना करे.

इस दिन दूध से बनी चीज़े, फल, फलाहारी पदार्थ, बादाम या पिस्ता का सेवन भगवान को भोग लगाकर करना चाहिए.

भोग लगाते समय भोग में तुलसी का पत्ता अवश्य रखे.

एकादशी के अगले दिन यानि द्वादशी पर ब्राह्मण भोज करवा के दान दक्षिणा करना चाहिए.

महत्व:

इस व्रत को रखने की एक मान्यता यह भी है कि इससे पूर्वज या पितरों को स्वर्ग की प्राप्ति होती है। स्कन्द पुराण में भी एकादशी व्रत के महत्व के बारे में बताया गया है। जो भी व्यक्ति इस व्रत को रखता है उनके लिए एकादशी के दिन गेहूं, मसाले और सब्जियां आदि का सेवन वर्जित होता है।

इस एकादशी व्रत के करने के 26 फायदे हैं- व्यक्ति निरोगी रहता है, राक्षस, भूत-पिशाच आदि योनि से छुटकारा मिलता है, पापों का नाश होता है, संकटों से मुक्ति मिलती है, सर्वकार्य सिद्ध होते हैं, सौभाग्य प्राप्त होता है, मोक्ष मिलता है, विवाह बाधा समाप्त होती है, धन और समृद्धि आती है, शांति मिलती है

एकादशी व्रत के लाभ


एकादशी व्रत के पुण्य के समान और कोई पुण्य नहीं है ।

जो पुण्य सूर्यग्रहण में दान से होता है, उससे कई गुना अधिक पुण्य एकादशी के व्रत से होता है ।

जो पुण्य गौ-दान सुवर्ण-दान, अश्वमेघ यज्ञ से होता है, उससे अधिक पुण्य एकादशी के व्रत से होता है ।

एकादशी करनेवालों के पितर नीच योनि से मुक्त होते हैं और अपने परिवारवालों पर प्रसन्नता बरसाते हैं ।

एकादशी व्रत करने वालों के घर में सुख-शांति बनी रहती है ।

धन-धान्य, पुत्रादि की वृद्धि होती है ।

कीर्ति बढ़ती है, श्रद्धा-भक्ति बढ़ती है, जिससे जीवन रसमय बनता है ।

परमात्मा की प्रसन्नता प्राप्त होती है ।



12 राशियों को जानें

 


आकाश मंडल में 360 अंश हैं, इन्हें 12 राशियों एवं 27 नक्षत्रों में बांटा गया है। एक राशि में 30 अंश हैं। प्रत्येक भाग अपने-आप में एक आकृति बनाता है। इसी आकृति के आधार पर प्रत्येक राशि का नाम रखा गया है। नाम के अनुरूप सभी राशियों का अपना अलग-अलग महत्व होता है।

 मेष- इसका राशि स्वामी मंगल है तथा यह राशि पूर्व दिशा की स्वामिनी है। यह राशि पुरुष-जाति, लाल-पीले वर्ग, वर्ण कांतिहीन, क्षत्रिय वर्ण, अग्नि तत्व वाली, चर संज्ञक समान अंगों वाली, अल्प सन्ततिवान तथा पित्त प्रकृति कारक है। इसका स्वभाव अहंकारी, साहसी तथा मित्रों के प्रति दयालुता का है। इसके द्वारा मस्तक का विचार किया जाता है।

 वृषभ- इसका राशि स्वामी शुक्र है तथा यह दक्षिण दिशा की स्वामिनी है। यह राशि स्त्री जाति, श्वेत वर्ण, कान्तिहीन, वैश्य वर्ण, भूमि तत्व वाली, स्थिर संज्ञक, शिथिल शरीर, शुभकारक तथा महाशब्दकारी है। इसका स्वभाव स्वार्थी, सांसारिक कार्यों में दक्षता तथा बुद्धिमत्ता से काम लेने का है। इसे अर्द्धजलराशि भी कहा जाता है। इसके द्वारा मुंह और कपोलों का विचार किया जाता है।

मिथुन- इसका राशि स्वामी बुध है। यह पश्चिम दिशा की स्वामिनी है। यह राशि पुरुष जाति, हरित वर्ण, चिकनी, शूद्र वर्ण, पश्चिम वायु तत्व वाली, ऊष्ण, महाशब्दकारी, मध्यम संतति वाली, शिथिल तथा विषमोदयी है। इसका स्वभाव शिल्पी तथा विद्याध्ययनी है। इसके द्वारा शरीर के कंधों तथा बाजुओं का विचार किया जाता है।

 कर्क- इसका राशि स्वामी चंद्रमा है। यह उत्तर दिशा की स्वामिनी है। यह राशि स्त्री जाति, रक्त धवल मिश्रित वर्ण, जलचारी, सौम्य तथा कफ प्रकृति वाली, बहुसंतान एवं चरण रात्रिबली तथा समोदयी है। इसका स्वभाव लज्जा, सांसारिक उन्नति के लिए प्रयत्नशील रहना तथा समय के अनुसार चलना है। इसके द्वारा वक्षस्थल एवं गुर्दे पर विचार किया जाता है।

सिंह- इसका राशि स्वामी सूर्य है। यह पूर्व दिशा की स्वामिनी है। यह राशि पुरुष जाति, पीत वर्ण, क्षत्रिय वर्ण, पित्त प्रकृति, अग्नि तत्व वाली, ऊष्ण स्वभाव, पुष्ट शरीर, यात्राप्रिय, अल्प सन्तानविद् तथा निर्जल है। इसका स्वभाव मेष राशि के समान है, परंतु इसमें उदारता एवं स्वातन्त्र्यप्रियता अधिक पाई जाती है। इसके द्वारा हृदय का विचार किया जाता है।

कन्या- इसका राशि स्वामी बुध है। यह दक्षिण दिशा की स्वामिनी है। यह राशि स्त्री जाति, पिंगल वर्ण, द्विस्वभाव, वायु तथा शीत प्रकृति, पृथ्वी तत्व वाली, रात्रिबली तथा अल्प सन्तति वाली है। इसका स्वभाव मिथुन राशि जैसा है, परंतु यह अपनी उन्नति तथा सम्मान पर विशेष रूप से ध्यान देती है। इसके द्वारा पेट का विचार किया जाता है।

तुला- इसका राशि स्वामी शुक्र है। यह पश्चिम दिशा की स्वामिनी है। यह राशि पुरुष जाति, श्याम वर्ण, चर संज्ञक, शूद्र वर्ण, वायु तत्व वाली, दिनबलि, क्रूर स्वभाव, शीर्षोदयी, अल्प सन्ततिवान तथा पादजल राशि है। इसका स्वभाव ज्ञान-प्रिय, राजनीतिज्ञ, विचारशील एवं कार्य सम्पादक है। इसके द्वारा नाभि से नीचे के अंगों का विचार किया जाता है।

वृश्चिक- इसका राशि स्वामी मंगल है। यह उत्तर दिशा की स्वामिनी है। यह राशि स्त्री जाति, शुभ वर्ण, कफ प्रकृति, ब्राह्मण वर्ण, उत्तर दिशा की स्वामिनी, रात्रिबली, बहु सन्ततिवान तथा अर्द्धजल तत्व वाली है। इसका स्वभाव स्पष्टवादी, निर्मल, दृढ़ प्रतिज्ञ, हठी तथा दम्भी है। इसके द्वारा जननेन्द्रिय का विचार किया जाता है।

धनु- इसका राशि स्वामी गुरु है। यह पूर्व दिशा की स्वामिनी है। यह राशि पुरुष जाति, स्वर्ण वर्ण, द्विस्वभाव, क्षत्रिय वर्ण, दिनबली, पित्त प्रकृति, अग्नि तत्व वाली, अल्प सन्ततिवान, दृढ़ शरीर तथा अर्द्धजल तत्व वाली राशि है। इसका स्वभाव करुणामय, मर्यादाशील तथा अधिकारप्रिय है। इसके द्वारा पाँवों की संधि तथा जंघाओं पर विचार किया जाता है।

 मकर- इसका राशि स्वामी शनि है। यह दक्षिण दिशा की स्वामिनी है। यह राशि स्त्री जाति, पिंगल वर्ण, रात्रिबली, वैश्य वर्ण, पृथ्वी तत्व वाली, शिथिल शरीर तथा वात प्रकृति वाली है। इसका स्वभाव उच्च स्थिति का अभिलाषी है। इसके द्वारा पाँव के घुटनों का विचार किया जाता है।

कुंभ- इसका राशि स्वामी शनि है। यह पश्चिम दिशा की स्वामिनी है। यह राशि पुरुष जाति, विचित्र वर्ण, वायु तत्व वाली, शूद्र वर्ण, त्रिदोष प्रकृति वाली, ऊष्ण स्वभाव, अर्द्धजल, मध्यम संतान वाली, शीर्षोदय, क्रूर तथा दिनबली है। इसका स्वभाव शांत, विचारशील, धार्मिक तथा नवीन वस्तुओं का आविष्कारकर्ता है। इसके द्वारा पेट के भीतरी भागों का विचार किया जाता है।

मीन- इसका राशि स्वामी गुरु है। यह उत्तर दिशा की स्वामिनी है। यह राशि स्त्री जाति, पिंगल वर्ण, जल तत्व वाली, ब्राह्मण वर्ण, कफ प्रकृति तथा रात्रिबली है। यह पूर्ण रूप से जल राशि है। इसका स्वभाव दयालु, दानी तथा श्रेष्ठ है। इसके द्वारा पैरों का विचार किया जाता है।


क्या दर्शाते हैं 12 राशियों के 12 प्रतीक चिह्न

प्रतीक चिह्नों का ज्योतिष से सीधा संबंध है। जातक के जन्म के अवसर पर गोचर चंद्र जिस राशि पर होता है, जातक की वही जन्म राशि मानी जाती है।

चंद्र मन का घातक होने से यह माना जाता है कि उसी राशि के अनुरूप मानव का स्वभाव मोटे तौर पर रहता है। प्रत्येक राशि का एक प्रतीक चिह्न निर्धारित है

मेष राशि का 'मेड़ा' जातक स्वभाव से अड़ियल तथा उत्साही मगर धुनी होता है।

वृषभ राशि का चिह्न 'बैल' जातक परिश्रमी होते हैं, कार्य में सतत लगे रहना इनका स्वभाव होता है।

मि‍थुन- कल्पनाशील तथा बुद्धिमान होते हैं।

कर्क- इस राशि के व्यक्ति का केकड़े की भांति स्वभाव होता है। अवसरों को ये चारों तरफ से लपकते हैं।

सिंह- प्रतीक चिह्न शेर का मुख जातक गर्म स्वभाव के कुछ आलसी एवं राजसी प्रकृति के होते हैं।

कन्या- इसके जातक प्रतीक चिह्न 'कन्या अनुसार' कलात्मक रूपी तथा शांत प्रकृति के होते हैं।

तुला राशि- प्रतीक चिह्न 'तराजू' जातक स्‍थि‍र वृत्ति के प्रेमी होते हैं, अत्यंत व्यावहारिक वृत्ति के होते हैं।

वृश्चिक राशि- 'बिच्छू' जातक गर्म स्वभाव के होते हैं तथा न्यायप्रिय रहते हैं।

धनु राशि प्रतीक चिह्न 'धनुष-तीर' स्वभाव के गंभीर तथा न्यायप्रिय वृत्ति के दृढ़ निश्चयी होते हैं।

मकर राशि प्रतीक चिह्न 'मगर' जातक अत्यंत चालाक, परिस्थिति के अनुरूप व्यवहार करने वाले तथा चौकन्ने रहते हैं।

कुंभ के जातक स्थिर वृत्ति के व्यावहारिक होते हैं।

मीन राशि प्रतीक चिह्न 'मछली' जातक कलात्मक वृत्ति के, सात्विक बुद्धि वाले तथा वैभव तथा वैभवप्रिय होते हैं।

जाने कोन सा ग्रह कोन सी बीमारी देगा

 


हम सभी जानते हैं कि हमारे सौरमंडल में 9 ग्रह होते हैं और ज्योतिष के अनुसार इन 9 ग्रहों का हमारे जीवन में किसी न किसी रूप में प्रभाव देखने को मिलता है. यह ग्रह न केवल इंसानों पर बल्कि पृथ्वी पर पाई जाने वाली विभिन्न प्रकार की प्रजाति, खनिज, और पेड़-पौधों पर भी प्रभाव डालते हैं. सौरमंडल में मौजूद प्रत्येक ग्रह मनुष्यों के शरीर के किसी न किसी अंग को   प्रभावित करते है.


1-गुस्सा ज्यादा, जब किसी की कुंडली में सूर्य घर 1 में हो,सूर्य मंगल एक साथ हों,सूर्य शनि एक साथ या सूर्य शनि मंगल एक साथ हों तो ऐसे व्यक्ति को ज्यादा गुस्सा और जल्दी ही गुस्सा आ जाता है।

            


2- बुध मंगल एक साथ हों तो ऐसे व्यक्ति को खून से सम्बंधित परेशानी से गुजरना होता है साथ ही जब मंगल के कारण से बुध ज्यादा खराब हो जाये तो BP की परेशानी साथ ही मंगल बुध दोनों ज्यादा बुरे हाल तो पागल पन की बीमारी हो जाती है। और गैस एसिडिटी कब्ज की भी शिकायत रहती है। इस योग के कारण लिवर से सम्बंधित बीमारी भी हो जाती हैं।


3- मंगल शनि का योग भी गैस की परेशानी देता है।


4- शनि देव घर 1 में हों तो भी गैस की प्रॉब्लम देते हैं।


5- सूर्य शुक्र एक साथ हों तो शरीर में जोश की कमी हो जाती है। ऐसे व्यक्ति में सेक्स की छमता कमजोर हो जाती है। जीवन साथी के शरीर में भी अंदरूनी बीमारी हो जाती है।


6- राहू शुक्र के मिलने से व्यक्ति को नपुंष्कता अनुभव होती है। किउंकि ऐसा व्यक्ति कम उम्र में ही अपने वीर्य हो नष्ट कर लेता है। वीर्य से सम्बंधित बीमारी जैसे स्पर्म की कमी आदि, इसके अतिरिक्त शरीर में कैलशियम की कमी हो जाती है।


7- बुध और गुरु देव व्रहष्पति मिलते हों तो अस्थमा साइनस की बीमारी हो जाती है। इये दोनों जिस घर में बैठे हों उस घर से सम्बंधित बीमारी भी देते हैं। जैसे दोनों घर 7,12 में बैठ जाएँ तो नपुंष्क तक बना देते हैं।


8- सूर्य बुध राहू मिलते हों तो आथरायटिश की बीमारी देते हैं।


9- सूर्य नीच का या शनि राहू के साथ सम्बन्ध बना ले और गुरु बुध या गुरु राहू का योग हो जाये तो पीलिया जैसी गन्दी बीमारी जीवन में कई बार होती है।


10- जिस व्यक्ति की कुंडली में केतु देव नीच के होंगे उसके कमर पाँवो जोड़ों में दर्द की शिकायत बनी रहेगी। साथ ही उसे पेशाब और किडनी के परेशानी भी देते हैं।


11-बुध गुरु,राहू गुरु दिमाग को सही डारेक्सन नहीं मिलने देते। अजीब अजीब सी भ्रांतियां होती हैं।


12- मंगल बुध एक साथ और सूर्य शनि भी मिल रहे हों तो कैंसर जैसी बुरी बीमारी बन जाती है। 


13- राहू गुरु मिलते हों तो अस्थमा t b(तपेदिक) फेफड़ों से सम्बंधित और साँस की तकलीफ देते हैं।


14- चन्द्र देव जब शुक्र देव के साथ मिलते हो तो आँखों और चमड़ी से सम्बंधित बीमारी जैसे सफेद दाग,चमड़ी पर चककत्ते आदि हो जाते हैं।


15- चन्द्र बुध जिस जातक की कुंडली में मिलते हों बो व्यक्ति बहुत ही जिददी हो जाता है और जिद ज्यादा होने के कारण किसी की बात नहीं मानता और अपना जीवन नर्क बना लेता है।


16- सूर्य मंगल बुध या बुध मंगल मिलते हों तो ऐसे व्यक्ति को B P हाई की दिक्कत कम उम्र में शुरू हो जाती है। नशों नाड़ियों में ब्लोकेज हो जाते हैं। खून से सम्बंधित बीमारी परेशानी खड़ी रहती है।


17- केतु खराब नीच के मन्दे हों और गुरु देव भी बुरे हाल साथ ही चन्द्र देव भी नीच मन्दे हों तो नर औलाद पैदा करने की शक्ति नष्ट हो जाती है। बेशक कन्या सन्तान पैदा हो जाये।

मंगल का जातक के जीवन पर प्रभाव और उपाय

 


ज्योतिष शास्त्र के अनुसार मंगल मेष और व्रश्चिक राशियों का स्वामी है। यह मकर राशि में उच्च और कर्क राशि में नीचस्थ होता है ।


जन्म कुंडली मे मंगल के योग जीवन की दशा बदलने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते है। कुंडली में मंगल की अच्छी दशा बेहद कामयाब बनाती है. वहीं इस ग्रह की बुरी दशा इंसान से सब कुछ छीन भी सकती है. मंगल के बहुत से शुभ और अशुभ योग हैं।


जन्म कुंडली के 1,4,7,8,12 भावों में मंगल की उपस्थिति जातक को मांगलिक घोषित करती है,हालाँकि कई स्थितियां ऐसी होती हैं जिनके कारण जातक का मंगल दोष भंग होता है अथवा आंशिक मांगलिक होता है ।इसका विस्तृत विवरण कुछ समय पश्चात करेंगे।


ऐसा लिखा गया है:


लग्ने व्यये च पाताले यामित्रे चाष्टमे कुज:।

कन्या वै मृतभर्ता स्याद् भर्ता भार्या हनिष्यति।।


1, 12, 4, 7, 8 इन स्थानों में जिसके मंगल हो वह मंगली होता है, जो वर, कन्या मंगली हो और उनका विवाह हो तो शुभ है और जो वर मंगली और कन्या सादी या कन्या मंगली वर सादा हो तो अशुभ है।


यामित्रे च यदा सोरिर्लग्ने वा हिबुकेथवा

नवमे द्वादशे चैव भौम दोषो न विद्मते।।


जिसके 7, 1, 4, 9, 12 इन स्थानों में शनिश्चर हो तो मंगली का दोष उसको नहीं होता।


 (ज्योतिष सर्वसंग्रह)


मांगलिक होने, आंशिक मांगलिक होने, मांगलिक होते हुए भी मांगलिक न होने बारे बहुत अधिक अवधारणाएं बन गयी हैं। 


विभिन्न प्रदेशों में भिन्न भिन्न पैमाने हैं।


मांगलिक कन्या का अमांगलिक वर और मांगलिक वर का अमांगलिक कन्या के साथ विवाह अपने आपमें सम्पूर्ण विषय है।


कुंडली मिलान के समय सप्तम भाव के साथ धन, वाणी, कुटुम्ब भाव, सुख भाव, संतान भाव, भाग्य भाव, लाभ भाव और शयन सुख भाव देखने और दोनों कुंडलियों का इस परिप्रेक्ष्य में मिलान करना और तुलनात्मक अध्ययन अति आवश्यक है।


केवल मात्र कम्पयूटर अथवा मोबाइल में उपलब्ध कुंडली मिलान साफ्टवेयर से काम नहीं चलाना चाहिए।


मंगल पराक्रम, शौर्य, साहस, सेना, सेना पति, शत्रु, रकपात्त, जोखिम,सामर्थ्य, क्रोध, भूमि,लघु भ्राता,ऑपरेशन, पुत्र, सन्तान से सम्बंधित है।


मंगल को सातवीं दृष्टि के साथ साथ चौथी और आठवीं विशेष दृष्टि भी प्राप्त है।


मंगल कुंडली में नीचस्थ हो, अशुभ ग्रहों से द्रष्टय हो, अशुभ भाव में हो तो जातक के जीवन पर अत्यधिक दुष्प्रभाव डालता है।


 यदि मंगल का सम्बन्ध छटे भाव से हो अथवा उपस्थित हो तो बड़े से बड़ा शत्रु भी जातक के सामने टिक नहीं सकता । 


सातवें घर पर मंगल की दृष्टि या उपस्थिति वैवाहिक जीवन को उथल पुथल कर सकती है ।


मंगल शुभ ग्रहों के साथ हो, शुभ भाव में हो, शुभ ग्रहों से द्रष्टय हो तो जातक को जीवन में

असीमित ऊचांई तक ले जाता है ।


ऐसे जातक बड़े बड़े शूरवीर, योद्धा, सेनापति बनते हैं, सर्जन, इंजीनयर, होटल व्यवसायी बनते हैं और अपने व्यवसाय,  लड़ाई के मैदान में एक इतिहास बना जाते हैं। उनका सारा सीना शूरवीरता के कारण मिले तमगों से भरा होता है। 


शौर्यता, शूरवीरता, साहस, सफल उद्यमी का एक ऐसा उदाहरण जिसे वर्तमान और आने वाली पीढ़ियां अपना आदर्श मान लेती हैं। 


एक सम्मानपूर्ण, शौर्य से भरा हुआ जीवन, मान, सम्मान, आदर, प्रतिष्ठा सब कुछ मिलता है।


केवल मंगल को लेकर ही सारी कुंडली की व्याख्या नहीं हो सकती, इसके साथ साथ दूसरे ग्रह, भाव, दृष्टि, शुभ, अशुभ, महादशा, दशा, गोचर सब कुछ देखने के बाद ही कुंडली की व्याख्या हो सकती है।


इसलिए मंगल से परेशान न हों।


मंगल को मंगल रहने दें, अपने जीवन में अपने जीवन साथी के जीवन में अमंगल न बनने दें ।


मंगल के प्रमुख शुभ और अशुभ योग


मंगल का पहला अशुभ योग 


👉 किसी कुंडली में मंगल और राहु एक साथ हों तो अंगारक योग बनता है.

👉अक्सर यह योग बड़ी दुर्घटना का कारण बनता है.

👉 इसके चलते लोगों को सर्जरी और रक्त से जुड़ी गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ता है.

👉 अंगारक योग इंसान का स्वभाव बहुत क्रूर और नकारात्मक बना देता है.

👉 इस योग की वजह से परिवार के साथ रिश्ते बिगड़ने लगते हैं.


मंगल का दूसरा अशुभ योग 


अंगारक योग के बाद मंगल का दूसरा अशुभ योग है मंगल दोष. यह इंसान के व्यक्तित्व और रिश्तों को नाजुक बना देता है.

👉 कुंडली के पहले, चौथे, सातवें, आठवें और बारहवें स्थान में मंगल हो तो मंगलदोष का योग बनता है.

👉 इस योग में जन्म लेने वाले व्यक्ति को मांगलिक कहते हैं.

👉 कुंडली की यह स्थिति विवाह संबंधों के लिए बहुत संवेदनशील मानी जाती है.


मंगल का तीसरा अशुभ योग 

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नीचस्थ मंगल तीसरा सबसे अशुभ योग है. जिनकी कुंडली में यह योग बनता है, उन्हें अजीब परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है.

👉 इस योग में कर्क राशि में मंगल नीच का यानी कमजोर हो जाता है.

👉  जिनकी कुंडली में नीचस्थ मंगल योग होता है, उनमें आत्मविश्वास और साहस की कमी होती है.

👉 यह योग खून की कमी का भी कारण बनता है.

👉 कभी–कभी कर्क राशि का नीचस्थ मंगल इंसान को डॉक्टर या सर्जन भी बना देता है.


मंगल का चौथा अशुभ योग 

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मंगल का एक और अशुभ योग है जो बहुत खतरनाक है. इसे शनि मंगल (अग्नि योग) कहा जाता है. इसके कारण इंसान की जिंदगी में बड़ी और जानलेवा घटनाओं का योग बनता है.

👉  ज्योतिष में शनि को हवा और मंगल को आग माना जाता है.

👉  जिनकी कुंडली में शनि मंगल (अग्नि योग) होता है उन्हें हथियार, हवाई हादसों और बड़ी दुर्घटनाओं से सावधान रहना चाहिए.

👉  हालांकि यह योग कभी–कभी बड़ी कामयाबी भी दिलाता है.


मंगल का पहला शुभ योग 


मंगल के शुभ योग में भाग्य चमक उठता है. लक्ष्मी योग मंगल का पहला शुभ योग है.

👉  चंद्रमा और मंगल के संयोग से लक्ष्मी योग बनता है.

👉  यह योग इंसान को धनवान बनाता है.

👉  जिनकी कुंडली में लक्ष्मी योग है, उन्हें नियमित दान करना चाहिए।


मंगल का दूसरा शुभ योग 


👉 मंगल से बनने वाले पंच-महापुरुष योग को रूचक योग कहते हैं.

👉 जब मंगल मजबूत स्थिति के साथ मेष, वृश्चिक या मकर राशि में हो तो रूचक योग बनता है.

👉 यह योग इंसान को राजा, भू-स्वामी, सेनाध्यक्ष और प्रशासक जैसे बड़े पद दिलाता है.

👉  इस योग वाले व्यक्ति को कमजोर और गरीब लोगों की मदद करनी चाहिए ।


मंगल के अशुभ योगों के उपाय

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1👉 मंगल कृत अरिष्ट शांति के लिए किसी भी शुक्ल पक्ष के मंगलवार से शुरू करके लाल वस्त्र पहनकर श्री हनुमान जी की मूर्ती से सामने कुशाशन पर बैठा कर गेरू अथवा लाल चंदन का टीका लगाकर एवं घी की ज्योति जगाकर श्री हनुमानाष्टक अथवा हनुमान चालीसा का प्रतिदिन काम से कम 21 संख्या में पाठ करे।ऐसा नियमित 41 दिन तक करने पर कठिन से कठिन कार्य की सिद्धि होती है।श्री हनुमानाष्टक पाठ के प्रारंभ में श्री हनुमत-स्तवन के सात मंत्रो का भी पाठ करने से विशेष लाभ होता है।पाठ के बाद किशमिश या लड्डू का भोग लगाना शुभ रहेगा।


2👉 हर मंगलवार को स्नान आदि से निवृत होकर लाल वस्त्र एवं लाल चंदन का तिलक धारण कर कुशाशन पर बैठ कर 41 दिन नियमित रूप से 108 बार हनुमान चालीसा का पाठ एवं लड्डू का भोग लगाने से भौमकृत अरिष्ट की शांति होती है।


3👉 जन्म कुंडली में मंगल योग कारक होकर भी शुभ फल ना दे रहा हो तो हर मंगल वार कपिला गाय को मीठी रोटियां खिलाकर नमस्कार करना चाहिए गौ को हरा चारा जल सेवा एवं लाल वस्त्र पहना कर अलंकृत करने से मंगल के अशुभ फल की शांति होती है।


4👉 अपने इष्ट देव को घर में ही 27 मंगलवार सिंदूर का तिलक लगाकर खुद भी प्रसाद स्वरूप तिलक लगाना शुभदायक रहेगा।


5👉 सोमवार की रात्रि को ताँबे के बर्तन में पानी सिराहने रख कर मंगलवार की प्रातः घर में लगाये हुए गुलाब के पौधों को वही जल मंगल का बीज मंत्र पढ़ते हुए डाले।


6👉 किसी भी विशेष यात्रा पर जाने से पहले शहद का सेवन शुभ रहेगा।


7👉 यदि कुंडली में मंगल नीच राशिगत हो या अस्त हो तो शरीर पर सोने या तांबे का गहना या अन्य कोई वस्तु धारण नहीं करना चाहिए।इस स्तिथि में लाल रंग के वस्रों एवं लाल चंदन का भी परहेज करना चाहिए।


8👉 मंगल अशुभ होने की स्तिथि में मंगल सम्बंधित वस्तुओ (ताम्र बर्तन, इलेक्ट्रॉनिक वस्तु, लाल वस्त्र, गुड़ आदि) के उपहार विशेष कर मंगलवार या मंगल के नक्षत्रो में ग्रहण ना करे अपतु इनका दान इन दिनों विशेष लाभदाय रहेगा।


9👉 गेंहू तथा मसूर की दाल के सात-सात दाने लाल पत्थर पर सिंदूर का तिलक लगाकर इनको लाल वस्त्र में लपेटकर मंगलवार को मंगल का बीज मंत्र पढ़ते हुए बहते जल में प्रवाहित करें।


10👉 27 मंगलवार किसी अंध विद्यालय में या किसी अंगहीन व्यक्ति को मीठा भोजन कराना शुभ होगा।


11👉 मंगल की अशुभता में माँस-मछली-शराब आदि तामसिक भोजन का परहेज विशेष जरूरी है।


12👉 बिना नमक का एक समय भोजन या फलाहारी रहते हुए मंगलवार का व्रत रखना कल्याण प्रद रहेगा।


13👉 सोमवार की रात्रि सरहाने ताम्र पात्र में जल रख कर प्रातः बरगद की जड़ में मंगल के बीज मंत्र या ब्राह्मण को वैदिक मन्त्र से जल चढ़ाना शुभ रहेगा।


14👉 कर्ज से छुटकारे एवं संतान सुख के लिए ज्योतिषी से परामर्श कर सवा दस रत्ती का मूंगा धारण करना, भौम गायत्री मंत्र का नियमानुसार जप ,तथा मंगल स्त्रोत्र का पाठ करना कल्याणकारी रहता है।
                       


15👉 ऋण, रोग एवं शत्रु भय से मुक्ति के लिए एवं आयोग्य,धन - संपदा - पुत्र प्राप्ति के लिए मंगल यंत्र धारण तथा मंगल की औषधियों से नियमित स्नान इसके अतिरिक्त मंगल के वैदिक मंत्रों का निर्दिष्ट अनुसार ब्राह्मणों द्वारा जप और दशांश हवन करना शीघ्र कल्याणकारी रहेगा।


16👉 कुंडली में मांगलिक आदि दोष के कारण मंगल अशुभ फल दे रहा हो तो जातक/जातिका को श्री सुंदरकांड का नियमित 108 दिन तक हनुमान जी की चोला -जनेऊ एवं भोग लगाकर पाठ करने से वैवाहिक एवं पारिवारिक सुखों में वृद्धि करता है।इसके अतिरिक्त भौम शांति के लिए मंगल चंडिका स्त्रोत्र का पाठ भी विशेष लाभप्रद माना गया है।


17👉 अनंतमूल की जड़ मंगलवार को अनुराधा नक्षत्र में लाल धागे से दाएं बाजू में बाँधने से भौम कृत अरिष्ट की शांति होती है।

विभिन्न मंत्र विभिन रोगों से मुक्ति के लिए

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।


अर्थ :हम पृथ्वीलोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक में व्याप्त उस सृष्टिकर्ता प्रकाशमान परमात्मा के तेज का ध्यान करते हैं। हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की तरफ चलने के लिए परमात्मा का तेज प्रेरित करे।

गायत्री मंत्र के नियमित जाप से त्वचा में चमक आती है। नेत्रों में तेज आता है। वहीं रोगों से मुक्ति भी मिली है।धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गायत्री मंत्र का जाप करने से व्यक्ति के अंदर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। मन के दुख, द्वेष, पाप, भय, शोक जैसे नकारात्मक चीजों का अंत हो जाता है। इस मंत्र के जाप से मनुष्य मानसिक तौर पर जागृत हो जाता है

गायत्री मंत्र को सिद्ध करने में कितना समय लगता हैं अथवा उस सिद्धि को प्राप्त करने की सम्पूर्ण विधी क्या हैं? गायत्री मंत्र को सिद्ध करने के लिए चौबीस लाख बार जप करना पड़ता है।

किसी भी शुभ मुहूर्त में कांसे के पात्र में जलभर कर रख लें। उसके सामने लाल आसन पर बैठकर गायत्री मंत्र के साथ ऐं ह्रीं क्लीं का संपुट लगाकर गायत्री मंत्र का जप करें। जप के बाद जल से भरे पात्र का सेवन करने से गंभीर से गंभीर रोग का नाश होता है। यदि इसी जल को किसी अन्य रोगी को दिया जाए तो उसको भी बीमारी से राहत मिलेगी।

गायत्री मंत्र से सभी को शुभ फल मिलता है लेकिन विद्यार्थियों के लिए यह मंत्र बहुत लाभदायक है। प्रतिदिन इस मंत्र का 108 बार जाप करने से विद्यार्थी सभी प्रकार की विद्या प्राप्त करने से आसानी होगी। विद्यार्थियों का पढ़ाई में मन न लगना, याद किया याद न रहना, शीघ्रता से याद न होना आदि समस्याअों से मुक्ति मिलती है।

सुबह स्नानादि कार्यों से निवृत्त होकर पति-पत्नि सफेद वस्त्र धारण कर यौं बीज मंत्र का सम्पुट लगाकर गायत्री मंत्र का जप करें। इससे संतान संबंधी किसी भी समस्या से जल्दी मुक्ति मिलेगी। जिन दंपति को संतान पाने में कठिनाई आ रही है या उनसे दुखी हैं उन्हें लाभ मिलेगा।

किसी को कार्य, नौकरी में सफलता नहीं मिलती, आमदनी कम है अौर व्यय अधिक हैं तो गायत्री मंत्र का जप करना बहुत फायदेमंद हैं। शुक्रवार को पीले वस्त्र पहनकर हाथी पर विराजमान गायत्री माता का ध्यान कर गायत्री मंत्र के आगे और पीछे श्रीं सम्पुट लगाकर जप करने से गरीबी का नाश होता है। इसके साथ ही रविवार को व्रत किया जाए तो ज्यादा लाभ होता है।रोग से मुक्ति के लिए प्रतिदिन गायत्री मंत्र का कम से कम पांच माला जाप करना चाहिए और अधिक से अधिक आठ माला जाप किया जा सकता है।

पेट संबंधित रोगों का अंत करेगा : नरसिंह मंत्र



प्राशयेद्यो नरो मन्त्रं नृसिंहध्यानमाचरेत्।
तस्य रोगाः प्रणश्यन्ति ये च स्युः कुक्षिसम्भवाः॥
श्री ब्रह्माण्ड-पुराणे प्रह्लादोक्तं श्रीनृसिंह कवचं


प्रात:काल उठकर पूर्व की ओर मुख करके प्रदिक्षणा मंत्र का जाप करने से पेट दर्द से मुक्ति मिलती है. यानि कानि च पापानि, जन्‍मान्‍तर कृतानि च, तानि सर्वाणि नश्‍यन्ति, प्रदक्षिण पदे-पदे.


शिवजी की आराधना:



का मूल मंत्र तो ऊं नम: शिवाय ही है, लेकिन इस मंत्र के अतिरिक्त भी कुछ मंत्र हैं जिनसे भगवान शिव बेहद प्रसन्न हो जाते हैं.


पुराणों में भोलेबाबा प्रसन्न करने के कई मंत्र बताए गए हैं जो मनवांछित फल देते हैं. सृष्टि की उत्पत्ति स्थिति एवं संहार के भी यह आधिपति कहे गए हैं. ऐसे में अगर आप भी जीवन से हर प्रकार के कष्टों को दूर करना चाहते हैं तो शिव जी के कुछ मंत्रों का जाप करें, इन मंत्रों के जाप के प्रभु खुश होकर हर एक कष्ट को दूर कर देते हैं. कोआइये जानते हैं भगवान शिव को प्रसन्न करने के सबसे सरल एवं सिद्ध किए हुए मंत्र-


भगवान शिव को प्रसन्न करने के मंत्र:


महामृत्युंजय मंत्र:


ऊँ हौं जूं स: ऊँ भुर्भव: स्व: ऊँ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। ऊर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ऊँ भुव: भू: स्व: ऊँ स: जूं हौं ऊँ।।


शिव जी का मूल मंत्र:


ऊँ नम: शिवाय।।

भगवान शिव के प्रभावशाली मंत्र-
ओम साधो जातये नम:।। ओम वाम देवाय नम:।।
ओम अघोराय नम:।। ओम तत्पुरूषाय नम:।।
ओम ईशानाय नम:।। ॐ ह्रीं ह्रौं नमः शिवाय।।


रुद्र गायत्री मंत्र


ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥


शिव के प्रिय मंत्र-


1. ॐ नमः शिवाय।
2. नमो नीलकण्ठाय।
3. ॐ पार्वतीपतये नमः।
4. ॐ ह्रीं ह्रौं नमः शिवाय।
5. ॐ नमो भगवते दक्षिणामूर्त्तये मह्यं मेधा प्रयच्छ स्वाहा।

पूजा में प्रतिदिन करें इसका करें पाठ


नमामिशमीशान निर्वाण रूपं। विभुं व्यापकं ब्रम्ह्वेद स्वरूपं।। निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं। चिदाकाश माकाश वासं भजेयम।। निराकार मोंकार मूलं तुरीयं। गिराज्ञान गोतीत मीशं गिरीशं।। करालं महाकाल कालं कृपालं। गुणागार संसार पारं नतोहं।। तुषाराद्रि संकाश गौरं गम्भीरं। मनोभूति कोटि प्रभा श्री शरीरं।। स्फुरंमौली कल्लो लीनिचार गंगा। लसद्भाल बालेन्दु कंठे भुजंगा।। चलत्कुण्डलं भू सुनेत्रं विशालं। प्रसन्नाननम नीलकंठं दयालं।। म्रिगाधीश चर्माम्बरम मुंडमालं। प्रियम कंकरम सर्व नाथं भजामि।। प्रचंद्म प्रकिष्ट्म प्रगल्भम परेशं। अखंडम अजम भानु कोटि प्रकाशम।। त्रयः शूल निर्मूलनम शूलपाणीम। भजेयम भवानी पतिम भावगम्यं।। कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी। सदा सज्ज्नानंद दाता पुरारी।। चिदानंद संदोह मोहापहारी। प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी।। न यावत उमानाथ पादार विन्दम। भजंतीह लोके परे वा नाराणं।। न तावत सुखं शान्ति संताप नाशं। प्रभो पाहि आपन्न मामीश शम्भो ।

ऐसे मिलाये विवाह के लिए कुंडली


कुंडली मिलान में 18-24 गुण मिलने पर विवाह सफल तो होगी लेकिन इसमें समस्याएं आने की संभावना ज्यादा होती है। गुण मिलान में 24-32 गुण मिलने पर वैवाहिक जीवन के सफल होने की संभावना होती है। ज्योतिष के अनुसार इस तरह की शादी बहुत ही शुभ माने जाते हैं और इनमें ज्यादा समस्याएं उत्पन्न नहीं होती।

 कुंडली में विवाह सुख देखते समय कुछ बातों का ‍अति प्रमुखता से विचार करना जरूरी है।

 1. सप्तम स्थान

2. शुक्र और उसके सप्तम का ग्रह

3. सप्तम स्थान पर ग्रहों का प्रभाव

4. सप्तमेश की स्थिति

5. सप्तमेश के अन्य ग्रहों से होने वाले योग

6. चंद्र के सप्तम में स्थित ग्रह

7. शुक्र की स्थिति

8. शुक्र, सप्तमेश व चंद्र से सप्तम स्थित ग्रह का नक्षत्र

9. शुक्र पर ग्रहों का प्रभाव


यदि ये सारी स्थितियाँ या अधिकांश स्थितियाँ अनुकूल हो तो विवाह सुखी जीवन की ओर अग्रसर होता है अन्यथा पाप प्रभाव होने पर परेशानियाँ आ सकती हैं।


कब आता है विवाह योग :


विवाह योग्य देखने के लिए गुरु का गोचर प्रमुखता से देखा जाता है। गोचर में गुरु जब भी सप्तम स्थान पर शुभ दृष्टि डालता है, या सप्तमेश से शुभ योग करता है या पत्रिका के मूल गुरू स्थान से गोचर में भ्रमण करता है तो विवाह योग आता है। इसके अलावा लग्नेश की महादशा में सप्तमेश-पंचमेश का अंतर आने पर भी विवाह होता है।


विवाह में विलंब क्यों :

सप्तम स्थान शनि की दृष्टि से प्रभावित हो, सप्तम में मंगल हो, राहु हो तो विवाह देर से होता है। सप्तम का केतु, यूरेनस विवाह के प्रति उदासीनता दिखाता है


( यदि सप्तम पर शुभ प्रभाव हो तो ये दोष कम हो जाते हैं)